झाड़ू-पोंचा बनाम जीवन-दर्शन

छुट्टी के दिन जानाबाई पोंचा लेकर मेरे पीछे ऐसे पड़ जाती है जैसे स्टेशन पर किसी लावारिस के पीछे डॅंडा बजाता पुलिसवाला.
उस दिन मैं बच गया था, लगता है जानाबाई ने जल्दी में मुझे इग्नोर कर दिया था.
‘ सब बोलते हैं, ये झोपड़ पट्टी के लोग क्या मिर्ची खाते हैं. अरे भाभी मिर्ची नहीं खाएँ तो हो गया हमारा तो. एक आदमी पूरा सालन खा जाएगा, बाकी बैठो. हमको पता है ना मिर्ची के बिना कैसे चलेगा हमारा. बोलना आसान है. हमको कोई चाव थोड़े होता है मिर्ची खाने का. बाद में आदत पड़ जाती है. हम थोड़े ना आप लोग के माफक खाना खाते कि यह भी वो भी सब कुछ कटोरे भर भर के. हम को रोटी या राइस खाना होता है, थोड़े से रस्से या चटनी के साथ. बताओ मिर्ची नहीं खाए तो कैसे चले?’
मुझे लगा जानाबाई एक पुरानी सी फटी जिल्द की किताब है. मैं कान लगा के पढ़ने लगा.
एक और दिन-
‘ नौकरी नही है, पर घर पर एक मिनिट नहीं बैठेगा मेरे घर वाला. बाहर ही बाहर. क्या है हम बच्चे होते तो माँ बाप कुछ भी करने को, चाहे ‘बात’ करने का हो या झगड़ा, हम को खोली से बाहर निकाल देते. बस आदत पड़ जाती फिर. ऐसा आप लोग के जैसे पास पास बैठे तो सारे दिन मुँह बंद रहेगा, खोला नहीं कि मार पीट गाली गलोच. औरत मर्द में दूरी ही अच्छा है भाभी.’
और कल कह रही थी, ‘ एक या दो बच्चा करो. हम को सिखाता है. अरे हम ऐसे ही हाड़ तुडा कर, आधा पेट भर कर जिनगी काट दें. कोई लॉटरी तो निकलेगी नहीं. दो चार में से एक बच्चा बच गया और निकल गया तो तकदीर बदलेगी. नहीं तो पीढ़ी तक ऐसे ही मरना पड़ेगा. इनको ज़्यादा पता है? हम तो जानवर है ना.’
मुझे लगा हमारे नीति आयोग को एक बार जानाबाई को अपनी बैठक में बुला कर उससे कुछ सीखना चाहिए.

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