क्या बात कही उसने !

सास ने एक नज़र उसे देखा और सीट पर फैले दूध और चाय के तामझाम को सिकोड़ने की कोशिश की. बहू ने बिना देखे ही उसे देखा. बड़े बच्चे ने एक टक उसे देखा और जितना पढ़ना जानता था पढ़ा. छोटा बच्चा सोया था, देखता भी तो उसे यह नहीं पता था कि जिन्हें वह देखता है वे दूसरे लोग हैं. खामोशी बरकरार थी, और उसकी आदत थी देखते ही खामोशी के दो टुकड़े करने की.
” कोई बात नहीं, आंटी, आराम से. मैं समान किसी सीट के नीचे घुसा देता हूँ, और सामने बैठ जाता हूँ. पर हाँ एक कप चाय मेरे लिए भी. घर की चाय देखने के बाद मैं रुक नहीं सकता. अब के तीनों ने उसे एक साथ देखा.
” अरे बेटा आज कल तो पूछने से पहले लोग ना कर देते हैं, तू तो माँग के ले रहा है. अभी देती हूँ.”
” और बेटे, पापा टाय्लेट में हैं, या स्टेशन पर लेने आएँगे.” उसने बच्चे को खुलने का न्योता दिया.
बच्चे ने सवाल को ना सुनने का भाव बनाया. सास और बहू को एक सुपरिचित सा धक्का लगा.
सास ने एक ही वाक्य में बात को ख़त्म करना चाहा,” इसके पापा कारगिल की लड़ाई में शहीद हो गये थे, बेटा.”
उसने बहू की खाली पगडंडी सी माँग को देख कर अपनी बेवकूफी को कोसा. खामोशी फिर पसर गयी. उसे गवारा नहीं था.
” एक बात कहूँ आंटी, आप ईश्वर की चुनी हुई माँ है. भारत को आप पर गर्व है. ये बच्चे जब बड़े होंगे, इनका सर गर्व से ऊँचा रहेगा.”
आंटी, बस सुनती रही.
वह नहीं माना. उसने झुक कर आंटी के पैर छुए. फिर बोला, “मुझे आशीर्वाद दो आंटी कि मैं भी आपके बेटे की तरह एक दिन देश के लिए लड़ता हुआ मरूं.”
“बेटा, तेरे माँ-बाप का कलेजा है तुझे ऐसा आशीर्वाद देने का? फिर मैं कैसे दे दूं.”
वे होते तो मैं उनसे ज़रूर पूछता. माँ, पापा, बड़ा भाई सब एक साथ चले गये. मुझे साइकिल चलानी थी, तो नहीं गया. वे सब सिद्धिविनायक गये थे. बम फटा और कुछ भी नहीं मिला. मैं बहुत छोटा था.” वह एक साँस में कह गया.
आंटी का जी भर आया. ” और लेगा थोड़ी चाय बेटे? इन आतंकवादियों को तो ना चुन चुन कर फाँसी देनी चाहिए.”
” नहीं आंटी नहीं, फाँसी देने से कुछ नहीं होगा. इनको तो स्कूल में भर्ती करके डंडे मारने चाहिएं, रोज़ दो चार डंडे, तब जाकर ठीक होंगे ये , फाँसी वांसी से कुछ नहीं होगा.”
उसकी बच्चे जैसी बात सुनकर आसपास की सवारियों ने तरह तरह के मुँह बनाए- क्या बात कर रहा है यह बुद्धू !
जब भी सोचता हूँ तो लगता है- क्या बात कही थी उसने !

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