प्रेम-पत्र

हमारी सगाई और शादी के एक साल में मैंने अपनी पत्नी को बहुत प्रेम-पत्र लिखे, लगभग हर सप्ताह एक. पत्र भी ऐसे जैसे कोई पारंगत प्रेमी लिखता है.
शादी के कुछ दिन बाद पत्नी ने पूछ ही लिया, ‘ आप के पत्र मुझे अच्छे लगते थे, पर पढ़कर हमेशा ऐसे लगता था कि यह आदमी जाने कितने ऐसे प्यार भरे खत लिख चुका है. सच बताइए कब से लिख रहे हैं आप ये प्यार भरी पाती.” वह मुस्कुरा रही थी, मगर संदेह उनकी आँखों में लिखा था.
मैंने विचार कर कहा, ” देखिए, मैं आपसे झूठ नहीं बोलूँगा. मैंने बहुत प्रेमपत्र लिखे हैं, और बहुत दिल से लिखे हैं. तुम मेरा विश्वास करोगी यह सोच कर मैं आज तुम्हें पूरा सच बताता हूँ.-
हमारे एक चाचा थे दूर के- रज्जु चाचा. जब २५ पार कर गये और शादी नहीं हुई तो सब उनका मज़ाक करने लगे. रज्जु चाचा वैसे तो हंस कर टाल देते थे, पर अंदर से बेचैन रहने लगे. गुमसुम से हो गये.
हुआ यह कि एक दिन उनके नाम से एक लिफ़ाफ़ा आया. कोने पर लिखा था: भेजनेवाली, आपकी अपनी. सब के कान खड़े हो गये. महेन्द्रगड़ की मुहर थी. सब रज्जु चाचा के पीछे पड़े तो उन्होने लजा कर दो शब्दों में बताया, ” बुलाया है.”
उस दिन के बाद नहर के काम से शनिवार को जैसे ही छुट्टी मिलती, रज्जु चाचा सीधे महेन्द्रगड़ की राह पकड़ लेते. लिफ़ाफ़ा हर हफ्ते आने लगा. हर बार रज्जु चाचा एक आध प्यार भरा जुमला सबको बताते. बात आगे बढ़ाने की कवायद शुरू हुई कि चाचा बीमार पड़ गये. बीमारी भी पता नहीं क्या थी कि हफ्तों खाट से नहीं उठे. एक हफ्ते तो प्रेमपत्र आया, फिर बंद हो गया. लोग ‘आपकी अपनी’ को कोसने लगे. ” औरत की जात है, माल मिलना बंद तो चिट्ठी भी बंद.”
संयोग से मेरी पहली नौकरी महेंद्रगड़ में लग गयी. लोग तो अब मेरे पीछे पड़ गये, ” अरे तू ही कुछ पता कर. उसको बीमारी की खबर नहीं है, या मुँह मोड़ कर चली गयी.”
मैं क्या करता? रज्जु चाहा कुछ बोलें तो खोज खबर लूँ.
एक दिन मेरा पीछा छूटा. लिफ़ाफ़ा आ गया. और अब के जो पत्र आया तो पढ़ने सुनने वालों की आँखो में पानी आ गया. ज़माने के पहरे, तड़पता दिल, भीगा तकिया… चाचा की भी आँखें फटी रह गयी. बीमारी थी कि ठीक होने का नाम नहीं. पत्र गमगीन होते गये, जैसे खून से लिखे गये हों. कुछ हो गया तो सती होने की ज़िद तक बात पहुँच गयी.
होना तो लिखा था, रज्जु चाचा की चलाचली का दिन आ गया. सबकी नज़रें गलियारे पर लगी थी कि आज तो हो ना हो ‘आपकी अपनी’ बिलखती हुई आएगी.
रज्जु चाचा की नज़र मुझ पर टिकी थी. एक आँसू बहा और आँख बंद हो गयी.
मुझे पता लग गया था कि रज्जु चाचा शनिवार को महेंद्रगड़ जाकर खुद चिठ्ठी डाल कर आते थे.
पत्नी ने लंबी साँस ले कर कहा,” पता नहीं आपकी कहानियों पर विश्वास करूँ या आप पर.”
और मुस्कुरा दी.

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