खाई भर गई

खाई खुद चुकी थी .
खाई लगभग उतनी ही गहरी और लम्बी थी , जितनी की बीती रात .
भाई, चाचा, बाप, और दादा , जिन चारों को मेहँदी चढ़ानी थी , सबने मिलकर रात भर में खाई खोदी. पास बंधी भैंस , अपने ठान में इस अटपटी क्रिया को देख कर बेचैन होती रही.
मां को वापस लाना था गीता को, जो पता चला था वेलकम गेस्ट हाउस कुरुक्षेत्र में उस लड़के के साथ है .
गीता ने सबकी नाक कटवा दी है. उसे मरना ही होगा. मां जिसने इस घर में तीन पुरुषों को सम्भाला है और एक को पैदा किया है , वह भी मानती है , गीता को मरना ही होगा .
गेस्ट हाउस पहुंची तो मां के होंठ सूखे हुए थे . मैनेजर ने रूखा सा जवाब दिया , ” गीता ? और वह लड़का ? आज सुबह चले गए .”
मां घर लौटी तो अँधेरा हो चुका था . पुरुषों को दीया बाती का ध्यान नहीं रहता है .
उसने दो बार दरवाज़ा खटखटाया . कोई आवाज़ नहीं आयी. तीसरी बार किसी के कदमों की आहट सुनाई दी.
” गीता ? तुम ? यहां ?” मां ने एक बार में तीन प्रश्न किये.
“मैं सुबह ही आ गई थी. कहाँ गयी थी तुम? मैंने सबके लिए खीर बनाई है. मेरे और तुम्हारे हिस्से की रखी हुई है .” मां का कलेजा खिसका . वह भैंस के पास दौड़ कर गयी . भैंस जुगाली कर रही थी . खाई भर चुकी थी. मां हांफती बाहर आयी .
“कहाँ हैं सब ?”
“बताया ना सबके लिए खीर बनाई थी.”
मां के घुटने कांपे . वह वहीँ धंस गयी
“तेरा भाई भी ?”
गीता चुप खड़ी थी .

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