प्रेम, परिवर्तन, और पतन

जब, तब वह एक नवयुवक था, नादान था. वह उगते हुए सूरज को देखकर खुश हो जाता था. रात उसके लिए सपनों की दुनिया थी. ईश्वर को वह एक प्रकाश-पुंज समझता था. जब, तब उसे वह लड़की बहुत अनोखी लगती थी. उसे देखे बिना मन को चैन नहीं आता था. दिन रात उसी के साथ हंसते खेलते रहना चाहता था. जब, तब उसकी मौसी दिन रात उस पर निगाह रखती थी क़ि नादानी में लड़का कुछ ग़लत नहीं कर बैठे. दूर बैठी उसकी माँ को भी यही चिंता सताती थी. तब, उसने उस लड़की को कभी छुआ तक नहीं. छूने का ख्याल भी उसके दिल में नहीं आया.

अब, जब वह पुरुष हो गया, समझदार हो गया. उगते सूरज के साथ उसके मन मे बहुत से फ़िक्र जागने लगे. रात एक उधेड़बुन होकर रह गयी. उसे लगने लगा ईश्वर कोई है जिसकी मनुष्य से सांत-गाँठ है. अब, बस उस स्त्री हो चुकी लड़की की देह-यष्टि उसे खींचने लगी. वह उसके साथ हँसने खेलने की सोच भी नहीं सका. उसे नज़दीक पाते ही उसके बदन में कंपन सा होने लगा. मौसी की फ़िक्र दूर हो गयी कि वह अब ज़िम्मेदार हो गया है. माँ ने भी चिंता करनी बंद कर दी थी . अब, एक दिन समय पाते ही उसने उस स्त्री हो चुकी लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाया, और अपनी राह पर निकल गया.

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