बचा हुआ आदमी

जब जब मुंबई में आतंकी हमला हुआ वह अपने घर पर था. हर बार उसने टी वी का रिमोट हाथ से नहीं छोड़ा. बार बार, सिलसिलेवार, उसने पूरा घटनाक्रम देखा. अपनी कल्पना में वह वी टी स्टेशन पर था जब अँधाधुन्ध गोलियाँ चली, और अपनी कल्पना में ही भाग कर, छिप कर, कूद फाँद कर, बच गया. टी वी के सामने बैठे ही उस की साँस फूल गयी. पर बच गया. यह सब बताने के लिए कि कैसे सब कुछ हुआ. ऐसे आतंकी हमले में बच कर आना युद्ध से लौट कर आने जैसा है. सारी दुनिया आपको टी वी पर देखती है, भाग्यशाली समझती है. लगता है ईश्वर ने आपको प्रसिद्ध होने के लिए बनाया, और बचाया. पर सब कल्पना में.
लंदन में हुए हमले में, पॅरिस में हुए हमले में, हर जगह हुए हमले में, हर बार उसने अपने आपको वहाँ रख कर देखा और भाग दौड़ कर, चोट खा कर, अपनी जान बचाई. बस कल्पना में.
बढ़ते हुए आतंकवाद के साथ उसकी कल्पना गहरी होती गयी और विश्वास भी, कि एक दिन वह वहीं पर होगा जहाँ हमला होगा, और बच जायेगा. दुनिया भर के मीडीया को पूरी घटना बताने के लिए, मशहूर होने के लिए.
एक दिन वह दिन आया. वह इस्तांबुल एरपोर्ट पर था कि दनादन गोलियाँ चल पड़ी. विस्फोट हुआ. मगर वह बच गया. उस क्षण के लिए जिसका उसे इंतज़ार था. पर इतने में ही एक गोली चली जो उसकी कनपटी पर आकर लगी. उसकी गिनती फिर भी मृतकों में नहीं हुई. वह गंभीर तौर पर घायल था. अस्पताल में दुनिया भर के चॅनेल आए. सबके कैमरों में उसका चेहरा आया.
उसे कुछ नहीं पता. वह कोमा में है.

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