यानी वसुधा

सुंदर चेहरा, सहमा हुआ बदन, और पथराई सी आँखें. यानी वसुधा.
सातवीं पास करते ही जब स्कूल छूटा तो उसे लगा जान छूट गयी. नहीं छूटा तो वह बुरा सपना.
आँखें बंद करते ही उसे लगता है मास्टरजी का हाथ केंकड़े सा उसकी पीठ और कंधों पर सरकने लगता है. वह और ज़ोर से आँखें बंद कर लेती हैं. मा दुर्गा को जपने लगती है. हाथ धीरे धीरे गायब हो जाता है.
वसुधा धर्म कर्म में समा गयी है. व्रत और पूजा छोड़ दुनिया से कोई मतलब नहीं रहा.
शादी हुई तो मा ने कहा था,” देखो कुंवर जी, हमारी सुधि का पूजा पाठ में बहुत मन है. आजकल वालियों की तरह नहीं है. कभी नाराज़ मत होना.”
सुहाग रात आई तो नीरज का हाथ लगते ही वसुधा ने आँखें मूंद ली. मा दुर्गा को जपने लगी. पर हाथ था कि रुका ही नहीं. अचानक एक झन्नाटेदार थप्पड़ नीरज को लगा. वह तमतमा गया. उठ कर जाने ही वाला था कि वसुधा ने हाथ बढ़ा कर उसका घुटना ज़ोर से पकड़ लिया.
आँसू झरने लगे. ” नहीं प्लीज़, जाइए मत. मैंने आप को नहीं मारा. आप तो मेरे सब कुछ हैं. प्लीज़ मेरी बात सुनिए.”
रोते जा रही थी, ” मुझे माफ़ कर दो. मैंने आपको नहीं मारा.”
नीरज को कुछ समझ नहीं आ रहा था. वसुधा की आँखों में सचाई थी.
वह नीरज से लिपट कर रोने लगी. उसने स्विच ऑफ कर दिया.नीरज का कुर्ता आँसुओं से गीला हो गया था. वह उसके बाल सहला कर उसे चुप करा रहा था. उसके चेहरे पर एक स्मित सी मुस्कान थी.
दूसरे दिन वसुधा बहुत देर से उठी. उसका बदन सहमा हुआ नहीं था. उसकी आँखों में पथराहट नहीं थी. पहले से भी सुंदर लग रही थी.
सास ने आवाज़ दी , ” बहू, पूजा नहीं करोगी. समधिन तो कह रही थी….”
उसने धीरे से नीरज के कान में कहा, ‘ आज मन नहीं है. देवी देवता कोई नाराज़ थोड़े ही ना होते हैं.”
नीरज ने ज़ोर से कहा, “नहीं मा, आज वसुधा पूजा नहीं करेगी!”
सास कुछ और ही समझी, ” कोई बात नहीं बेटे आज मैं दीया जला देती हूँ .”

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