एक सच्चा सपना

हम वहीं खड़े हैं, गाँव में तुम्हारे घर की संची के पास. बड़े हो गये हैं. तुम लग रही हो अंदाज़न २० साल की. काले थ्री फोर्थ और सफेद स्लिम कुर्ते में तुम अच्छी लग रही हो बिमला. तुम्हारा बड़ा भाई भी वहीं मंडरा रहा है.
तुमने अपने दोनो हाथ पेंट की सामने की ज़ेब में डाले हैं. सहजता से पूछती हो, ‘ कैसा लगा लड़का?’
मैने कहा,” अच्छा, बहुत ही अच्छा. कल मिला था मैं, उससे और उसकी माँ से. बहुत अच्छे लोग हैं . दिल कर रहा था बस बातें करता रहूं. बड़ा अच्छा लड़का बताया तुमने.”
मैं बोले जा रहा हूँ और तुम एक विश्वास भरी मुस्कान के साथ अंगूठे से रेत कुरेद रही हो.
मुझे सुनाई दिया, ” मगर तुम आए कब?”
मैने तुम्हारे भाई को देख कर प्रश्न को टाल दिया.
“तो फिर कल सब को मिलवा दो. बात पक्की कर लो. लड़की भी आ जाएगी. अरेंज ए डिनर एट सम गुड होटेल.” तुम भी वापस बात पर आ गयी.
तुम अँग्रेज़ी बोलते देख अच्छा लगा..
मैने कहा, ” वाइ डोंट यू डिसाइड द प्लेस?”
“ऑलिव!” तुमने कहा.
और फिर मुझे सुनाई दिया, ” मगर तुम आए कब?”
मैने धीरे से कहा, ” एक वीक हो गया.”
तुमने मेरे चेहरे में देखा. तुम्हारी आँखें कह रही थी, ” और मुझे अब मिल रहे हो?”
मैने कहा, “ऑलिव बहुत कॉस्ट्ली नहीं होगा?”
तुम हल्के से हँसी, ” तुम्हारे लिए कॉस्ट्ली?”
इतना सुनते ही मैं सपने से बाहर आ गया. मगर नींद नहीं टूटी. तुम अब भी मेरे साथ थी. हमारे बचपन से कोई १५ बरस आगे और आज से ३५ बरस पीछे जहाँ हम खड़े थे वहाँ से बाहर आ गये थे हम.
मैने कहा, “मैं अपनी पत्नी और बच्चों से बहुत प्यार करता हूँ. मुझे लगता है तुम भी मेरी तरह अपने परिवार से बहुत प्यार करती हो.”
तुमने दोबारा आँखें उठाकर मेरी ओर देखा
“अरे, तुम्हारा चेहरा तो एकदम मेरी पत्नी जैसा लग रहा है !”
और आँख खुली गयी. मेरे चेहरे पर मुस्कान थी. बहुत दिन बाद मुस्कुराता हुआ उठा हूँ.

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