तेरे बिन सूने ….

औरत उस अलौकिक संगीत की तरह है जो बजता है तो आनंदित करता ही है, मगर जब याद आता है तो फिर मन में बजने लगता है, और उतना ही आनंद देता है.
– माँ को ही देखो. जब थी तो गाँव में कहती थी, ” आज भरवाँ बैंगन बनाए हैं, अनुज को बहुत पसंद हैं.” और मुझे बंबई में सुनाई देता था. अब नहीं हैं तो लगता सब तरफ बस माँ ही है.
– माँ ही नहीं, प्रेमिका को लीजिए. कोई औरत एक बार आँखों में बस जाए तो जन्म भर एक ही तस्वीर दिखाई देती है .
– और बेटी… बस पूछिए मत. हर बाप को पता है. जब पास होती है, घर में चहकती रहती है, और जब दूर चली जाती है तो भी उसी की याद से घर महकता है.
मैं सोच ही रहा था कि आवाज़ आई, ” अब लॅपटॉप लेकर इस बीन बॅग में ही धन्से रहोगे! ११ बज गये. यह भी नहीं कि नहा कर बाथरूम को अच्छे से साफ कर दो.”
पत्नी जब डाँटती है तो आपका चेहरा नहीं देखती. पर उस दिन पंखा साफ करते उनकी नज़र मेरी आँखों की नमी पर पड़ गयी, जो अभी अभी गुज़रे ख्यालों की फुहार थी.
” क्या हुआ अब?” उनकी आवाज़ धँस सी गयी.
” कुछ नहीं जी, बस सोच रहा था आप नहीं होगी तो कैसे जी पाऊँगा.”
फिर बिगड़ गयी, ” बस मेरे मरने के ही ख्वाब देखते रहा करो. उम्र से पहले ही सठिया गये हो. उठो यहाँ से.”
मैं गुनगुनाता हुआ उठा, ” तेरे बिन सूने नयन हमारे..”
बाथरूम में जाने से पहले कोई ना कोई गाना होंठो पर आ ही जाता है.
मुझे पता है, वे बाहर से एक बार फिर झिड़क कर बोलेंगी, ” कुछ गाना आता तो पता नहीं क्या करते. जल्दी निकलो.”
बताइए क्या है ज़िंदगी…ऐसे साथी के बिना…एक शून्य… एक खला.

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