मन की बात

“मोहित देव…? फिज़िक्स के प्रोफेसर..? याद नहीं आ रहा.” रश्मि के पैर काँपने लगे तो उसने चौखट को पकड़ लिया.
” अरे मम्मी, आपके साथ पढ़ते थे, भिवानी में. खूब अच्छे से जानते हैं आपको. मुझे लाइब्ररी में बुलाकर पेरेंट्स के बारे मे पूछा. जैसे ही मैने आपके बारे में बताया, उछल कर बोले, ‘ अरे रश्मि! कितनी शालीन लड़की थी. बहुत तारीफ कर रहे थे आपकी. बोले, जब भी कुछ काम हो, मैं यहीं कॅंपस में रहता हूँ, अकेले. … लंबे हैं.. पतले से.. गौरे..” अक्षय को याद दिलाने का चाव चढ़ा था और रश्मि को लग रहा था कोई उस के दिमाग़ को एक भूंठे चाकू से बंदार रहा है.
जैसे तैसे बेडरूम तक गयी और बिस्तर पर ढह गयी. दिमाग़ में एक बिजली सी कौंधी.
” मैं तुम्हारे पीछे नहीं आऊंगा, देखना, एक दिन तुम मुझे ढूँढती हुई आओगी.” कोमल और संयत स्वर.
अति सज्जन और घोर अपराधी पुरुष में भेद करना कठिन है.
जब बड़े भाई को पता चला कि कॉलेज में एक लड़का उसके पीछे पड़ा है तो तूफान खड़ा कर दिया. लड़की का बड़ा भाई बड़ा बेवकूफ़ हुआ करता है. पिता प्रिन्सिपल से मिलने पहुँच गये. इस दीवाने पर तो भूत सवार था, ” माफी? प्यार करने के लिए माफी. प्यार तो श्रेष्ठ और सुंदर मनोभाव है.” पिता कुछ बोलते इस से पहले भाई और उस के दोस्तों ने उसे प्रिन्सिपल के दफ़्तर से बाहर खींचा और बुरी तरह पीटा.
लड़कों ने कहा,” मारो साले को, और मारो!” और लड़कियों ने हल्का सा मुँह खोल कर पीड़ा और विस्मय की नज़रों से पूरा दृश्य देखा.
बस एक बार फिर सामने आया था. ” मैं तुम्हारे पीछे नहीं आऊंगा अब…देखना .. ” वही कोमलता वही सहजता जिसे याद करके मन काँप उठता है.
शादी के ५ साल बाद जयपुर में दिखा एक दिन. दिल किया उन्हें बता दूं. फिर सोचा, बबूल को पानी देना ठीक नहीं. और कुछ दिन बाद ही अक्षय के पापा को एक जीप टक्कर मार कर भाग गयी. किसने किया, पोलीस को कुछ पता नहीं चला.
जयपुर छोड़ कर इलाहाबाद आ गयी. वह यहाँ भी पहुँच गया!
‘ तुम मुझे ढूँढती हुई… मैं तुम्हारे पीछे …. ‘ रश्मि ने आँखें मूंद ली.
दो दिन की छुट्टी के बाद अक्षय कॉलेज गया तो प्रोफेसर देव कहीं दिखाई नहीं दिए. उनके ब्लॉक पर गया तो ताला लगा था.
सीता बाई ने बताया वे तो इस्तीफ़ा देकर चले गये.
” एक औरत आई थी. गौरी सी, अच्छी थी देखने में… पता नहीं रो रो कर मिन्नत कर रही थी. प्रोफेसर बोल रहे थे,, रश्मि मैं तुम्हारा बुरा सोच भी नहीं सकता. पर एक ही रट – मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ मेरी ज़िंदगी से दूर चले जाओ.. राम जाने क्या कहानी है. बिस्तर बाँधा और निकल गये प्रोफेसर साब.”
अक्षय रात देर से घर आया. उसकी आँखें लाल थी.
” मम्मी मैं सोच भी नहीं सकता आप इतनी गिरी हुई हैं. आप तो जानती ही नहीं थी प्रोफेसर मोहित देव को? फिर मिलने गयी?”
रश्मि की आँखें नीची थी. ‘ एक औरत के मन की बात उसका बाप, उसका भाई उसका पति और उसका बेटा कोई भी नहीं समझ सकता.’
‘ तो इसलिए आप अपने मन की बात कहने के लिए प्रोफेसर मोहित देव के पास चली गयी.’
रश्मि ने देर तक अक्षय के चेहरे को घूरा और फिर बोली, ‘ हाँ मैं इसलिए उसके पास गयी.’
अक्षय की आँखों में नफ़रत बरस रही थी

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