दो सगी लघुकथाएं

1. मन का टुकड़ा
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पूजा … चाय … अखबार . सोफे पर आकर बैठ जाती हैं पुष्पा जी तब जाकर सूरज बालकनी से हटता है . रूटीन .
” क्या बचा है बताओ ? किसी ने सर्वे किया है- ‘सत्तर प्रतिशत लड़कियां चाहती हैं उनका होने वाला पति सेक्स का अनुभव रखता हो .’ शी… ! कितनी और गिरेगी इंसानियत . और अब तो लड़कियां ही हदें पार कर रही हैं. ”
“औरत उदारमना होती है और प्रैक्टिकल भी . अपने हक़ से अधिक अपेक्षा नहीं रखती है . ये लडकियां जानती हैं जो इनके पास नहीं हैं उसकी एक लड़के से उम्मीद रखना नादानी है . सो सोच ही बदल लो या बदल जाने की वकालत करो .”
” मगर आदमी अब गुफा में रहने वाला जानवर नहीं है . हज़ारों साल हो गए उसे प्यार और विश्वास का दम भरते हुए . वह जानवरों की तरह रुत आने पर पर चलते फिरते सेक्स नहीं करता है . पहले उस का मन कहीं जाकर टिकता है तब कहीं जाकर वह अपना तन किसी को सौंपता है. और यह मान कर चलो कि एक बार तन सौंप दिया तो मन का एक टुकड़ा तो वहां छूटेगा ही छूटेगा .” वे उद्वेलित हो गयी थी .
” पर यह भी तो जानो कि मनुष्य परिस्थितियों का गुलाम होता है और मन के साथी को ढूँढ़ने की यात्रा में कहीं पड़ाव आ सकता है .. और यह मन के टुकड़े की बात जो आप कह रहीं है . हम कोई बर्तन तो हैं नहीं कि एक किनारा टूट गया तो टूटा ही रहेगा . पेड़ की शाख अगर टूट जाये तो कुछ साल बाद पता भी नहीं चलता कहाँ से टूटी थी.”
“बहस में तो किसी को जीतने दोगे नहीं! जो गलत है उसको गलत कहने का साहस रखो. एक बलात्कार की पीड़ित के तो केवल तन पर आघात होता है . उसका मन पवित्र और साबुत होता है, पर उसका तो कोई पुरुष आगे बढ़ कर हाथ नहीं पकड़ता है. बात करते हैं , बर्तन की , पेड़ की ! और ये जो मन के टुकड़े बांटती फिरती हैं उनकी हिमायत कर रहे हो !”
मैंने स्वयं को देखा. खामोश बैठे.
2. निशान
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दस बजे नहीं कि सब निपटा कर बिस्तर पर . खुद को नींद आती नहीं है और मुझे सोने नहीं देंगी, देर रात तक . रूटीन .
” यह अंगुली पर क्या निशान है आपका ? ऐसे तो हमने किसी को चोट लगी नहीं देखी आज तक ?” मेरी अंगुली पर अपनी अंगुली घूमाते हुए उन्होने पूछा.
मैं हलके से हँसा. चलो बताये ही देता हूँ आज .
” लो सुनो , हम दूसरी क्लास में थे . मतलब मैं और वह लड़की . एक खेल होता था . अंगुली पर फूल उगाने का, मतलब बेवकूफ बना कर परेशान करना होता था . उसने कहा, ‘ लाओ तुम्हारी अंगुली पर फूल उगा दूँ .’ मुझे पता था वह मेरी अंगुली पर रेत घिसेगी और मैं थोड़ी देर में चिल्ला कर अपनी अंगुली खींच लूँगा – ‘ नहीं, नहीं, मुझे नहीं उगवाना फूल.’ पर मैंने कहा – ‘लो उगाओ.’ मैंने सोच लिया था आज मैं उसी को रुला कर छोडूंगा . वह रेत रगड़ने लगी तो मैं बोला, ‘ मगर तुम्हें मेरी कसम जो अपने आप मेरी अंगुली छोड़ो .’ उसे अंदाज़ा नहीं था खेल कहाँ तक जाएगा . वह रगड़ती रही और मेरी अंगुली की खाल उतरने लगी . मगर मैंने हाथ नहीं खींचा . वह रुआँसी होकर बोली , ‘अब तो हटा लो ना ! ‘
मैं अड़ा रहा . जखम सा हो गया . खून आने लगा . वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगी . मेरी आँखों में दर्द से आँसू निकल रहे थे और मैं हँस भी रहा था . आख़िर उसे इस तरह रोते देख मुझे तरस आ गया और मैने अपना हाथ खींच लिया. बस उसी का निशान है.”
मेरे सीने पर सर रख, वे मेरी अंगुली सहलाती रही देर तक. चुपचाप.
शायद वे सोच रही थी – मैने भी कहीं छोड़ दिया है मन का एक टुकड़ा.
मगर नहीं, मैं जानता हूँ, यह उन तक पहुँचने की मेरी यात्रा का पहला पड़ाव था. और यह उसी खूबसूरत पड़ाव का निशान था.

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