पहला पन्ना राम का

अपनी दर्शनिकता की झील में अर्धमग्न प्रोफेसर वशिष्ठ को समझ नहीं आ रहा कि उनकी चिंता कितनी अर्थपूर्ण है. पत्नी से भी नहीं बता सकते. उन्हें याद आ रहा है अपना पहला प्यार, जो एक ताबीज़ की तरह जीवन भर उनके साथ रहा है. ना कभी लड़की से दिल की बात कह पाए, बस दो साल तक बावले हुए फिरते रहे थे .

पहला प्यार किसी नीची डाली के फल की तरह पाने या हथियाने के लिए नहीं होता है, बल्कि वह तो एक झंझावात होता है जिसमें से गुजरना होता है. भूख बंद हो जाती है, किसी काम में मन नहीं लगता- या तो वही या कुछ भी नहीं- यह सारी कायनात उस एक इंसान के बिना बेमानी लगती है. सच है, बिल्कुल सच है. मगर वह तो एक इम्तिहान होता है, इंसान को ज़िंदगी के लिए तैयार करने का. यह नहीं की जी बस प्यार हो गया, पापा-मम्मी ने हाँ कर दी जी, कर लो शादी.

” यह क्या हो गया है इस नयी पीढ़ी को. सब कुछ इतना सरल, इतना सहज. औंधे मुँह गिरेगे यह देख लेना.” मन ही मन बुदबुदाते हैं.

फिर मन में प्रार्थना सी करते हैं- “जैसे भी हो बच्चे का दांपत्य जीवन सुखी और सफल रहे.”

अपनी हर बहस में उन्होनें दावे के साथ कहा है- “पहला प्यार कभी सफल बंधन हो ही नहीं सकता है. प्रेम को समझने की एक प्रक्रिया होती है, वह तो. एक विकट प्रक्रिया. उस से अगर आप गुज़रे नहीं तो ना आप प्रेम करने के काबिल हो पाएँगे, और ना ही एक अच्छे पिता या पति हो पाएँगे. यहाँ तक कि अच्छे इंसान भी नहीं बन पाएँगे.”

“क्या सोच में डूबे हो जी अब तो सब कुछ अच्छे से तय हो गया.” पत्नी ने चहक कर चुप्पी तोड़ी.

” बस ऐसे ही… तुम्हें लगता है शिखा से मिलने से पहले भी कभी विशाल के दिल में किसी के लिए प्यार रहा होगा.”

” ये लोगों के दिलों में ताकने झाँकने का काम आपका है, मेरा नहीं. ” , पत्नी ने चिढ़ कर कहा. और फिर थोडा सहज हुई , “आप अपनी ही बताओ ना, आप को किसी से प्यार हुआ था शादी से पहले….हुआ होगा तो आपको ही पता है ना. माँ पिताजी से कोई पूछकर देखता- ‘हमारा लड़का तो राम है, दूसरा राम!’ ”

थोडा विराम लिया, फिर मन की गहराई में डूब कर बोली, ” समझ लो, पहला पन्ना राम का जी . दुनिया के लिए जो लिखना है आगे लिखो. ”

– ‘ओह, इसका मतलब इन्होनें भी एक पन्ना तो छोड़ा हुआ है.’ वशिष्ठ जी मंद मंद मुस्काये.

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