पुरुष

बस रोज़ की तरह खचाखच भरी थी. एक लड़के ने जो वास्तव में पुरुष था अपनी सीट नहीं छोड़ी बल्कि खूब सिमट कर उसके लिये एक सीट बनाई. वह बैठ गयी. बस चली ही थी कि लड़के की जाँघ का दबाव उसे महसूस हुआ. लड़के की उम्र लगभग उसके बेटे की जितनी थी. बस की गति के साथ यह पुरुषनुमा लड़का उसकी ओर ढलने लगा. उसने अपना ध्यान हटाने की कोशिश की.
बस में केवल तीन औरतें और थी. उंनके साथ के पुरुषों ने उन तीनों को अपने हाथों और देह की दीवार में सुरक्षित किया हुआ था. उन तक केवल बहुत सी आँखें पहुँच रही थी. उसे अचानक औरत कि बहुमूल्यता का एह्सास हुआ तो उसने अपने पैर की सहमी हुई मासंपेशी को ढीला कर पुरुषनुमा लड़के की लंपटता के लिए छोड़ दिया.
वह रोज़ के अपने सफर में इस से कहीं ज़्यादा देख चुकी थी- अपने ऊपर ढहता हुआ आदमी, अपने वक्ष में चुभती हुई मर्दाना कुहनी, और इस से भी कहीं ज्यादा. उसे अचानक उस बस में आड़े टेढ़े बैठे खड़े सभी पुरुषों पर तरस आ गया. पुरुषनुमा लड़के पर भी. अपने पुरुष बन रहे बेटे पर भी. ख़ास तौर से अपने पति पर, जो घर पहुँचते ही उस से, क्या रहा, कैसा रहा, जैसे कुछ सवाल पूछेगा, इस मक़सद से कि किसी पुरूष से तो मुलाकात नहीं हुई थी.
वह बस से उतरी तो उसके चेहरे पर हँसी जैसा कुछ था,जो हँसी नहीं थी.

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