झूठी चोट

प्रिया खोयी हुई थी.
पास बैठे पति को छोड़कर पत्नी का यूँ अपनी सोच में खो जाना नागवार हो सकता है.
” अब क्या हो गया?”
वह चौंकी. हिम्मत करके बोली, ” परसों अपनी बीवी और बच्चों को लेकर चार दिन के लिए आ रहा है पवन.”
“पता है मुझे, और ३ हज़ार रुपये अलग से दे दिए हैं तुम्हें.”
” मैं चाहती हूँ, अबकी बार उनके सामने आप अच्छे से रहें, मुँह बना कर कटे कटे नहीं. मेरे भाई भतीजे रोज़ रोज़ नहीं आते हैं.”
” लेकिन तुमने तो अभी से झगड़ा शुरू करने की तैयारी शुरू कर दी. बस यही तरीका है अपनी बात कहने का.” पति की आवाज़ ऊँची हो गयी थी.
” अगर आपको ऐसा लगता है तो दो दिन हैं अभी. कह लो जितना भला बुरा कहना है मुझे. झगड़ लो, मैं रो धो लूँगी. पर , प्लीज़ उनके साथ चार दिन खुश रहने नाटक ही कर देना.” वह रुआंसी हो गयी.
” नाटक! काश मुझे तुम्हारी तरह नाटक करना आता.”
” पूरा ज़हर निकाल लो प्लीज़. मुझे बुरा नहीं लगेगा. पर…”
” प्रिया, तुम पहले बात करने का ढंग सीखो.”
” कैसे करूँ, जब दो मिनिट के लिए तुम्हारी आँखो में प्यार उतरता है तब कहूँ आपसे. ज़िंदगी के वे दो मिनिट भी बर्बाद कर लूँ. बताओ तुम ही बताओ. उस समय शायद तुम चुपचाप सुन लो. पर मैं जानती हूँ उसमें भी तुम्हें तवायफपन लगेगा.”
प्रिया की आवाज़ में गुस्सा भर आया था. वह रोने लगी. रोती हुई बेडरूम में चली गयी.
उसे लगा था, वह पीछे पीछे चलकर आएगा और आकर उसे बाहों में भर लेगा. कहेगा, ” अच्छा, बाबा अच्छा ! मैं एक दम हंसता मुस्कुराता रहूँगा, चार दिन भी और बाद में भी.
पर नहीं. वह नहीं आया. बस टीवी चलने की आवाज़ आई.
वह बाहर बैठा अपनी झूठी चोट पर ज़ोर ज़ोर से फूँक मारता रहा.

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