काम से छुट्टी

दरवाज़े की घंटी सुनते ही नीरज ने सौ का नोट ऊपर की जेब में रख लिया. उसका अनुमान सही निकला, मावसी ही थी.
” मेडम तो दो दिन के लिए दिल्ली गयी मावसी, उनके पापा की तबीयत खराब है.” नीरज ने दरवाज़ा पूरा नहीं खोला.
” झाड़ू पोंचा तो कर दूं साब.”
” अरे रहने दो मावसी, परसों सुबह आके अच्छे से साफ कर देना. मेडम को बोलना रोज़ पोंचा लगाया है.” उसने सौ का नोट मावसी की तरफ बढ़ा दिया . मावसी ने नोट नहीं पकड़ा.
” साब आप लोग गुलदस्ते लेते देते हैं, मैं छुट्टा काम निपटाके पूरे दिन गुलाब के फूल तोड़ती हूँ.”
” मतलब? मैं समझा नहीं.” नीरज थोड़ा चिढ़ गया.
” साब दो दिन काम पर नहीं आने के खाली सौ रुपये?”
” नीरज ने सौ का नोट जेब में रख लिया, और पर्स से पाँच सौ निकाल कर दे दिए.”
” अब ठीक है साब. कितने फूल रोज़ तोड़ती हूँ साब, पर इतनी सफाई से की क्या मज़ाल एक काँटा लग जाए.’

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