क़ासिम, सुंदर और मैं

नयन- नक्श, जैसे चौथी के बच्चे ने बनाए हों, ऊपर से रंग काला; अनपढ़ और निहायत ग़रीब. क़ासिम लड़की के ख्वाब से भी घबराता था. पर सोलह तक पहुँचते देह में खलबली मचने लगी. बाप को पता था लड़का तैयार हो गया है, पर अब वह ज़माना तो है नहीं कि मामा फूफी पर दबाव डाल कर लड़की को लपेट लाओ. इधर असग़र मौलवी को भी दिख रहा था लड़का तैयार हो गया है, हूरों से मिलने के लिए.
एक दिन घुटने के पास बैठा लिया, ” क़ासिम बेटा तुम इस दुनिया की मैली कुचली लड़कियों के लिए नही बने हो. तुम्हारा तो जन्नत में हूर इंतज़ार कर रहीं हैं. बस तुम्हें अल्लाह का काम करना है और जन्नत के दरवाज़े तुम्हारे लिए खुल जाएँगे.”
क़ासिम को मौलवी की बात बिल्कुल सही लगी, क्योंकि इस दुनिया में तो कोई लड़की उसके लिए बनी नहीं थी.
देह की खलबली और बढ़ गई.
अल्लाह का काम था, सूरज उगने की दिशा में जाना और अँधा-धुन्ध गोलियाँ चलाना. जीतने मारे उतनी हूर. क़ासिम दनादन गोलियाँ चलाकर हूरों का मालिक बनता इससे पहले धरा गया. पुलिस रस्सी से बाँध कर उसे थाने ला रही थी, भीड़ बारात सी उसके पीछे थी.
मिन्नत कर रहा था,” मुझे पीटना मत, बस गोली मार दो गोली.” असग़र मौलवी ने कहा था, ‘गोलीजब तेरी छाती में लगे तो अल्लाह! अल्लाह! करना. जन्नत का दरवाज़ा खुलेगा और हूर कहेंगी – आओ क़ासिम, हमारी जान.’
सुंदर वैसे तो मेरा मुरीद था, पर जब मैने लिखा कि आतंकवाद का मूल कारण सेक्स है तो वह भी थोड़ा उखड़ गया, ” भाई जी, अबके तो आप कुछ बहक गये, बताओ कहाँ आतंकवाद और कहाँ सेक्स. हमारे साथ कभी कभार पत्ते खेला करो, संतुलन बना रहेगा. ज़्यादा पढ़कर भी लोग पागल हुए हैं.”
मुझे याद है, १६ का होते ही सुंदर ने स्कूल छोड़ दिया था, और उसी साल लाल कमीज़ और पट्टे का पाजामा पहन कर वह दूल्हा बन गया था. उसने कभी हूरों के ख्वाब नहीं देखे.
मैं १६ का होते ही कॉलेज चला गया. मैंने किशनलाल पब्लिक कॉलेज रेवाडी में सचमुच एक हूर देखी, जो आज भी कभी कभी मेरे सपने में आती है.

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