सने हाथ

ताऊ जी चले गये तो ताई चन्दरो ने ना कभी गोबर में हाथ डाला ना चिमनी साफ की. जिसको चाहिए, करे.
मुझे याद है ताऊ जी के गली में दिखते ही बहुएँ दहलीज छोड़ कर अंदर हो जाती थी और बच्चे खेल से टाइम-आउट लेकर कोटरे की ओर इतला करने भागते थे- ” ताऊ जी आ गये! ताऊ जी आ गये!” बिल्कुल वैसे ही जैसे चिड़ियाँ और बंदर, पेड़ों तले ऊंघते हिरणों को शेर के आने की सूचना देते हैं. हमारे बिना मूछों के ताऊ जी का रुआब क्या था, समझिए आतंक था. वे कोटरे के सब कुछ थे- कर्ता- धर्ता, सुप्रिमो, या कहिए तानाशाह. इस तानाशाही को सबसे ज़्यादा झेलना होता था ताई को ही.
डर की इज़्ज़त पुराने से है, और इतनी है कि उसके प्रति नफ़रत को साँस लेने की जगह भी नहीं होती है. ऐसे में बग़ावत दफ़्न हो जाती है, मगर लगता है ज़मींदोज़ होकर भी ज़िंदा रहती है.
ताऊ जी के आने की मुनादी होते ही ताई चन्दरो भाग कर गोबर में हाथ डाल देती, उपले थापने के बहाने. और जब कभी नहीं हुआ तो चिमनी साफ करने बैठ जाती. और फिर बड़े ही खेदपूर्ण अंदाज़ में बोलती, ” अरे रज्जो, देख तेरे ताऊ जी को पानी तो दे. मेरे तो देखो हाथ ही सने हुए हैं मरे!”
ताई चन्दरो ने हमेशा ताऊ जी की इज़्ज़त की, उनके रुआब को माना, लोगों के सामने हमेशा उनकी बड़ाई की, मगर अपने हाथ से कभी पानी नहीं दिया. उनके हाथ हमेशा बग़ावत में सने रहे.

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