सच्चा अभिनेता

मुझे याद है वे जब बड़े भैया की शादी में आए थे. कुंदन चाचा के पास नये कपड़े नहीं थे.
जैसे ही तैयार होने का वक़्त आता चाची को डांटना शुरू कर देते,” देखो क्या औरत है, दो सूट सिलाने को दिए हुए थे, मैने बीस बार कहा किसी को भेज कर मंगवा लेना. ट्रेन का टाइम हो गया पर सूट नहीं आए.”
चाची बड़ी आँखे करके बीच बीच में उनका चेहरा देखती. चाचा उस मंजे हुए अभिनेता की तरह हैं जो मंच से दर्शकों में बैठे अपने घरवालों को देखकर अपना ध्यान भंग नहीं करता है.
साठ होली खेले हुए बनवारी ताऊ जी अपना अनुभव उंड़ेलते, ” हो जाता है कुंदन, काम धाम के चक्कर में. और तुम कौनसा सूट पहन कर ज़्यादा छा जाते. सबको पता है लड़के के चाचा हो.”
बच्चों के खाने पीने की बात चलती तो कहते,” देख लो यही बच्चे वहाँ फरीदाबाद में एक चीज़ को मुँह नहीं लगाते. बिस्कुट, फल , केक सब पड़े पडे खराब हो जाते हैं. और यहाँ मुरमुरे और मूँगफली भी ऐसे खुश होकर खाएँगे जैसे पहली बार देखा है.”
सुनकर दोनों बच्चे खोई सी आँखों से पापा को देखते.
बड़ी चाची होठों ही होठों में बुदबुदाती,” डींग हांकता थकता नहीं भई. दिखते हैं ये केक, आइस क्रीम खाने वाले बच्चे?”
ताई अपने सुर पर इतना काबू रख कर बोलती की चाची को तो सुने पर कुंदन चाचा तक नहीं पहुँचे, ” लो झूठ बोलकर तस्सली मिलती है अगले को तो केक खिलाए या राजभोग. अपने को क्या?”
कुंदन चाचा की बातों को डींग समझिए या झूठ. पर वे एक बहुत अच्छे पति हैं और बहुत ही अच्छे पिता. बहुत प्यार करते हैं अपनी पत्नी और बच्चों से.
कहीं अगर एक छोटी सी चीज़ भी मिल जाए गिफ्ट में तो पत्नी को लाकर देते हैं. और प्रसाद का लड्डू भी काग़ज़ में लपेट कर बच्चों के लिए रख लेते हैं.
बस लोगों को सुना कर अपने छोटे छोटे सपनों को जीने का अभिनय करते हैं. सच्चे अभिनेता हैं, तभी तो कभी चाची ने या बच्चों ने उनकी बात को नहीं काटा है.

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यह सच है

मैं सेक्यूरिटी लाउंज में कोने की कुर्सी पकड़ कर बैठ ही रहा था कि वह मोहक मुस्कान सजाए मेरी ओर आई. मैंने पीछे मुड़कर देखा, कोई नहीं था. यह मुस्कान मेरे लिए ही थी. ‘मैं इसे नहीं जानता हूँ ? उन्हूँ, बिल्कुल नहीं !’
हाँ, मैने ऐसे सुतवाँ बदन और ऐसी आकर्षक मुस्कान बहुत देखी हैं, पर अब यह सब मेरे लिए कल्पना का विषय है. अब मैं ऐसे खूबसूरत बुत बनाता हूँ, और उनमें जान फूंकता हूँ. उन पर मोहित नहीं होता. मैं एक कहानीकार हूँ और मेरे बालों में चाँदी झलकने लगी है .
मैने अख़बार खोला ताकि वह समझ जाए कि इस उम्र में और दिन के इस वक़्त एक अख़बार भी मेरे लिए लड़की से ज़्यादा अहमियत रखता है. उसका उत्साह नहीं घटा. मेरे नज़दीक आकर बोली,” आप कोई जानी मानी शख्सियत है?”
” ऐसा होता तो आप मुझे पहचानने में ग़लती नहीं करती.”
” मैंने ग़लती नही की है, आशुतोष मिश्रा? मशहूर कहानीकार, राइट?”
” मशहूर हटा दीजिए, बाकी आपका तुक्का सही है. ” वह मुझे सुन नहीं रही थी, बस बोल रही थी.
” आप में वह क्या कहते हैं…?
“मॅगनेटिज़म…चुंबकत्व … मैं बहुत बार सुन चुका हूँ.”
“ऐसा चुंबकत्व है कि कई लड़कियाँ तो आप पर गिर ही जाती होंगी.”
“रहा होगा कभी पर अब लड़कियों की खूबसूरती आँकने के लिए वक़्त नहीं है मेरे पास.”
वह ज़ोर से हँसी. बोर्डिंग की घोषणा हो गयी. मैं खड़ा होकर चल पड़ा
” अरे आप भी नागपुर जा रहें हैं!”
“ओह गॉड”, मैं बुदबुदाया.
” जी, मेरी नई किताब का लॉंच है. आज वहाँ प्रेस क्लब में कान्फरेन्स है. कल हिस्लप कॉलेज में एक लेक्चर है मेरा, और फिर वापस.” इतनी जानकारी एक साथ देकर मैने उसे चुप रहने का संकेत दिया. पर वह लगता है आमादा थी.
फ्लाइट में पहुँचने तक कुछ ना कुछ पूछती रही. और हद तो तब हो गयी जब मेरे पास बैठे व्यक्ति के कान में कुछ कह कर उस से सीट बदली और मेरे पास आकर बैठ गयी.
काफ़ी देर चुप रह कर धीरे से बोली, “आप मुझ से डर रहे हैं?”
मैने उसकी आँखों में देखा. वह मुझे निमंत्रण और चुनौती एक साथ दे रही थी.
“आप डर रहें हैं कि मेरी आँखों में आँख मिला कर बात कि तो आप पिघल जाएँगे. आपका लेखक, आप का पुरुष घुटने टेक देगा.”
मैने एक ठंडी हँसी हँसी. “तुम अभी बच्ची हो. जाओ दुनिया देखो. किसी लड़के पर डोरे डालो. मैं तुम्हारे लिए बहुत दूर हूँ और बहुत ऊँचाई पर भी.”
“मेरा घर प्रेस क्लब के रास्ते में है. दस मिनिट वहाँ रुक जाओ. अगर तुमने घुटने नहीं टेके तो मैं तुम्हारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में आऊँगी और अगर तुम अपनी ऊँचाई से नीचे उत्तर आए तो हम रात को डिन्नर करेंगे, लेट नाइट डिन्नर.”
उसे अपनी जगह दिखाने के लिए मैने कह दिया, ” डन, ओक. नाउ गिव मी ए ब्रेक. मुझे कुछ नॉट्स बनाने हैं.”
वह मेरे साथ साथ एरपोर्ट से बाहर आई. मेरा ड्राइवर प्लॅकर्ड लिए खड़ा था. मैने उसे इशारे से बैठने के लिए कहा. रास्ते भर हम एक शब्द नहीं बोले.
उस के घर के आगे उसने गाड़ी रुकवाई. अब वह आगे थी और मैं पीछे. एक अधेड़ सी बाई दरवाज़ा खोलकर अंदर के कमरे में चली गयी.
अंदर आते ही बोली , ” एक लड़की जिसे आप पहली बार मिले हैं और अब कुछ देर बाद उसे बाहों में लेकर कह रहे होंगे- ‘ यू आर सो क्यूट बेबी’ उसका नाम अनुषा है.
“नाइस टू नो यू अनुषा.” मेरी आवाज़ में तंज़ था
उसने अपनी शर्ट का ऊपर का बटन खोला, बाल खोल कर लहराए, फिर बाँधे. फिर टेबल पर अपने हिप्स टिका कर मुझे देखती हुई अपना होंठ काटने लगी.
” कुछ और जलवा दिखाना है तो दिखा लीजिए , ५ मिनिट और हैं आपके पास.” मैंने अवहेलना से कहा.
उसने मुस्कुराते हुए शोकेस का एक रॅक खोला जिसमें बहुत से पर्फ्यूम थे. पीछे हाथ डाल कर एक फ्रेम निकाला और टॅबेल पर जचा कर रख दिया.
” यह तो मेरा ही फोटो है!”
वह हँसी, “मिस्टर आशुतोष मिश्रा, चलिए आप अपने आपको तो पहचानते हैं. २५ साल बाद भी. ”
मैं खड़ा हो गया.
उसने मेरी कमर में हाथ डाला.” ज़रा इधर आइए, कॉरिडर में, यह तस्वीर देखिए. यह मेरी माँ है आरती भटनागर. हार्ट अटॅक से पिछले साल मर गयी….बाकी कहानी मैं बताऊं या आप खुद लिख लेंगे.”
उसने मेरी कमर छोड़ दी. मेरे पैरों में कंपकंपी हुई .मुझे लगा मेरे घुटने फर्श पर टिक जाएँगे. उसकी नज़रों में हिकारत थी. मेरी नज़रें नीचे थी. उस जंगली भैंसे की तरह जो डरने के बाद भी अपने सींग ताने रखता है कि शेर का बच्चा झपट कर उसकी बोटी ना काट ले. मैं उल्टा चलता हुआ दरवाज़े तक आया. लड़खड़ाता कार तक पहुँचा और दरवाज़ा खोलकर सीट पर ढह गया.
सीने में हवा रुक गयी थी. मैं ना साँस खींच पा रहा था, ना छोड़ पा रहा था.
मैने जैसे तैसे पी आर फर्म का नंबर मिलाया, ” मेरे सारे प्रोग्राम कॅन्सल कर दो. आय एम सॉरी. मेरी तबीयत अचानक बहुत खराब हो गयी है. ”
बहुत खराब हो गयी थी.
यह सच है .

पप्पू महान

बाबा मुरली ने आख़िर दिल्ली की ओर बढ़ने की हिम्मत की . पूंजी लेकर निकले एक कनस्तर देसी घी. १९५७ में दस कोस पैदल साथ चलने वाले बीस मिलते थे, पर ५ रुपये देने वाला एक नहीं था. कनीना से लेकर सराय रोहेल्ला तक कनस्तर को दोनों टाँगों में रखे बैठे रहे. एक सज्जन जो कई देर से साथ बैठा था, आख़िर बोला,” बाबा ज़रा पेशाब बगैरा करना है तो कर लो, अभी तो मैं हूँ, कनस्तर का ध्यान रखूँगा.” और अगले ने ध्यान रखा भी. मुरली बाबा घबराए से लौटे तो कनस्तर अपनी जगह था.
‘आज भी शराफ़त है दुनिया में, सीहोर जाकर बताना पड़ेगा.’
पुरानी दिल्ली उतर कर कनस्तर सिर पर उठाया और कंपनी बाग में से पगडंडी पकड़ी तो कनस्तर में कुछ लुढ़का इधर से उधर. खटका हुआ. तसल्ली कहाँ थी,वहीं रख कर खोल लिया. भाठे भरे थे. ‘ राम गाम ठग लिया रे मुरली को तो.’ वहीं मचा दी- डा..रे! बा..रे ! छनुआ की मा रे !
बाबा को लगा दिल्ली इकट्ठी हो जाएगी. कोई छोटी बात थोड़े ना थी. दो घंटे रो धो कर लोगों का मनोरंजन करके, खाली पीपा उठाया और लाला जानकीदास की गद्दी ढूंढी. लाला ने व्यथा सुनी तो भोजन कराया और ब्राह्मण देवता को ५ रुपये दक्षिणा के दिए. लौटे तो फिर मुरली बाबा ने कभी ठगों की नगरी दिल्ली की तरफ मुँह नहीं किया.
छन्नू चाचा को लोगों ने बहुत समझाया कि भई दिल्ली चला जा, कुछ ना कुछ रोटी कमाने का रास्ता निकल जाएगा. मगर कभी हिम्मत नहीं कर पाए. गये दो तीन बार तो कनीना स्टेशन पर झोला खोल कर चूरमा खा लिया और वापस सीहोर आ गये. पैर ही आगे नहीं बढ़े.
समय ने करवट ली. छन्नूलाल के छोटे पुत्र और मुरली पंडित के प्रपौत्र पप्पू लंगड़ा ने पाँचवी में फेल होते ही ठान ली, दिल्ली जाएगा. लंगड़ा कुछ ऐसा कि एक पैर से चलता है और एक से धरती को लात मारता है. एक दिन किसी से नई पैंट माँगी, किसी से काला चश्मा- यह कह कर कि दो दिन के लिए जीजी की ससुराल जाना है- और पकड़ ली बीकानेर मेल, डब्ल्यू टी. पक्के इरादे से जैसे पुरखों का बदला लेना है. रोटी की भी फ़िक्र नहीं. कोई साला खा रहा हो तो उसको ऐसे घूरना कि बाँट कर खाने को मजबूर हो जाए. किसी के बटुए ने जेब में हलचल की तो पप्पू के हाथ में. स्टेशन पर उतरा तो नये जूते थे और हाथ में सूटकेस. दिल्ली को मिल गया था कोई उसके जैसा ही.
पिछले दिनों मैं मिलने गया तो गर्व से बता रहा था, ” भाई मेहनत बहुत करनी पड़ी, पर अब कोई कमी नही है. रोहिणी में फ्लॅट ले लिया, भागीरथ पॅलेस में दूकान.”
मैं मन ही मन कह रहा था, ” तूने दिल्ली फ़तह कर ली यार. आख़िर मुरलिया सलतनत की नीव रख दी. पप्पू महान.”