औरतों का ख्याल आया तो सरकार ने गाँव गाँव में सिलाई सेंटर खुलवा दिए. साठ का दशक था. औरतों को इकट्‍ठा बैठे और खुलकर बातें करते देख मुझे यह सब कुछ क्रांति सा लगता था. खुलकर, यानि सिलाई सेंटर औरतों की अपनी एक अलग दुनिया की तरह था. हँसी, ठिठोली, गंदे मज़ाक. उनकी गंदी बातों में भी एक बाल-सुलभ सादगी थी. अति की तो बड़ी बूढ़ी की डाँट भी खानी पड़ती. सलवार, कमीज़, कच्छा, बनियान थे ही ऐसी चीज़ें की बात घूम फिर कर वहीं पहुँच जाती और फिर हँस हँस सब एक एक की दो दो हो जाती.
एक दिन बन्तो रामसरूप का हरे पट्टे का कच्छा सील रही थी और रामसरूप की घरवाली चन्द्रो बन्तो के आदमी गणपत की आसमानी बनियान. इतना मज़ाक हुआ कि सिलाई सेंटर में सब हँस के लोट पलोट हो गयी. उसी दिन शाम को ज़मीन के झगड़े में रामसरूप ने गणपत के पैर पे फावड़ा मार कर उसे ज़िंदगी भर के लिए अपाहिज़ कर दिया. उस दिन के बाद बन्तो और चन्द्रो ने एक दूसरे का मुँह भी नहीं देखा.
मुझे लगा था इस धरती पर दो दुनिया हैं, एक औरतों की और एक मर्दों की. आज भी वैसा ही है.
मैं तय नही कर पाया हूँ कि पहाड़ से जब नदी निकलती है तो पहाड़ और नदी एक दूसरे के साथ होते हैं या खिलाफ.

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