तिरंगी

तिरंगी पुल की छाँव और सिग्नल की धूप खा कर ना जाने कब बच्ची से भरी पूरी लड़की हो गयी है . तंग कमीज़ में उसके बदन का छटाव, चीथड़े सी बदली में छुपे पूरे चाँद सा, जितना छिपता है उससे ज़्यादा दिखाई देता है. भीख माँगना अब उसके लिए एक खेल सा हो गया है. कमीज़ ठीक करते हुए कार की खिड़की के पास जा कर खड़ी होती है तो शीशा अपने आप नीचे उतरने लगता है. हर बार दो नयी घूरती आँखे उसके बदन का ऐसे मुआयना करती हैं जैसे नये किस्म की एटीएम मशीन में स्लॉट ढूँढ रही हों. साँप सा रेंगता एक हाथ अक्सर बाहर आता है और एक सिक्का तिरंगी के हाथ में थमा देता है. कभी कभी तो हाथ का अंगूठा उसकी हथेली पर निशान लगाने की कोशिश करता है. सिक्का हाथ में आते ही मतवाली सी तिरंगी अचानक छोटी बहन सा चेहरा बना लेती है और खिसक जाती है.
उसकी माँ- ना जाने पैदा करके बनी है या उठा कर- कहती है, ‘तू तकदीर वाली है रे तिरंगी, मैं बोलती हूँ तेरे को.’
उस दिन तिरंगी ने सिग्नल पर सबसे बड़ी गाड़ी को चुना और खिड़की के पास जाकर अपनी अदा दिखाई. शीशा उतरा. दो आँखें उसके उभारों पर लेज़र के फोकस सी टिक गयी. तिरंगी थोड़ी बेचैन हुई पर दाव बढ़ने के लालच में मूर्ति बनी रही. रेंगते हुए हाथ में सौ का नोट देख कर उसकी आँखे चमक गयी. दिनेश ने नोट उसके हाथ में रखते हुए हथेली ऐसे दबाई जैसे कोई अलिखित करार की चाह है. पूनम रियर व्यू में अपने पति का यह लंपट रूप देख कर बिलबिला गयी.
ज़ोर से चिल्लाई, ‘ ए लड़की..!’
तिरंगी ने सौ का नोट अपनी मुट्ठी में भींच लिया.
‘इधर आओ तो.. यह क्या चुड़ैल बन कर फिर रही हो.’ इतना कह कर उसने अपना बेशक़ीमती शॉल तिरंगी पर फेंक दिया.
दिनेश दंग रह गया. दस हज़ार का यह शॉल उसने पिछले हफ्ते पूनम को उसके जन्म दिन पर गिफ्ट दिया था. कार फ़र्राटे से निकल गयी. तिरंगी शॉल छाती पर थामे, सौ का नोट मुट्ठी में दबोचे हाँफती हुई माँ के पास आई. नोट माँ की गोद में डाला और शॉल लपेट कर मोरनी सी नाचने लगी. माँ अपनी अनुभवी आँखों से हवा को तौलती रही.
रात को डिन्नर पर दिनेश ने हिम्मत करके सन्नाटा तोड़ना चाहा. ‘ सौ- पचास रुपये की बात अलग है पूनम, तुम्हे पता है पूनम उस शॉल की क्या कीमत थी? मैने तुम्हे गिफ्ट दिया था वो शॉल!’
पूनम ने अपनी आँखे दिनेश की आँखों में गाड़ कर कहा,’ मिसटर बंसल शायद तुम्हें यह नही पता कि उस शॉल की कीमत एक लड़की की इज़्ज़त से बहुत कम थी. और हाँ गिफ्ट….तुमसे..! जिसकी नज़र में एक लड़की के उभरे हुए अंगों की कीमत केवल सौ पचास रुपये है.’
वह उठ कर अपने कमरे में चली गयी. दिनेश का मुँह खुला रह गया और उसके हाथ का नीवाला उसकी सफेद शर्ट पर गिर गया.
तिरंगी रात भर शॉल से लिपटी रही और बार बार उसे सॉफ करती रही. दूसरे दिन शॉल ओढ़े ही सिग्नल पर भीख माँगने गयी.
ना किसी कार शीशा नीचे उतरा और ना ही कोई रेंगता हुआ हाथ उसकी ओर बढ़ा. रुआंसी होकर शाम को लौटी और शॉल उतार कर अपनी माँ पर फेंक दिया.
‘ सब लोग मेरा शॉल देख कर जलते हैं. मुझे नही ओढना यह.’
माँ समझ गयी. शॉल को अपनी पोटली में ठूँसते हुए बोली,’ पता नही किस अभागिन का शॉल है रे. तू तो तकदीर वाली है ऐसे ही अच्छी लगती है री. अगला महीना तो तेरा ही है रे, तुझे अबके मैं दो बंड्ल तिरंगे ला के दूँगी.’

 

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