मगर अब क्या?

आज वह फिर वहीं खड़ा था, खंबे से पीठ लगाकर. तीसरा दिन है. मन में कुतूहल की जगह भय पनप आया. उसे रोज़ इसी रास्ते से कॉलेज जाना है.
मम्मी का जवाब उसे पता था- ‘ तू देखती ही क्यों है उसकी तरफ? कितने दिन खड़ा रहेगा मरा.’
पापा से कहा तो तैश में आकर सुबह से ही चक्कर लगाने लगेंगे और देखते ही उस पर टूट पड़ेंगे. साँस उठ जाएगा. तमाशा बन जाएगा गली में.
पता नहीं क्यों प्रज्ञा सिंह का चेहरा बार बार सामने आ रहा था. प्रज्ञा सिंह की चाल देख कर लगता था, वह कॉलेज में नहीं अपने बाप के बाग में घूम रही है. अवधेश सिंह हैं ज़िला पार्षद और बड़ा लड़का रघुविंद्र उर्फ रघु भैया युवाओं के स्वघोषित संरक्षक.
‘आ बे १९६५ की नायिका!’ प्रज्ञा ने धौल जमाया जो पता नहीं दोस्ती का था या दादागिरी का.
‘कल से तुझे वह कहीं दिखाई नहीं देगा. एक बार शक्ल दिखा दे उसकी.’
सचमुच नहीं दिखा. चुटकी में हल. उसे लगा आज की लड़की विवश नहीं है.
प्रज्ञा मिली तो बड़ी बहन की तरह पूचकारा या चुटकी ली वह तय नहीं कर पाई.
तीन दिन बीते थे कि एक मोटर-साइकल तेज़ी से आई और झटके से उसके सामने आकर रुकी. काला चश्मा उतरा तो उसे तुरंत समझ आ गया- ‘रघु भैया!’
‘ नहीं, रघु, बस रघु!… फिर तो नहीं दिखा ना वह मजनूं? डरने की ज़रूरत नहीं. जब दिल करे सीधी मेरे पास आओ.’
मोटरसाइकल धड़धड़ाती निकल गयी. उसकी साँस उस खरगोश की तरह फूली हुई थी जो अभी अभी चीते की झपट से बचा है. उसके पैर काँप रहे थे.
वह लॉन तक गयी और निढाल होकर बैठ गयी.
उस लड़के से बातचीत कर के समझाया जा सकता था शायद. ऐसे ही बेवकूफी कर रहा हो, शायद शरीफ ही हो.
मगर अब क्या?
कॉलेज तो आना ही है.

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s