जीनीयस था वह, विक्षिप्त नहीं.

बेतरतीब खिचड़ी बाल, झंखाड़ सी दाढ़ी. नीचे बरमूडा और ऊपर जॅकेट. दाढ़ी के नीचे से चमकती, आँखों और कानों तक फैली, एक अजीब सी मुस्कुराहट. ऐसा लिबास और ऐसी मुस्कुराहट पहनने का साहस ही अर्धविक्षिप्तता है. ऊपर से उसकी पुतलियों में एक लेज़र पॉइंट सा था, जिसका पलका लगते ही नज़र हट जाती थी. लगता था रुके कि बोल पड़ेगा.
आस पास के सब लोग बगल झाँकने लगे. वह अपनी लेज़र सबके चेहरे पर मार मार कर देख रहा था. मैं बिना देखे भी उसे देख रहा था.
“बताइए तो अब भगवान अवतार क्यों नहीं ले रहे?” उसका प्रश्न सब के लिए था. जो उसकी आवाज़ सुन रहे थे उनके लिए भी, और बाकी जो इस दुनिया में थे उनके लिए भी.
सबके पास अपना आधा अधूरा जवाब था पर कोई नहीं बोल रहा था. कोई उससे उलझना नहीं चाह रहा था. मैं भी नहीं.
शायद मेरी अवहेलना से चिढ़ कर उसने मुझे ही पकड़ लिया.
‘आप ही बताइए कुछ, क्यों नहीं जन्म रहा है ईश्वर का नया अवतार?”
मैने पल्ला झाड़ने के लिए कह दिया, ” मैं तो ईश्वर को मानता ही नहीं.”
‘वह चौंका नहीं, हँसा नहीं और अपने मंसूबे से हिला नहीं.
” यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है, सर. आपने भगवान के अवतार लेने की कहानियाँ तो पढ़ी होंगी? कहानी में ही सही पर क्यों नहीं धरती पर उतर रहा है भगवान?”
सब चुप थे. लगा रहा था दुनिया ही चुप है उसके प्रश्न पर.
वह खुद ही बोला, ” मैं बताता हूँ.”
सबकी नज़रें उठी.
” अब कोई राजा नहीं है. राजा ईश्वर का रूप होता है. अब कोई नहीं लिखेगा ईश्वर के अवतार लेने की कहानी. अब कोई ईश्वर अवतार नहीं लेगा.”
मैं उसका चेहरा देखता रहा. जीनीयस था वह आदमी, विक्षिप्त नहीं.

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s