डब डब भर आए नैन

मैं घंटे भर से माँ-बेटी की बहस सुन रहा था. माँ का कहना था बेटी सूरज छिप चुका है, कल सुबह-सुबह चले जाना. बेटी कह रही थी, ” क्या मम्मी, गाड़ी से आधे घंटे की ड्राइव है, अभी निकल जाते हैं.” दामाद बाबू जूते पहने खड़े थे. माँ का पलड़ा हल्का लग रहा था.
मैने कहा, ” चले जाना बेटे, दो मिनिट बैठो तो सही.”
बेटी आधी टिक कर बैठ गयी.
” एक वक़्त था बेटे, मुझे खूब याद है, जब मेरी बुआ गाँव से ससुराल जाती थी. आधा गाँव इकठ्ठा हो जाता था. एक एक करके सखी सहेलियाँ रो-रो कर गले मिलती थी. बड़ी बूढ़ीयां आशीर्वाद देती थी. फिर घन्टा भर लगा के सब गाती हुई निकलती थी- ” साथिन चाल पड़ी रे मेरे डब डब भर आए नयन…”
बेटी को रोचक लगा, मन लगा कर सुनने लगी.
” गाती गाती सब चौराहे तक जाती थी. गलियारे में एक एक घर से औरतें निकल कर जाने वाली को गले लगाती. एक एक रुपया सब चुपके से हाथ में थमा देती थी. आँसू भरा माहौल, स्नेह की बौछार. क्या माहौल बनता था.”
” फिर ऐसा क्या हुआ पापा कि यह सब अचानक खो गया?”
मैने विचार कर कहा, ” बेटा, पहले बिजली आई, तो सूरज उगने और छिपने की अहमियत कम हो गयी. फिर सड़क आई, तो चौराहे तक जाने का पैरों और रास्ते का रिश्ता टूट गया. और फिर मोटर आ गयी तो… बस”
“मगर इस स्नेह के माहौल को तो बचा कर रखा जा सकता था, फिर भी ?”
मैने कहा, ” नहीं, संभव नहीं था बेटे.. क्योंकि साधन आए तो एक ऐंठ आ गयी, सब में बड़प्पन आ गया.” और मैं हंस पड़ा.
” यू आर सो मीन पापा… अब तो मैं बिल्कुल नहीं जाऊंगी. कल सुबह ही जाऊंगी.”
उसने मम्मी को गले लगा लिया.
माँ बोली, ” चल हट परे. मैं एक घंटे से कह रही हूँ. आई पापा की लाडली.”
डब डब भर आए नैन….

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