आशीर्वाद

उसने मेरे पैर छूए तो आधे घूँघट में खड़ी औरत ने बताना ज़रूरी समझा, “विवेक है, बिमला का लड़का. याद होगी ना बिमला तो?”
मैने संभल कर जिस आत्मीयता से उस गबरू के कंधे पर हाथ रखा, पूछने वाली को जवाब मिल गया होगा. बिमला कभी भूली नहीं जाती है. अकेलापन समझ आने से पहले ही वह नीची पलकें किए जीवन में आ जाती है, और फिर आख़िरी साँस तक- ना कभी छूती है, ना कभी बोलती है- साथ साथ रहती है.
मैंने सोचा एक तरफ लेकर विवेक से दो बात करूँ. मैं कुछ कहता कि वह ऐसे शुरू हुआ जैसे ढूँढ कर मुझे पाया है.
” माँ हमेशा आपकी बात करती थी. रोज़ याद दिलाती, ‘विवेक, तुझे महेश के जैसा बनाना है. देख, वो भी तो इसी गाँव में पैदा हुआ था.’ इतना सब कुछ बताती थी आप के बारे में- ‘ बचपन से ही ईमानदार, नेक दिल और मेहनती था . तभी तो देख आज कहाँ से कहाँ पहुँच गया.’ मेरे लिए आप आदर्श हैं अंकल !’
मैने बेचैनी में फिर उसके कंधे पर हाथ रखा,” हाँ, खूब मेहनत करो बेटे. तरक्की करो.” मेरे शब्द खो गये थे. मैं आकर अपनी कार में बैठा और निकल पड़ा.
मेरे दिमाग़ में उथल पुथल मची थी, ” महेश जैसा बनना? आदर्श?”
मेरा जीवन चलते चित्रों में मेरी आँखों के सामने आ गया. वाय्स ओवर में मेरी ही आवाज़ थी.
“महेश की यह विशाल कोठी है जो हथियाई हुई सरकारी ज़मीन पर बनी है. यहाँ तक पहुँचने के लिए कितने राजनेताओं की घिनौनी हरकतों पर परदा डाला है उसने. कितनी जालसाज़ियों में भागीदार रहा है…. तुमने तो यह कभी जाना ही नहीं बिमला… साथ थी पर तुम तो मुझे देख भी नहीं रही थी. तुम्हारा बेटा मुझ जैसा बनना चाहता है. मुझ से आशीर्वाद लेकर… नहीं बिमला!”
मैने अपने सर को बॅक सीट पर फैंक दिया.
” विवेक ! मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम महेश जैसे बनो… मुझ जैसे नहीं… बिमला के महेश जैसे!”

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