यह सच है

मैं सेक्यूरिटी लाउंज में कोने की कुर्सी पकड़ कर बैठ ही रहा था कि वह मोहक मुस्कान सजाए मेरी ओर आई. मैंने पीछे मुड़कर देखा, कोई नहीं था. यह मुस्कान मेरे लिए ही थी. ‘मैं इसे नहीं जानता हूँ ? उन्हूँ, बिल्कुल नहीं !’
हाँ, मैने ऐसे सुतवाँ बदन और ऐसी आकर्षक मुस्कान बहुत देखी हैं, पर अब यह सब मेरे लिए कल्पना का विषय है. अब मैं ऐसे खूबसूरत बुत बनाता हूँ, और उनमें जान फूंकता हूँ. उन पर मोहित नहीं होता. मैं एक कहानीकार हूँ और मेरे बालों में चाँदी झलकने लगी है .
मैने अख़बार खोला ताकि वह समझ जाए कि इस उम्र में और दिन के इस वक़्त एक अख़बार भी मेरे लिए लड़की से ज़्यादा अहमियत रखता है. उसका उत्साह नहीं घटा. मेरे नज़दीक आकर बोली,” आप कोई जानी मानी शख्सियत है?”
” ऐसा होता तो आप मुझे पहचानने में ग़लती नहीं करती.”
” मैंने ग़लती नही की है, आशुतोष मिश्रा? मशहूर कहानीकार, राइट?”
” मशहूर हटा दीजिए, बाकी आपका तुक्का सही है. ” वह मुझे सुन नहीं रही थी, बस बोल रही थी.
” आप में वह क्या कहते हैं…?
“मॅगनेटिज़म…चुंबकत्व … मैं बहुत बार सुन चुका हूँ.”
“ऐसा चुंबकत्व है कि कई लड़कियाँ तो आप पर गिर ही जाती होंगी.”
“रहा होगा कभी पर अब लड़कियों की खूबसूरती आँकने के लिए वक़्त नहीं है मेरे पास.”
वह ज़ोर से हँसी. बोर्डिंग की घोषणा हो गयी. मैं खड़ा होकर चल पड़ा
” अरे आप भी नागपुर जा रहें हैं!”
“ओह गॉड”, मैं बुदबुदाया.
” जी, मेरी नई किताब का लॉंच है. आज वहाँ प्रेस क्लब में कान्फरेन्स है. कल हिस्लप कॉलेज में एक लेक्चर है मेरा, और फिर वापस.” इतनी जानकारी एक साथ देकर मैने उसे चुप रहने का संकेत दिया. पर वह लगता है आमादा थी.
फ्लाइट में पहुँचने तक कुछ ना कुछ पूछती रही. और हद तो तब हो गयी जब मेरे पास बैठे व्यक्ति के कान में कुछ कह कर उस से सीट बदली और मेरे पास आकर बैठ गयी.
काफ़ी देर चुप रह कर धीरे से बोली, “आप मुझ से डर रहे हैं?”
मैने उसकी आँखों में देखा. वह मुझे निमंत्रण और चुनौती एक साथ दे रही थी.
“आप डर रहें हैं कि मेरी आँखों में आँख मिला कर बात कि तो आप पिघल जाएँगे. आपका लेखक, आप का पुरुष घुटने टेक देगा.”
मैने एक ठंडी हँसी हँसी. “तुम अभी बच्ची हो. जाओ दुनिया देखो. किसी लड़के पर डोरे डालो. मैं तुम्हारे लिए बहुत दूर हूँ और बहुत ऊँचाई पर भी.”
“मेरा घर प्रेस क्लब के रास्ते में है. दस मिनिट वहाँ रुक जाओ. अगर तुमने घुटने नहीं टेके तो मैं तुम्हारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में आऊँगी और अगर तुम अपनी ऊँचाई से नीचे उत्तर आए तो हम रात को डिन्नर करेंगे, लेट नाइट डिन्नर.”
उसे अपनी जगह दिखाने के लिए मैने कह दिया, ” डन, ओक. नाउ गिव मी ए ब्रेक. मुझे कुछ नॉट्स बनाने हैं.”
वह मेरे साथ साथ एरपोर्ट से बाहर आई. मेरा ड्राइवर प्लॅकर्ड लिए खड़ा था. मैने उसे इशारे से बैठने के लिए कहा. रास्ते भर हम एक शब्द नहीं बोले.
उस के घर के आगे उसने गाड़ी रुकवाई. अब वह आगे थी और मैं पीछे. एक अधेड़ सी बाई दरवाज़ा खोलकर अंदर के कमरे में चली गयी.
अंदर आते ही बोली , ” एक लड़की जिसे आप पहली बार मिले हैं और अब कुछ देर बाद उसे बाहों में लेकर कह रहे होंगे- ‘ यू आर सो क्यूट बेबी’ उसका नाम अनुषा है.
“नाइस टू नो यू अनुषा.” मेरी आवाज़ में तंज़ था
उसने अपनी शर्ट का ऊपर का बटन खोला, बाल खोल कर लहराए, फिर बाँधे. फिर टेबल पर अपने हिप्स टिका कर मुझे देखती हुई अपना होंठ काटने लगी.
” कुछ और जलवा दिखाना है तो दिखा लीजिए , ५ मिनिट और हैं आपके पास.” मैंने अवहेलना से कहा.
उसने मुस्कुराते हुए शोकेस का एक रॅक खोला जिसमें बहुत से पर्फ्यूम थे. पीछे हाथ डाल कर एक फ्रेम निकाला और टॅबेल पर जचा कर रख दिया.
” यह तो मेरा ही फोटो है!”
वह हँसी, “मिस्टर आशुतोष मिश्रा, चलिए आप अपने आपको तो पहचानते हैं. २५ साल बाद भी. ”
मैं खड़ा हो गया.
उसने मेरी कमर में हाथ डाला.” ज़रा इधर आइए, कॉरिडर में, यह तस्वीर देखिए. यह मेरी माँ है आरती भटनागर. हार्ट अटॅक से पिछले साल मर गयी….बाकी कहानी मैं बताऊं या आप खुद लिख लेंगे.”
उसने मेरी कमर छोड़ दी. मेरे पैरों में कंपकंपी हुई .मुझे लगा मेरे घुटने फर्श पर टिक जाएँगे. उसकी नज़रों में हिकारत थी. मेरी नज़रें नीचे थी. उस जंगली भैंसे की तरह जो डरने के बाद भी अपने सींग ताने रखता है कि शेर का बच्चा झपट कर उसकी बोटी ना काट ले. मैं उल्टा चलता हुआ दरवाज़े तक आया. लड़खड़ाता कार तक पहुँचा और दरवाज़ा खोलकर सीट पर ढह गया.
सीने में हवा रुक गयी थी. मैं ना साँस खींच पा रहा था, ना छोड़ पा रहा था.
मैने जैसे तैसे पी आर फर्म का नंबर मिलाया, ” मेरे सारे प्रोग्राम कॅन्सल कर दो. आय एम सॉरी. मेरी तबीयत अचानक बहुत खराब हो गयी है. ”
बहुत खराब हो गयी थी.
यह सच है .

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