जमना मौसी की हँसी

वैसे तो जमना मौसी हमारी कुछ भी नहीं लगती थी, पर इतनी हमारी थी कि राशनकार्ड में भी उनका नाम था. कोई बाहर से आए तो लगे घर की मालकिन वही है.जमना मौसी को ही पता होता था सुपारी कहाँ रखी होगी और छुआरे कहाँ. घर का पूरा काम काज देखती थी, पर दो पैसे भी अपने हाथ में नहीं रखती थी . उनकी जायदाद थी दो जोड़ी मोटे कपड़े जो बहुत दिनों तक नहीं फटते थे, और फटने से पहले चाचीज़ी दो और लाकर तैयार रख देती थी. सारे दिन हँसती रहती थी जमना मौसी. कोई उनका मज़ाक उड़ाए तो उनकी हँसी और खिल जाती थी.
सब लोग बैठ गप्पे मारते जून की दोपहरी बीता रहे थे. सब जमना मौसी की खिंचाई कर रहे थे और जमना मौसी हंस कर लोट पलोट हो रही थी. मैं हमेशा की तरह चकित उन्हें देख रहा था. आख़िर पूछ बैठा, ” मौसी आप कभी दुखी या परेशान भी हुई हैं ज़िंदगी में?”
सब मेरा मुँह देखने लगे. मौसी इस पर भी हँस पड़ी और हंसते हंसते बोली, ” बहुत बेटा, बहुत रोई हूँ मैं तो. यह तब की बात है जब मेरी ज़िंदगी में बहुत खुशियाँ थी……. मेरी शादी एक बहुत नेक आदमी से हुई . बहुत प्यार करता था वो मुझे. हमारे तीन बच्चे हुए . दो लड़की और एक लड़का. बड़े प्यारे थे तीनो.” यह बताते हुए जमना मौसी अतीत में चली गयी थी पर चेहरे की मुस्कान बरकरार थी.
” फिर एक दिन मेरा आदमी मर गया.उस दिन बहुत रोई थी मैं.” मौसी की आँखें नम हो गयी थी पर चेहरे की मुस्कान ज्यों की त्यों थी.
” फिर मेरी बीच की लड़की एक दिन मर गयी. बहुत प्यारी थी. कई दिन तक उसको याद करके रोती रही मैं.” आँसू टपकने को था पर मौसी के चेहरे की मुस्कान बनी हुई थी.
” फिर एक दिन बड़े वाली लड़की भी मर गयी. मैं रोई, पर ज़्यादा नहीं.” मौसी की चेहरे पर हँसी खिलने सी लगी. मैं एकटक देख रहा था.
” और फिर एक दिन आया कि लड़का भी मर गया. मैं रोई नहीं ,इस बार हँस पड़ी. खूब हँसी.”
हम सब एक दूसरे का चेहरा देखने लगे.
मम्मी ने कहा, ” जाओ मौसी चाय का वक़्त हो गया आप चाय बना लो.”
मौसी हँसती हुई उठी, ” मेरे को पता है, तुम लोग बातें करोगे . मौसी सदमा लगने से हँसी होगी और फिर हँसने की आदत पड़ गयी. ऐसा कुछ भी नहीं है. जब आपका आख़िरी अपना बचे और वो भी चला जाए तो हँसी आती है. सोच कर डर लगता है पर मेरी मानो बहुत हँसी आती है.”
जमना मौसी हँसती हुई किचन में चली गयी.

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पमिया पेरणी की ‘स्टोरी’

मुझे अपने अख़बार के लिए ‘पेरणीयों में देह व्यापार’ पर ‘स्टोरी’ करनी थी.
एक कामरोगी से परिचित ने – हर दो मिनिट के बाद जिसकी टॅगलाइन होती थी ‘ हम तो ठहरे जी अय्याश’- मुझे पमिया पेरणी के झोंपडे तक पहुँचने का रास्ता दिखाया. यह जो दिल्ली से सोनीपत के रास्ते पर नये सस्ते घर बन रहे हैं, क्या नाम इसका? याद आया, बवाना; बवाना से बाहर निकलते ही.
झुक कर अंधेरे से झोंपडे में घुसा तो पमिया एक चमकदार सस्ता सा ब्लाऊज ठीक कर रही थी, और एक ६-७ साल का लड़का जिसकी पीठ नंगे रहने से ज़्यादा ही काली हो गयी थी, एक ४ साल की आधी सुथरी आधी मैली लड़की के साथ बैठा पढ़ाई जैसा कुछ कर रहा था.
मुझे देखते ही पमिया बोली, ” तावली से पूछ, काम पे जावां फेर.”
” ये बच्चे … थोड़ी देर बाहर …” मैं सकपकाया.
” पर थे तो खाली सवाल पूछन आया हो ना. घर पे तो मैं हाथ भी नहीं लगान दूं.”
” नहीं, सवाल ही पूछने हैं ,वैसे तो.”
मैं झिझकता सा शुरू हुआ और घूम फिर कर मुद्दे की बात पर आया.
” पर तुमको लगता तो होगा ना कि तुम वैश्यावृति करती हो?”
” कसी बेश्याबरती, मेंह तो अपनों र ताबरियाँ को पेट भराँ. बेश्या तो वे मर्द होवी जो पैसा देकर म्हारे साथ ग़लत काम करीं.”
“पर पेट के लिए तुम कुछ और काम भी तो कर सकती हो?”
” बताओ म्हाने कोई आदमी जो और काम के लिए २० मिंट में सौ का नोट निकाले? दस भी ना दे कोई.”
इतने में पमिया का घर वाला आ गया. उसने ठेठ अपनी बोली में पमिया से कुछ कहा जिसका मतलब था- कौन लाट साब है यह, बिना बात टाइम खराब मत करना. कम से कम दो सौ लेना.
वह चला गया तो पमिया बोली, ” २० रुपए दारू के लिए मरे आज. यो ही मर्द थो , मेरे हाथ लगा लियो तो सिर फोड़ दियो थो.”
मैं चलने लगा तो मैने ५०० का नोट निकाल कर पमिया को थमाया.
” ५०० कईं बात का. साथ चालूं के?”
“नहीं, नहीं”, मैं बोला, “ज़रा इधर खड़ी हो तो. बच्चो तुम भी ज़रा इधर देखो.” मैं अपना मोबाइल निकाल कर फोटो लेने लगा.
पमिया ने ५०० का नोट अपने खिस्से से वापस निकाला और मेरे ऊपर फेंक दिया.
” ये अपनी रकम पकड़ और रस्ता पकड़. आया मेरी र बालकां की फोटू निकालन आला.

जितने किरदार उतनी कहानियाँ

जमील भाई बता रहे थे.
सर, जैसे ही सद्दाम की फ़ौज़ कुवैत में घुसी, इंडियन दूतावास ने हमको बता दिया था कि अब जल्द से जल्द सब को यहाँ से निकल जाना चाहिए. बस तीन शिप और जाने वाले थे. मेरा और नासिर का कामकाज अच्छा चल रहा था, और इंडिया में आकर कुछ करने को भी नहीं था. मैं अकेला था सो पैर जमाए रखना चाहता था. नासिर की बीवी और फूल से दो बच्चे भी साथ थे. हमने ज़ुबैदा भाभी को लाख समझाया कि वह बच्चों को लेकर आगे चली जाए. हम जैसे हालात बनेंगे उसके हिसाब से फ़ैसला ले लेंगे, जल्दबाज़ी में पूरा काम चौपट करना ठीक नहीं था.
पर ज़ुबैदा भाभी एक सुनने को तैयार नहीं. ” इनके सिवा और कौन है मेरा. जीएँगे तो साथ जीएँगे, नहीं तो साथ मरेंगे. मैं इनको पीछे छोड़ कर बिल्कुल इंडिया नहीं जाऊंगी.”
हार कर हम सब आख़िरी जहाज़ अकबर से, जो कुछ समेट सके समेट कर, इंडिया के लिए रवाना हुए. नासिर को रोकने के चक्कर में मुझे भी घिसटते हुए आना पड़ा.
इंडिया आकर नासिर ने मिल्लत नगर में हमारे पड़ोस में दो कमरे का एक मकान ले लिया. और जंग ख़त्म होने का इंतेज़ार करने लगे.
देखो फिर क्या से क्या हुआ. ज़ुबैदा भाभी को दो तीन महीने बाद इंग्लिश सीखने का शोक चढ़ गया. बोली, कुवैत वापस गयी तो कोई नौकरी कर लूँगी. नासिर को भी तज्बीज पसंद आई. सामने ‘टीपू सुल्तान’ सीरियल का एक छोटा सा एक्टर रह रहा था, फ़िरोज़ कुछ नाम था, उस से इंग्लिश सीखने लगी.
इसके कोई पंद्रह दिन बाद नासिर भाई तड़के ६ बजे मेरा दरवाजा पीटने लगे. बौखलाए हुए थे, छूटते ही बोले, ” कोई बार खुली होगी क्या?” मैं बोला, ” इस समय? बोल ना क्या हुआ?”
नासिर भाई के होंठ नहीं खुल रहे थे. बड़ी हिम्मत करके बोले, ” ज़ुबैदा उस हरामजादे के साथ भाग गयी, दोनों बच्चों को छोड़ कर.”
अब बताओ साहेब इसको क्या कहेंगे? जमील भाई का अंदाज़ मुझे चित कर देने का था. चित मैं हो भी गया था, पर पैंतरा अभी था मेरे पास.
मैने कहा, ” जमील भाई यह तो हुई नासिर भाई की कहानी. अगर आप ज़ुबैदा से सुनेंगे तो यही कहानी कुछ और हो जाएगी, और फ़िरोज़ से सुनेंगे तो एक नयी कहानी बन जाएगी. सो जितने किरदार उतनी कहानियाँ…. अब यह बताओ आप की क्या कहानी है इसमें?”
जमील भाई मेरा मतलब समझ गये और झट से बोले, ” नहीं, नहीं अल्लाह कसम, इसमें अपनी कोई कहानी नहीं है.”

प्रेम, परिवर्तन, और पतन

जब, तब वह एक नवयुवक था, नादान था. वह उगते हुए सूरज को देखकर खुश हो जाता था. रात उसके लिए सपनों की दुनिया थी. ईश्वर को वह एक प्रकाश-पुंज समझता था. जब, तब उसे वह लड़की बहुत अनोखी लगती थी. उसे देखे बिना मन को चैन नहीं आता था. दिन रात उसी के साथ हंसते खेलते रहना चाहता था. जब, तब उसकी मौसी दिन रात उस पर निगाह रखती थी क़ि नादानी में लड़का कुछ ग़लत नहीं कर बैठे. दूर बैठी उसकी माँ को भी यही चिंता सताती थी. तब, उसने उस लड़की को कभी छुआ तक नहीं. छूने का ख्याल भी उसके दिल में नहीं आया.

अब, जब वह पुरुष हो गया, समझदार हो गया. उगते सूरज के साथ उसके मन मे बहुत से फ़िक्र जागने लगे. रात एक उधेड़बुन होकर रह गयी. उसे लगने लगा ईश्वर कोई है जिसकी मनुष्य से सांत-गाँठ है. अब, बस उस स्त्री हो चुकी लड़की की देह-यष्टि उसे खींचने लगी. वह उसके साथ हँसने खेलने की सोच भी नहीं सका. उसे नज़दीक पाते ही उसके बदन में कंपन सा होने लगा. मौसी की फ़िक्र दूर हो गयी कि वह अब ज़िम्मेदार हो गया है. माँ ने भी चिंता करनी बंद कर दी थी . अब, एक दिन समय पाते ही उसने उस स्त्री हो चुकी लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाया, और अपनी राह पर निकल गया.

गंदगी का समुद्र

अम्मा सुंदर थी. ऐसा सौंदर्य पाने के लिए नहीं, पूजने के लिए होता है. अम्मा के सीट पर बैठते ही पास बैठे सलोने से युवक की देह में विकार आ गया. कंधा झुक गया, कोहनी बाहर निकल गयी और टाँग लटक गयी. लड़का अम्मा के बेटे की उम्र का था. उसका मन गिजगिजाहत से भर गया.
सोचने लगी- क्या यह पुरुष की जात ही ऐसी होती है?
उसे अचानक कुत्तों का ख्याल आ गया. अम्मा ने अपना सिर झटका, इस कुत्सित ख्याल को बाहर फेंकने के लिए.
दूसरा ख्याल आया- क्या मेरा लड़का भी ऐसे ही करता होगा? हो सकता है?
उसे लगा कि लड़के को हाथ लगा कर कहे,” बेटे ठीक से बैठ जाओ. ”
“बेटा?…. नहीं. ”
जब करोड़ों औरतों ने इस गंदगी को जहाँ है वहीं छोड़ दिया है तो शायद उन्होंने सही ही किया होगा. मुझे भी नहीं उकेरना चाहिए.
उसे रास्ते में पड़ी बिष्ठा का ख्याल आ गया. अम्मा ने मुँह सिकोडा.
तब तक कंडेक्टर आ गया जिसकी सूरत में गैंडे का चेहरा छुपा था.. अपनी फटी आवाज़ में उसने कहा,” अम्मा आप इधर बैठ जाओ.” उसने कंडेक्टर की अकेली सीट की तरफ इशारा किया. और उस सीट पर बैठे आदमी को इशारे से अम्मा की सीट पर आने को कहा.
अम्मा को थोड़ा अचंभा हुआ- तो कंडेक्टर को इस लड़के की हरकत के बारे में पता है?
मतलब सबको सब कुछ पता है ? सब जानते हैं सभ्यता का टापू गंदगी के समुद्र के बीच में है.
अम्मा उठी, बोली, ” नहीं बेटे, मेरा स्टॉप आ गया है.”

दुख के फूल

पुराना होकर दुख भी खिल जाता है. हल्का हल्का महकने लगता है. पुराने गुज़रे दिनों की बातें माँ और सुधा दोनों को किसी आधी बिसरी कहानी से लगने लगे हैं. सुधा परित्यक्ता है और माँ विधवा.
” यह पापा ने ही दरांत उठाके मारा था ना, माँ”, सुधा ने माँ के पैर के निशान पर उंगली फिराते हुए पूछा. इस निशान को लेकर माँ- बेटी बीसियों बार बात कर चुकी हैं.
” तेरे पापा को गुस्सा आता तो कसाई बन जाते थे. पर फिर बाद में बहुत मनौव्वल करते थे. सुधा की मम्मी.. सुधा की मम्मी.. रट लगा लेते थे. देख ये कितनी भारी पायजेब बनवा कर दी थी….. महेंद्र भी शुरू में कितना अच्छा था. आदमी के भीतर क्या है कुछ पता थोड़े ही चलता है.”
सुधा जानती है मम्मी को अब महेंद्र की बात करनी है.
” आदमी तो बहुत सीधे हैं वे, इसीलिए तो उस डायन के झाँसे में आकर अपना घर बर्बाद कर लिया. रात को जब देर से आते तो देखो कहाँ है तिवारी आइसक्रीम वाला, पहले वहाँ जाते और फिर घर पर आते थे. मैं भी गुस्से में बोल देती थी- फेंक दो, नहीं चाहिए तुम्हारी आइसक्रीम.” सुधा ने रीझ कर बताया.
माँ की नाक से पानी बहने लगा.
” जा, चाय का वक़्त हो गया. अच्छी सी चाय बना ले अदरक डाल के.”
सुधा को भी सिरदर्द सा लग रहा था.
आँसू जब आँखों से नहीं निकलते तो निगोडे इधर उधर बह कर चले जाते हैं.
दुख के फूल हैं कि कभी सूखते ही नहीं.

सब यही पर हैं

पिताजी ने अस्फुट स्वर में धीमे से कहा, ” वो… बच्चा … कहाँ है?”
मेरी आँखों में देख कर वो जान गये, मैं समझा नहीं. उनके पीले पड़ गये चेहरे पर पौ फटने की सी एक मुस्कान आई. हाथ हिला कर बताना चाह रहे थे पर मेडिकल के तंत्र जाल में बँधे हुए थे. जब इंटेन्सिव केयर में सारी मशीनें लगा दी जाएँ तो समझ लो अंतिम समय आ गया है.
उन्होने एक उंगली से जो अभी तक आज़ाद थी, मेरे घुटने को छुआ और अस्पष्ट स्वर में कहा, ” स्लेट… थूक…. डाँट..!”
मैं समझ गया था. मैने अपनी मुस्कुराहट को बिखेर कर कहा,” है तो सही वह बच्चा. खेल रहा होगा यहीं कहीं आस पास. स्लेट भी रखी है अंदर वाली अलमारी में.”
” और वो… लड़का…छोटी छोटी… मूँछों वाला…?” उन्हें ज़ोर लगाना पड़ रहा था, पर दिल अपनी ज़िद पर था.
” वो भी यहीं किसी शीशे के सामने खड़ा कंघी कर रहा होगा.”
उन्हें मेरी जुगलबंदी में मज़ा आ रहा था. अपनी मुस्कान को थोडा उछाल कर बोले, “और वो….?
अबके मैं पहले ही समझ गया था, अच्छे संगतकार की तरह.
” वो दूल्हा? जिसकी घोड़ी के आगे आगे साफा पहन कर आप समधी के तुररे में चल रहे थे? वो भी यहीं है… और वो सुंदर सलोनी दुल्हन भी अपना घर अच्छे से बसाए बैठी है. ”
खुशी से उनकी आँख में एक आँसू तैर आया.
” और तुम तो हो ही…. सब हैं…बस तुम्हारी मम्मी…. नहीं दिखाई ….?” अपने सूखे होंठों पर जमने लगी मुस्कान को तोड़ते हुए वे पूरा ज़ोर लगा कर बोले.
” तो मैं…. ” और उनकी आँखें बंद हो गयी. हल्की सी मुस्कान फ्रीज़ हो गयी.
मैं मुस्कुराता हुआ उन्हें देखता रहा. एक मिनिट… एक घंटा .. एक ज़िंदगी.. या पता नहीं एक युग बीत गया. नर्स के आने की आहट से मेरी तंद्रा टूटी. मेरी मुस्कुराहट देख कर, उसने फूर्ति से पिताजी की नब्ज़ पकड़ी. वो धक रह गयी.
मैं अब भी मुस्कुरा रहा था.
” ही इज़ नो मोर !”
” जी मुझे बता कर गये हैं.”
उसे लगा मैने संतुलन खो दिया है.
” किसी को बुलाना है?”

” सब यही पर हैं .”