माँ का त्याग

प्रिय कांता जीजी,
नमस्कार !
याद है तुम्हें कान्ता, जीजी ? तुम हाँफती हुई दौड़ी आई थी.
” चल बबलू भाग! कमली ने बच्चे दे दिये.”
माँ बोलती रह गयी, ” अरे ठहरो, थोड़ी लापसी बनाती हूँ.”
हम पहुँचे तो दो नन्हे नन्हे बिलौटे कमली के पेट से चिपटे थे. तीसरा एक सफ़ेद झिल्ली में लिपटा था, कमली चाट चाट कर उस की झिल्ली साफ़ कर रही थी.
हम दोनों मूरत बने देखते रहे. कमली ने हमें घूर कर देखा था, निरीह चमकती आँखों से. और फिर वापस अपने बिलौटे को चाटने लगी थी.
याद है आपको ?
फिर माँ की आवाज़ आयी थी, ” कांता यह लापसी ले जा और कमली को खिला दे.”
तुम वापस आयी तो मुझे घूर कर बोली, ” बबलू, तीसरा बच्चा कहां गया ?”
मेरी आँखें फटी हुई थी. डर के मारे मेरी जीभ सूख गयी थी.
मैंने अटक अटक कर धीमे से कहा था, ” कमली… खा… गयी.”
तुमने रुआंसे होकर माँ को आवाज़ दी थी. ” माँ, माँ ! कमली अपने बच्चे को खा गयी.”
माँ को जैसे अंदेशा था, उसने दुखी स्वर में कहा था , ” यह भूक निपुति डायन है.”
हम चुपचाप लापसी का कटोरा कमली के आगे रखकर चले आए थे. हमें विश्वास नहीं हो रहा था कि एक माँ अपने बच्चे को कैसे खा सकती है.
हम बच्चे थे, माँ ने भी हमें पूरी बात नही बतायी थी. तुम्हें मैं क्या बताऊँ? तुम तो अब ख़ुद एक माँ हो, जानती हो. बस इसलिये बता रहा हूँ कि मुझे माँ का यह अनूठा त्याग अब समझ में आया है.
जीजी, अगर कमली अपने एक बच्चे को नहीं खाती तो उसे पता था कि उसके तीनों बच्चे भूक से मर जाते. उसे अपने बच्चों को बचाने के लिए छाती में दूध चाहिए था. मैंने उसकी आंखों में वह पीड़ देखी थी जब वह अपने को बच्चे खा रही थी.
उसे थोड़े ना पता था कि मेरी दीदी उसके लिए गर्म गर्म लापसी लेकर आ रही है.
अपना ख्याल रखना.
आपका सहोदर
बबलू

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