पता नहीं

पता नहीं, पर जब भी रेलवे स्टेशन पर घिसटते फिरते अपंगो को देखता हूँ तो लगता है कि ये यहीं पैदा होते हैं, यहीं अपाहिज बनते हैं, और यहीं मर जाते हैं.
पता नहीं, यह भी हो सकता है कि जिनके भी हाथ पैर कट जाते हैं, उनके लिए रेलवे स्टेशन ही काशी काबा होते हैं.
कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि कुछ अपराधिया गिरोह हैं जो इनके हाथ पैर काट कर भीख माँगने के लिए इन्हे यहाँ छोड़ देते हैं. पता नहीं.
अभी पिछले बार जब मैं पत्नी के साथ दिल्ली जा रहा था तो एक पैर कटे लड़के को देख मुँह से निकल गया, “ये इतने अपंग कहाँ से आते हैं ?”
पत्नी ने मुँह सिकोड़ कर कहा, “पता नहीं ,पर देख कर जी खराब हो जाता है.”
भीख देते समय मेरा हाथ आगे पीछे होने लगता है पर उस दिन मैंने दस का नोट निकाला और इशारे से उस लड़के को बुलाया. वह झट घिसटता हुआ हमारी तरफ आया.
जैसे ही नोट मुट्ठी में भींचकर वापस सरपट जाने लगा तो मैंने रोक कर पूछा, ” रुको ज़रा, यह तो बताओ तुम्हारे ये दोनों पैर कैसे कट गए ?”
उसने भेदिया नजरों से मेरी तरफ घूरा, और बोला, “पता नहीं.”

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