अनुराधा शर्मा सुपुत्री श्री ताराचंद शर्मा

अनु. पूरा नाम अनुराधा शर्मा सुपुत्री श्री ताराचंद शर्मा.
दो दिन पहले विकास के साथ भाग गयी. विकास का शर्मा जी के घर पर आना जाना था, मुहल्ला जानता है.
घर में सन्नाटा है. पड़ोस में घुसर फुसर है. गली में अटकलबाज़ियाँ हैं और गाँव में फैली हैं अफवाहें.
ताराचंद शर्मा ने घर में बैग रखते ही पहले पानी नहीं पिया, सन्नाटे को तोड़ा.
” मुझे कुछ मत बताइए, क्योंकि मुझे कुछ नहीं सुनना. मैं जानता हूँ मेरी लड़की के साथ कुछ बहुत ग़लत हुआ है.”
ज़रा रुके. फिर बोले, ” ऐसा प्यार वार कुछ नहीं होता है कि हाथों में पाली हुई लड़की एक दिन यूँ ही किसी के साथ भाग जाए.”
घर में सब चुप थे. बौखलाहट कम होगी तो कुछ बात की जाएगी.
शर्मा जी घर से बाहर आ गये. ज़ोर से पड़ोसियों को सुना कर बोले, ” मैं सब जानता हूँ, मेरी लड़की के साथ कुछ बुरा हुआ है.”
पड़ोसी हक्का बक्का थे. ” यह लो, अपनी औलाद को तो दोष नहीं देते. बुरा उसने किया है या उसके साथ हुआ है? दिमाग़ ही फिर गया है शर्मा का तो.”
शर्मा जी गली में आकर चिल्लाने लगे, ” कान खोल कर सुन लो, मुझे अच्छे से पता है कि मेरी लड़की के साथ कुछ बुरा हुआ है. और यही रपट लिखवाउँगा .”
गली में लोग एक दूसरे का मुँह देखने लगे.
” एक तो वैसे ही इज़्ज़त खराब हो गयी. अब यह ऊपर से और क्यों फ़ज़ीहत करवा रहा है.”
किसी ने कहा, ” बाप है भाई बाप है, बर्दाश्त नहीं हो रहा.”
शर्मा जी ने गाँव इकठ्ठा कर लिया. चबूतरे पर चढ़ गये. बस एक ही बात कि ‘ मेरी लड़की के साथ कुछ बुरा हुआ है. ऐसे ही नहीं भाग जाती कोई लड़की. पूरे देश को जवाब देना होगा’.”
तमाशा बन गया. अख़बार वाले आ गये. टीवी चैनल पहुँच गये.
इधर अनुराधा ने जयपुर स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठे पापा को बेतहाशा न्यूज़ चॅनेल पर चिल्लाते देखा तो धक रह गयी.
सूखी और सूनी आँखें, और एक ही रट- ‘ मेरी बेटी के साथ कुछ बुरा हुआ है.”
अनुराधा ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगी. सभी यात्री दंग और विकास की तो सिट्टी पिटी गुम.
१८-२० साल की लड़की एक ६ साल की बच्ची की तरह चीख चीख कर रो रही थी.
“मुझे पापा के पास जाना है. किसी को कुछ नहीं पता और सौ कोस बैठे मेरे पापा को सब पता है. मुझे पापा के पास जाना है.”
विकास ने हाथ लगाया तो झटक दिया. ” हाथ मत लगाओ मुझे. कोई प्यार वार नहीं है मुझे. और तुम भी क्या, बस नीची डाल का फल समझ कर तोड़ लाए हो. दूर हटो. सच पता लगेगा तो भाग निकलोगे.”
भाग निकली बस अड्डे की ओर. भीड़ हैरान थी.
” लगता है, पागल है? भाई अगर तू इसका घर जानता है तो ठीक से घर पहुँचा दे.”
विकास पीछे से आकर साथ चलने की कोशिश करता तो और आगे भाग लेती.
बस में आकर बैठ गये. अनु पापा का चेहरा याद कर के फफक फफक कर रो रही थी. हर आदमी से पूछ रही थी, ” यह बस नारनौल ही जाएगी ना?.”
विकास को नारनौल पहुँचने तक अपने प्यार को जीवित रखना था. जो कठिन था.
समय ना धीरे चल रहा था ना तेज़. अपनी रफ़्तार से- एक सेकेंड में सही एक सेकेंड.

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