मारू की व्यथा

४ साल की थी जब ब्याह हुआ, और १२ की होते ही सास का उलाहना आ गया.
” सग़ी जी सै कहीयो म्हारा बेटा नै बुढ़ापा लै ब्याह थोड़ा ना करो. एक तो दो लत्ता में थारी छोरी रो हाथ पकड़ लियो.”
बस लड़की के माँ-बाप के लिए इतना ही काफ़ी होता है
दूध बिलौती सास ने मारू को मुँह अंधेरे ही नीचे आते देखा तो टोका, ” जल्दी काही बीननी, माई री याद मैं नींद कोनी आई, के म्हारा डालू से काही कही सुनी हो गयी.”
सास का इतना बोलना था कि मारू फफक फफक रो पड़ी.
” सूनसामन या के करा हा बीननी पहिला दिन ही. दुनियारा मर्द तो कसाई होवी, तकदीर थारी आछी समझो.”
डालू अच्छा था. पर पुरुष था, पूरा पूरुष.
मारू जबड़ा भींच भींच रोती रही.
” के माई री याद आवै?”
मारू की फिर छाती उझल आई.
दो चार दिना बाद मिलबा चली जाबो.”
दो चार दिन में दो चार रात आएँगी सोचकर मारू का जी घुट गया, उल्टी सी आने लगी.
मायके आई तो दौड़ कर माँ से लिपट गयी और बिलख बिलख रोई.
” ना रे मेरी लाडो, आइयाँ ना कर. सग़ी जी तो आच्छे से राखे ना?”
सुनकर, मारू माँ की गोद में गुस्से से सिर पीटने लगी.
” कुंवर जी ख्याल राखी ना?”
अब के रोते रोते मारू ने माँ की बाहों को नोंच लिया.
बापू मुँह फेर कर चला गया. भाई की छाती भर आई तो वो भी उठ के चल दिया.
अब मेरी बारी है.
मैं बाप बना. मैने चाकू उठाया और काँपते हाथों से वहीं रख दिया.
मैं भाई बना, मैने फिर चाकू उठाया. ” पहले बाप को घोपूँगा और फिर बहनोई को.” मगर अंजाम सोच कर मैंने फिर क्रोध से काँपते हाथों से चाकू वहीं रख दिया.
मैं आख़िर डालचन्द बना, मैने चाकू उठाया और पूरे ज़ोर से अपने सीने में भोंक लिया. मैं खून से लथपथ पड़ा, मुस्कुराता, सोच रहा था मैंने क्यों आत्महत्या की, दुनिया कैसे जानेगी.
मेरे पास शब्द नहीं थे मारु की व्यथा लिखने के लिए. पर कोई ज़रूर लिखेगा, मेरी आत्महत्या का कारण और मारू की व्यथा कथा. अभी तक तो वह नादान बस रोई है, बिलख बिलख कर… दाँत भींच कर… सर मार मार कर… बस रोई है.

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