पैसा वसूल

जैसे बिल्ली को लगता है चूहा मेरा भोजन है, कमीने गज्जु को लगता था औरत केवल मेरी वासना के लिए बनी है. ऐसा लंपट की कोई बहिन- बेटी वाला अपने घर नहीं बुला सकता. मंदिर भी इसलिए जाता था कि धक्का-मुक्की में लड़कियों को ग़लत जगह हाथ लगा सके. हरामी मेरा रूम-मेट था हॉस्टिल में.
शाम हुई नहीं कि बाल बना के लड़कियों की तलाश में निकल जाता था. एक अभद्र सी हँसी लेकर लौटता और अक्सर एक ही सवाल पूछता, ” यार, ये साधु-महात्माओं का कैसे चलता है. इनके चेहरे से तो लगता है मज़े करते हैं साले.”
” साधु भी बन कर देखले कमीने .” मैं अक्सर एक ही जवाब देता था.
” अरे नहीं यार, पता नहीं साला अकाल हुआ तो मेरे को तो दो ही दिन में भागना पड़ेगा.”
कॉलेज छूटा तो फिर हम कभी नहीं मिले. ऐसे गलीज़ दोस्तों को कौन ढूंढता है और ना ही वे लंपट कभी लौट कर देखते हैं.
अभी पिछले दिनों एक धार्मिक चॅनेल पर हरामी को देखा तो मैं हक्का-बक्का रह गया.
परम पूज्य श्री गजेंद्र जी महाराज. फूलों के मंच पर आसीन हैं. दो शिष्या अगल बगल में और भक्तों की भीड़ सामने बैठ उसकी घिसी पिटी धार्मिक बकवास सुन रही है. यह तो पहुँच गया हरामी! मैंने फटाफट स्क्रीन पर भागते नंबर नोट किए.
पता चला रेजिस्ट्रेशन के ५०० रुपये, सत्संग के २५०० और विशिष्ट भेंट के १०००० रुपये. मुझे लगा यह तो साला १०००० का चूरा करना ही पड़ेगा. महीने भर के बाद भेंट का समय मिला.
स्थान था माला बार हिल का एक आलीशान बंगला जिसको खूब सारा धार्मिक मेकअप किया हुआ था.
दो घंटे और तीन द्वार पार करके मैं गज्जु , माफ़ करना, गजेंद्र महाराज के समक्ष था. उसने मुझे गौर से देखा जैसे कोई एक्स-रे की प्लेट देखता है.
एक शिष्या ने कहा, ” आपको जो भी पूछना है, बस ५ मिनिट का समय है.”
” इस कमीने को दो मिनिट झेलना भी मुश्किल है.” मैंने मन ही मन कहा.
मैने धीरे से कहा, ” अब तो पता चल गया होगा?’
वह ज़ोर से बोला, ” शरमाना क्या है वत्स ज़ोर से कहो….यह भक्त जानना चाहता है कि साधु संत अपनी कामपिपासा कैसे शांत करते हैं.”
फिर रुक कर बोला, ” देखो बच्चा, जब आप संत बन जाते हैं ..सच्चे संत.. तो आपकी वासना मर जाती है. समाप्त हो जाती है.”
मैने पूरे ज़ोर से अपनी हँसी रोकने की कोशिश की और हुआ यह कि मेरे थूक का एक बड़ा सा लुगदा सीधे गजेंद्र महाराज के अधोवस्त्र के बीच जा के गिरा और एक गीला नक्शा बन गया.
ओह, यह क्या हुआ!
एक शिष्या बोली,” यह क्या अशिष्टता है, अब पूजनीय को वस्त्र बदलने पड़ेंगे… आइए प्रभु अंदर चलिए.” गजेंद्र मुझे खा जाने वाली नज़र से घूर रहा था और शिष्या उसे ऐसे पकड़ कर ले जा रही थी जैसे बच्चे का डाइपर बदलना हो.
मैं वहाँ से खिसक लिया. सोच रहा था बचपन में हमने थूक से बहुत काम किए- सुई में धागा डाला, स्लेट साफ की. पर आज तो कमाल ही कर दिया: पैसा वसूल.

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s