निरर्थकता

जब वह उदास होता तो दफ़्तर से सीधा बार में जाता था. देर तक शराब पीकर घर लौटता और अपनी कल्पना में किसी खूबसूरत औरत की बाहों में लिपटकर सो जाता था.
जब वह खुश होता तो भी दफ़्तर से सीधा बार में जाता था. देर तक शराब पीता, किसी वैश्या को लेकर होटेल में जाता और उसके शरीर से खेलकर सो जाता था.
जब वह दुखी होता त्तो भी दफ़्तर से सीधा बार में जाता था. देर तक शराब पीता और घर आकर पत्नी की गोद में सर छुपा कर खूब रोता और थक कर सो जाता था.
उस दिन वह ना उदास था, ना खुश था, ना दुखी था. फिर भी ना जाने क्यों दफ़्तर से सीधा बार में गया और खूब शराब पी.
ना उदासी, ना खुशी , ना दुख- बस निरर्थकता
थी, नितांत निरर्थकता. वह झेल नहीं पाया. सीधा स्टेशन गया और चलती गाड़ी के सामने अपने आपको फेंक दिया.
भीड़ चिल्लाई, ” क्या हुआ ! क्या हुआ !”
एक आवाज़ आई- ” कुछ नहीं भाई, बिना बात पी लेते हैं लोग, फिर होश रहता नहीं है.”

हाथ लंबा कर, छोटू!

किरण भाई की अचानक नींद खुल गयी. लगा, बापू ज़ोर ज़ोर से आवाज़ लगा रहें हैं- ‘ हाथ लंबा कर, छोटू! हाथ लंबा कर !’
छोटू , घर का नाम है किरण भाई का. बापू को मरे १५ साल हो गये, आज तक कभी सपने में नहीं आए.
लगा कल ही की बात है. उस साल आम अच्छे नहीं उतरे थे. बापू ने उसको हर साल की तरह कंधे पर चढ़ा रखा था.
” बहुत ऊँचे हैं बापू, हाथ नहीं आएँगे?’
बापू का जवाब था, ” आदमी के हाथ बहुत लंबे होते हैं छोटू! बस इतने ही नहीं जितने दिखते हैं. देख, तू मेरे कंधे पर खड़ा हो जा, तेरे हाथ और लंबे हो जाएँगे.”
“मगर फिर भी नहीं पहुँचेंगे, बापू!”
“अरे तू देखता जा.” बापू ने अपनी एडी खड़ी कर ली.
“अभी भी एक बिलांद दूर हैं आम की डाली.”
“अरे रुक! मैने बोला ना आदमी के हाथ बहुत लंबे होते हैं.”
बापू फट से चार ईंट उठा कर लाए. फिर से सारा उपक्रम किया.
बोले, ” खींच डाली को अब !”
एक नहीं पाँच आम थे छोटू की झोली में.
किरण भाई ने आँख मली. चार महीने से धंधा ठप पड़ा है. लगता है टेंशन बापू बनके खोपड़ी में घुस गया है.
किधर आई एस का इराक़ में पंगा और किधर शारजाह में गोल्ड का धंधा. पर आज की दुनिया में कौन मरता है किस का सुहाग लुटता है साला पता ही नहीं चलता. मुन्ना भाई को बोलो तो रेसेसन पर लेक्चर सुनलो. बापू ही कुछ करेंगे लगता है.
हाथ लंबा कर छोटू ! हाथ लंबा कर !
फ़ोन उठाया, ” नदीम भाई, सुनो! सऊदी के लिए मर्तासिया बनाएगा अपन. आ गयी डाइ भी, कारीगर भी ,सब आ गया.’
मुन्ना भाई की आँख खुली तो भड़क गये, ” ए किधर से बनाएगा यार, बिना बात की बात कर रहा है. .”
“आदमी के हाथ बहुत लंबे होते हैं मुन्ना भाई ! मार्केट से उठाएँगे , ५० पैसे लेके आगे दे देंगे. आई एस की ऐसी तैसी!”
किरण भाई बॉल डांस सा कर रहे थे
“.. और. वो लेबर कंपनी को रोज़ कितने टिफिन चाहिए? मैं जा रहा हूँ कांट्रॅक्ट करने. अपन सप्लाइ करेंगे.”
मुन्ना भाई चौंक के उठ बैठे.
किरण भाई तैयार हो के सीटी बजाते निकल गये . पैर खुद ब खुद उठ रहे थे . लग रहा था जैसे बॅकग्राउंड में गाना बज रहा है.
आई एस की… ऐसी तैसी… रेसेसन की… ऐसी तैसी….
अरे हाथ लंबा कर.. छोटू ! हाथ… लंबा….कर !

मैं और मेरी नायिका

” कोई विकल्प नहीं छोड़ा है आपने मेरे लिए. बताइए, कैसे करनी है मुझे आत्म-हत्या? गले में फँदा डाल कर, तेरहवीं मंज़िल से कूद कर, या कुछ और है आप के मन में?”
चारूलता की वाणी में आवेश था, और पीड़ा पिघल कर आँखों से बह रही थी.
सब जानते हुए भी विस्मय का भाव लिए मैं उसे देख रहा था.
“मैं जानती हूँ विक्रमजीत अब कभी नहीं लौटेगा. और यदि आप सोच रहें हैं कि मैं जीवन भर विरह की ज्वाला में जल कर लोगों की सहानुभूति की प्रतिमा बनूँ तो यह आपका भ्रम है. मैं जान दे दूँगी…’ उसका स्वर टूट गया और वह फूट फूट कर रोने लगी.
नायिका के लिए इस तरह रोना अपेक्षित भी है और अनिवार्य भी.
मैं जानता था रो कर थक जाएगी तो असहाय नज़रों से मुझे देखेगी. मन में जाग रहे पितृ भाव को मैंने दबा दिया.
मैने अपने स्वर को साध कर कहा, ” आगे क्या होगा तुम्हें कुछ नहीं पता. आत्म-हत्या और जीवन भर के विरह के बीच बहुत और कुछ है अभी. तुम जाओ अपने कमरे में, मेरे पाठक तुम्हें उस सलवट विहीन सेज पर विक्रम की याद में आँसू बहाते देखना चाह रहे हैं. जाओ, मेरा विश्वास करो, जितनी मुझे तुम्हारी चिंता है और किसी को हो ही नहीं सकती.”
चिंता, मात्र चिंता नहीं थी, मैं जानता हूँ.
सोच रहा था- ‘अभी तो राघव को आना है, चारू. एक परिपक्व प्रेमी, जो विक्रम की तरह केवल तुम्हारी देहयष्टि और निर्मल सौंदर्य से नहीं बल्कि तुम्हारे उस उदात स्त्रीत्व से प्यार करेगा, जिससे मैं तुम्हें नवाजूँगा. तुम्हारी विरह वेदना तो मैं प्रेम की वृष्टि से शीतल कर दूँगा. मगर..’
लगता है रोकर चारू की आँख लग गयी थी.
मगर मैं विचलित था- ‘ तुम कभी नहीं समझ पाओगी, मेरे प्रेम को चारू ! झुलस तो मैं रहा हूँ. तुम बस मुझे आदर भाव से देखती रहोगी, यह सोच कर कि मैं तो बस पकी हुई दाढ़ी, बिखरे बालों वाला एक हृदयहीन लेखक हूँ. मैं प्रेमी कैसे हो सकता हूँ.’
सच यह है कि तुम मेरी ही प्रेयसी हो. विक्रम और राघव तो मेरे प्रेम का अंशमात्र हैं.

आशीर्वाद

उसने मेरे पैर छूए तो आधे घूँघट में खड़ी औरत ने बताना ज़रूरी समझा, “विवेक है, बिमला का लड़का. याद होगी ना बिमला तो?”
मैने संभल कर जिस आत्मीयता से उस गबरू के कंधे पर हाथ रखा, पूछने वाली को जवाब मिल गया होगा. बिमला कभी भूली नहीं जाती है. अकेलापन समझ आने से पहले ही वह नीची पलकें किए जीवन में आ जाती है, और फिर आख़िरी साँस तक- ना कभी छूती है, ना कभी बोलती है- साथ साथ रहती है.
मैंने सोचा एक तरफ लेकर विवेक से दो बात करूँ. मैं कुछ कहता कि वह ऐसे शुरू हुआ जैसे ढूँढ कर मुझे पाया है.
” माँ हमेशा आपकी बात करती थी. रोज़ याद दिलाती, ‘विवेक, तुझे महेश के जैसा बनाना है. देख, वो भी तो इसी गाँव में पैदा हुआ था.’ इतना सब कुछ बताती थी आप के बारे में- ‘ बचपन से ही ईमानदार, नेक दिल और मेहनती था . तभी तो देख आज कहाँ से कहाँ पहुँच गया.’ मेरे लिए आप आदर्श हैं अंकल !’
मैने बेचैनी में फिर उसके कंधे पर हाथ रखा,” हाँ, खूब मेहनत करो बेटे. तरक्की करो.” मेरे शब्द खो गये थे. मैं आकर अपनी कार में बैठा और निकल पड़ा.
मेरे दिमाग़ में उथल पुथल मची थी, ” महेश जैसा बनना? आदर्श?”
मेरा जीवन चलते चित्रों में मेरी आँखों के सामने आ गया. वाय्स ओवर में मेरी ही आवाज़ थी.
“महेश की यह विशाल कोठी है जो हथियाई हुई सरकारी ज़मीन पर बनी है. यहाँ तक पहुँचने के लिए कितने राजनेताओं की घिनौनी हरकतों पर परदा डाला है उसने. कितनी जालसाज़ियों में भागीदार रहा है…. तुमने तो यह कभी जाना ही नहीं बिमला… साथ थी पर तुम तो मुझे देख भी नहीं रही थी. तुम्हारा बेटा मुझ जैसा बनना चाहता है. मुझ से आशीर्वाद लेकर… नहीं बिमला!”
मैने अपने सर को बॅक सीट पर फैंक दिया.
” विवेक ! मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम महेश जैसे बनो… मुझ जैसे नहीं… बिमला के महेश जैसे!”

उसकी मुस्कराहट, मेरी हँसी

मौसम सुहाना था तो मेरे कदम खुद बखुद बढ़ रहे थे. मैं जनपथ से रेस कोर्स रोड की तरफ मुड़ गया.
इतने में मुझे एक फटी हुई जूतियों का जोड़ा पड़ा दिखा . एक जूती में अंगूठे के बाहर निकलने से छेद हुआ था और दूसरी एड़ी पर से छितरी हुई थी . मैं इन जूतियों को पहचानता था. थोड़ा और आगे गया तो एक पगड़ी पड़ी थी ; मैली – कुचली पर ज्यों की त्यों, जैसे सीधी सर से नीचे गिरी हो . मैं इस पगड़ी को भी पहचानता था. इस आदमी का नाम मातादीन था , और अभी कुछ दिन पहले इसने सूखे और ऋण से तंग आकर आत्म हत्या की थी. मगर इसकी जूतियां और पगड़ी यहां क्यों पड़ी थी? मेरा कुतूहल बढ़ा तो मैं थोड़ा और आगे गया.
आगे एक आदमी खड़ा था, सफ़ेद उजले कपड़ों में . उसके कपड़ों का उजलापन अभद्रता की हद से बाहर था . असहनीय था. ऊपर से उसके चहरे पर एक मुस्कराहट थी, बेशर्म सी, लापरवाह मुस्कराहट. मेरे पास कोई चारा नहीं बचा था. मैंने अपनी रिवाल्वर निकाली और छह की छह गोलियां उस के सीने में दाग दी. मैं जानता था मुझ पर हत्या का मुकदमा चलेगा , धारा ३०२ के तहत.
मैं कटघरे में खड़ा था . सरकारी वकील ने मुझसे पुछा , ” बाकी तो सब साफ़ है पर यह बताओ उस रात जब तुम घूमने निकले तो तुमने क्या सोच कर गोलियों से भरी रिवाल्वर अपने साथ ली थी. मेरे पास जवाब था. मैंने इत्मीनान से कहा , ” मीलोर्ड, उस रात मौसम बहुत ही खुशगवार था. ठंडी हवा चल रही थी. आसमान में पूरा चाँद खिला था , पूरी दिल्ली जिसकी चाँदनी में नहा कर दुल्हन सी लग रही थी. ऐसे में आप ही बताईये मीलोर्ड कि एक शरीफ आदमी अपनी रिवाल्वर , अगर उसके पास है तो , क्यों नहीं गोलियों से भर कर निकलेगा .”
जज साब ने चकित होकर अपने चश्मे के ऊपर से मुझे देखा. मैं हँस दिया . मेरी हँसी में पागलपन था. फकत पागलपन .
मैंने सरकारी वकील की तरफ मुंह बिचका कर देखा और मन ही मन कहा , ” मेरे फ़ाज़िल दोस्त, मुझे कानून मत सिखाओ.”

निपुण सेक्रेटरी

(लालच, फरेब, और धोके की एक लम्बी कहानी का गुद्दा गुद्दा )
सेक्रेटरी अपने काम में निपुण थी. स्मार्ट थी, मगर उसके कर्वस छोटे थे यानी ‘s’.
इसको भी काम का ज्ञान था, सेक्सी थी, स्मार्ट भी, और इसके कर्वस बड़े थे, यानी ‘S’.
इधर, बॉस ने लंबी साँस लेकर कहा, ” ‘S’, वी हॅड ए वंडरफुल टाइम. मैं तुम्हें हमेशा मिस करूँगा. मैं हमेशा के लिए इंडिया से बाहर जा रहा हूँ. ..एंड दिस ईज़ फॉर यू. मेरी तरफ से पार्टिंग गिफ्ट.”
” वाउ” सोने का हार देख कर ‘S’ की आँखें लार से भर गयी, ” सो स्वीट ऑफ यू!”
“मगर मैं इसे घ र कैसे ले जाऊंगी? मेरे हसबेंड से क्या कहूँगी?”
“ओह, वी मॅन आर रियली ए स्टुपिड बंच…. कुछ करता हूँ…. ( सोच कर) ‘ s’ से एक छोटा सा बॅग बनवाए देता हूँ. उसकी चाबी नहीं होगी. तुम्हारे पति को ताला तुड़वाना पड़ेगा. उसमें तुम्हारे सीधे सादे पति के लिए एक i- फोन भी होगा.” बॉस अपनी चतुराई पर बलिहारी था.
उधर , पति ने जान पूछ क र फिर दोहराया, ” यह तुम्हारी बुद्धू चचेरी बहन कब तक यहाँ और रहेगी. डफर है (यानी D) कुछ काम नहीं कर सकती. ”
उसे वही उत्तर मिला जो चाहता था, ” नहीं नहीं, देखो उसे काम सिख़ाओ, आप सारे दिन भागे फिरते हैं, मुझे कितना बुरा लगता है. उस से कहो, मैं भी बोलती हूँ, सारे इंशोरेंस के फॉर्म तो भरती रहे, घर पर बैठी. पर उसकी शादी तक हमें ही संभालना है. चाचा जी से वादा किया था. ”
एक हफ्ते बाद भोले से अंदाज़ में अपने पति को छोटा नीला बॅग थमाते हुए ‘S’ ने कहा, ” कितने दिन से यह बॅग मेरे कैबिन में पड़ा है. सब से पूछ कर देख लिया. इसे ले जाओ, ताला खुलवा कर तो देखो.”
पति ने त्योरी डाल कर मुस्कुराते हुए कहा, ” और कुछ कीमती निकला तो?”
” आपका!…. हाँ बस कुछ जुएलरी निकली तो मेरी.”
एक घंटे बाद पति का फ़ोन आया, ” कमाल हो गया. इसमे तो एक i- फोन है. मुझे कितने दिन से चाहिए था. और तुम विश्वास नहीं करोगी. जुएलरी भी है. मैं अभी आ रहा हूँ.”
‘S’ का भाव था जैसे कोई चश्मदीद को सुनी हुई बात बता रहा हो.
” देखो.. !”
‘S’ आश्चर्य से घूर रही थी. ” यह अंगूठी..बस.. तुम तो कह रहे थे ज्वेलेरी?”
” अरे कम से कम डेढ़ तोले की है. और डाइमंड भी लगा है.”
‘S’ सकते में थी. यह क्या हुआ?
तीन दिन बाद ‘S’ और हसबैंड को एक पार्टी में जाना था .
” तो चलो अब कितनी देर और लगाओगी? ” पति ने शिकायत के स्वर में कहा .
“मैंने उस बुद्धू को भी बोल दिया है . अकेली यहां क्या करेगी . ”
‘D’ नीचे उतरी तो उस गले में हार जगमग कर रहा था .
‘S’ पार्टी में भुनती रही.
घर लौटते ही बहाना बना कर ऊपर के कमरे में गयी . ‘D’ की एक तमाचा लगाया .
” कमीनी! जिस थाली में खाती है उसी में छेद करती है. उन्होंने दिया है ना यह हार ?”
‘D’ ने मुस्कुरा कर कहा , “बॉक्स के साथ दिया था उसके लाल मखमल के नीचे एक लेटर भी था . वह मैंने जीजा जी को नहीं बताया है.”
दूसरे दिन ‘D’ आयी , ‘S’ के पास , गुस्से में भरी , ” यह पकड़ो अपना हा र , नकली पड़ा है . निकालो मेरी अंगूठी, मेरे बॉयफ्रेंड इतने प्यार से दी है.”
रात को हसबेंड ने पूछा , “अरे तुम्हारी अंगूठी कहाँ गई? ”
‘S’ ने सकपका कर कहा , “उसने बदला कर लिया, बोली दीदी यह हार तुम ले लो, तुम्हें ज़्यादा फबता है. ”
“देखा, मैंने कहा ना बिलकुल बुद्धू है .”
निपुण सेक्रेटरी ‘s’ को नहीं पता बाद में बैग का क्या हुआ .

दो सगी लघुकथाएं

1. मन का टुकड़ा
————-
पूजा … चाय … अखबार . सोफे पर आकर बैठ जाती हैं पुष्पा जी तब जाकर सूरज बालकनी से हटता है . रूटीन .
” क्या बचा है बताओ ? किसी ने सर्वे किया है- ‘सत्तर प्रतिशत लड़कियां चाहती हैं उनका होने वाला पति सेक्स का अनुभव रखता हो .’ शी… ! कितनी और गिरेगी इंसानियत . और अब तो लड़कियां ही हदें पार कर रही हैं. ”
“औरत उदारमना होती है और प्रैक्टिकल भी . अपने हक़ से अधिक अपेक्षा नहीं रखती है . ये लडकियां जानती हैं जो इनके पास नहीं हैं उसकी एक लड़के से उम्मीद रखना नादानी है . सो सोच ही बदल लो या बदल जाने की वकालत करो .”
” मगर आदमी अब गुफा में रहने वाला जानवर नहीं है . हज़ारों साल हो गए उसे प्यार और विश्वास का दम भरते हुए . वह जानवरों की तरह रुत आने पर पर चलते फिरते सेक्स नहीं करता है . पहले उस का मन कहीं जाकर टिकता है तब कहीं जाकर वह अपना तन किसी को सौंपता है. और यह मान कर चलो कि एक बार तन सौंप दिया तो मन का एक टुकड़ा तो वहां छूटेगा ही छूटेगा .” वे उद्वेलित हो गयी थी .
” पर यह भी तो जानो कि मनुष्य परिस्थितियों का गुलाम होता है और मन के साथी को ढूँढ़ने की यात्रा में कहीं पड़ाव आ सकता है .. और यह मन के टुकड़े की बात जो आप कह रहीं है . हम कोई बर्तन तो हैं नहीं कि एक किनारा टूट गया तो टूटा ही रहेगा . पेड़ की शाख अगर टूट जाये तो कुछ साल बाद पता भी नहीं चलता कहाँ से टूटी थी.”
“बहस में तो किसी को जीतने दोगे नहीं! जो गलत है उसको गलत कहने का साहस रखो. एक बलात्कार की पीड़ित के तो केवल तन पर आघात होता है . उसका मन पवित्र और साबुत होता है, पर उसका तो कोई पुरुष आगे बढ़ कर हाथ नहीं पकड़ता है. बात करते हैं , बर्तन की , पेड़ की ! और ये जो मन के टुकड़े बांटती फिरती हैं उनकी हिमायत कर रहे हो !”
मैंने स्वयं को देखा. खामोश बैठे.
2. निशान
———
दस बजे नहीं कि सब निपटा कर बिस्तर पर . खुद को नींद आती नहीं है और मुझे सोने नहीं देंगी, देर रात तक . रूटीन .
” यह अंगुली पर क्या निशान है आपका ? ऐसे तो हमने किसी को चोट लगी नहीं देखी आज तक ?” मेरी अंगुली पर अपनी अंगुली घूमाते हुए उन्होने पूछा.
मैं हलके से हँसा. चलो बताये ही देता हूँ आज .
” लो सुनो , हम दूसरी क्लास में थे . मतलब मैं और वह लड़की . एक खेल होता था . अंगुली पर फूल उगाने का, मतलब बेवकूफ बना कर परेशान करना होता था . उसने कहा, ‘ लाओ तुम्हारी अंगुली पर फूल उगा दूँ .’ मुझे पता था वह मेरी अंगुली पर रेत घिसेगी और मैं थोड़ी देर में चिल्ला कर अपनी अंगुली खींच लूँगा – ‘ नहीं, नहीं, मुझे नहीं उगवाना फूल.’ पर मैंने कहा – ‘लो उगाओ.’ मैंने सोच लिया था आज मैं उसी को रुला कर छोडूंगा . वह रेत रगड़ने लगी तो मैं बोला, ‘ मगर तुम्हें मेरी कसम जो अपने आप मेरी अंगुली छोड़ो .’ उसे अंदाज़ा नहीं था खेल कहाँ तक जाएगा . वह रगड़ती रही और मेरी अंगुली की खाल उतरने लगी . मगर मैंने हाथ नहीं खींचा . वह रुआँसी होकर बोली , ‘अब तो हटा लो ना ! ‘
मैं अड़ा रहा . जखम सा हो गया . खून आने लगा . वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगी . मेरी आँखों में दर्द से आँसू निकल रहे थे और मैं हँस भी रहा था . आख़िर उसे इस तरह रोते देख मुझे तरस आ गया और मैने अपना हाथ खींच लिया. बस उसी का निशान है.”
मेरे सीने पर सर रख, वे मेरी अंगुली सहलाती रही देर तक. चुपचाप.
शायद वे सोच रही थी – मैने भी कहीं छोड़ दिया है मन का एक टुकड़ा.
मगर नहीं, मैं जानता हूँ, यह उन तक पहुँचने की मेरी यात्रा का पहला पड़ाव था. और यह उसी खूबसूरत पड़ाव का निशान था.