हम लुटेरे हैं

वह बोलता जा रहा था. उसकी आँखों में एक अजीब सा आक्रोश था.
” १९८४ में मैंने अपनी आँखों से देखा. कैसे आनन फानन में भीड़ का गुस्सा लूट की नीयत में बदल गया था. कैसे जल्दबाज़ी में घनश्याम तोतला एक ही पैर के दो जूते उठा लाया था. अबकी बार किसी ने ऐसी ग़लती नहीं की. सबने इत्मीनान से लूटा. लूटने के लिए आग अनिवार्य है, बाहर भी और अंदर भी. …हम लुटेरे हैं !”
उसका आक्रोश बढ़ रहा था.
“आंदोलन हमारे लिए लूटने की तमन्ना का उत्कर्ष है. प्यार भी हम इसीलिए करते हैं कि हमारी निगाहें लूट पर लगी रहती हैं.”
उसकी आवाज़ तेज़ हो रही थी.
” हम पेड़ों से फल लूट लेते हैं, पकने का भी इंतेज़ार नहीं करते. वरना कोई और लूट ले जाएगा. हम पौधों से उनके फूल लूट लेते हैं. फूल कुछ काम नहीं आते , बस हमें अच्छे लगते हैं. और जो कुछ भी हमें अच्छा लगता है, हम लूट लेते हैं. ”
वह गुस्से से काँपने लगा था
“हमने गायों से उनका दूध लूटा है. धरती से उसका धान लूटा है. हम धूप लूट सकते हैं. हवा लूट सकते हैं.. हम दूसरों को लूट सकते हैं. खुद को लूट सकते हैं…..”
वह हलकान होकर चुप हो गया.
अचानक ज़ोर से हँसा, और चिल्लाकर बोला. “डी जे, चलो म्यूज़िक बजाओ. हम लूटगान गाएँगे.”
” हम लुटेरे हैं….! हम लुटेरे हैं ….! ” गाता हुआ नाचने लगा

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