गिर गया चाँद

रधिया ने भी वैसे प्यार ही किया था. प्यार के पोखर में भी दलदल होती है यह तब समझ आया जब पेट से हुई और जगिया को बताया. थप्पड़ सा जवाब मिला, ” चल बे रंडी कहीं की!”
यह तो मीनाताई ने दुनिया देखी थी जो रंडी शब्द का सही अर्थ समझाने की बजाय उसे रास्ता दिखा दिया. लड़की पैदा हुई तो मीनाताई ने मनकी नाम दिया. लड़की कहाँ मनकी होती है पर ताई बोली, ” भैंस को कटडा और धंधेवाली को लड़का, हुए सो नहीं हुए. बस यह समझ लो कि ऐसे मुहल्ले में लड़की को अकेला छोड़ने का मतलब है १०० का नोट सड़क पर रख देना. आँख झपकी के गया.”
इधर चाँद निकलता उधर रधिया मनकी को मीनाताई के पास छोड़ काम पर निकल जाती.
अंधेरी रात का मतलब यह नहीं होता कि चाँद निकलता ही नहीं है. बल्कि अपना बड़ा सा मुँह दिखा के चला जाता है.
मनकी ने उस दिन देखा तो पूछ लिया, ” अम्मी चाँद पीछे की तरफ से कैसा होता है?”
“काला ही होगा तभी तो कभी भी पीठ नहीं दिखाता है.”
जब ‘काम’ से वापस लौटते मनकी को अपनी खोली में लेकर आ रही थी तो चाँद गायब था.
मनकी से नहीं रहा गया, ” अरे अम्मी, चाँद इतना जल्दी कहाँ गया?”
“छिप गया.”
मनकी अम्मी की नादानी पर हँस कर बोली, “क्या अम्मी, ज़रा देखो ऊपर, कहीं है छिपने की जगह. नीचे गिर गया होगा.”

व्यस्त वृद्धा

मुझे कोई दस बरस ऐसे कस्बे में रहना पड़ा जहाँ बहुत कम लोग मुझे जानते थे. मेरे पढ़ने लिखने और ‘परम सत्य की खोज’ की धुन के लिए ये दस बरस बड़े मुफ़ीद थे. मैं सारा सारा वक़्त अपनी बालकनी में बैठा लिखता पढ़ता रहता. वहाँ से मैं देखता था एक बुढ़िया पूरे दिन अपने घर के पीछे अहाते में चिड़ियों को दाना देने, कपड़े तह करने, पौधे संभालने या कुछ भी करने में व्यस्त रहती थी. कभी खाली नहीं बैठती थी. मैं सोचता- ‘जीवन आख़िर मनुष्य को क्या बना देता है. बड़े बड़े सपने देखकर, भागमभाग करके आख़िर छोटे छोटे कामों में इंसान अपना मन ऐसे लगा लेता है जैसे इन्हीं कामों के लिए उसका जन्म हुआ था.’ जीवन की इस निस्सारता को देख मैं विचलित हो जाता और फिर तन्मयता से अपनी किताबों में सिर गाड़ देता.
कभी नीचे उतरता तो बुढ़िया को नमस्कार कर लेता था. मैं सोचता था अगर एक बार बातचीत कर ली तो फिर रोजाना बुढ़िया की राम कहानी सुननी पड़ेगी.
एक दिन मैं नमस्कार के बाद भी नज़र नहीं हटा पाया क्योंकि वह चिड़ियों को ऐसे दाने डाल रही थी जैसे कोई बच्चों के साथ खेलता है. जब उसने मेरी तरफ नज़र की तो उसकी आँखों मे इतनी आत्मीयता थी की मेरे होंठ अनायास खुल गये.
” अच्छा है अम्मा, आपका पूरे दिन ऐसे ही टाइम पास हो जाता है, वरना तो दिन काटना मुश्किल हो जाए.”
उसने कहा,” तुम भी तो अपना दिन किताबों के साथ काट देते हो.”
मैं किताबों में टाइम पास नहीं करता यह जताने के लिए मैंने कहा, ” मुझे बहुत कुछ जानना है अम्मा. मैं समझता हूँ कि हमारा जीवन इस जीव-जगत, इस ब्रह्मांड की रचना को समझने के लिए हुआ है. बाकी तो सब बस जीवन गुजराने के लिए है.”
बुढ़िया ने संयत स्वर में कहा,” पर तुम यह कैसे कह सकते हो कि उस सत्य को जानने का मार्ग केवल शब्द और किताबें हैं बेटा. सृष्टी की हर चीज़, हर घटना में भी तो वह सत्य छुपा है….” वह ज़रा रुकी फिर बोली, ” किसी महात्मा ने कहा है, दीया भी सूरज की रोशनी से ही जलता है.”
मैं अवाक खड़ा रहा गया. मेरे मुँह से बस ‘ यस’ निकला, धीमे से. मैं सोच रहा था अगर कोई स्टीफ़न हॉकिंग से भी पूछे तो वह यही कहेगा, ” ऑफ कोर्स, दि लाइट दैट कम्ज़ फ्रॉम ए लैम्प ऑल्सो बिलॉंग्स टू दि सन.”
किताबें मैं आज भी बहुत पढ़ता हूँ, पर उस दिन के बाद मैंने किसी भी छोटी से छोटी चीज़ या घटना को निरर्थक नही समझा.

हवा बंद है

उसके स्वर की मृदुलता मिठाई पर लगे वरक की तरह अलग दिखती थी.
” खाना खा लिया आपने?”
इस सवाल में चाहे सुनने वाले को अपनापन दिखे, पर विभा को रोज़ इसका नुकीला सिरा चुभता था. उसने कभी प्रियम से पहले खाना नहीं खाया, प्रियम जानता था. इस सवाल का सीधा मतलब था ‘ मेरा खाना परोस दो, तुम्हारी तुम जानो.’
“मेरी ब्लू शर्ट में बटन लगा दिया?”
विभा जानती थी इस सवाल में कील कहाँ है. प्रियम को पक्का पता है दो बार याद दिलाने के बाद भी रमा ने अभी तक बटन नहीं लगाया है. ब्लू शर्ट शायद उसे पहनना भी नहीं हो, पर रमा को अहसास दिलाना है- ‘ तुम्हें मेरा बिल्कुल ख़याल नहीं है.’
“मनोज ( रमा का भाई) को बोल क्यों नहीं देती कि जब भी आए कुछ ना कुछ लाना ज़रूरी नहीं है.”
इस सीधी सी बात में कितने दांते है, वह जानती थी. प्रियम का मतलब था मैं जानता हूँ मनोज यहाँ कुछ देने के लिए नहीं , लेने के लिए आता है, तो ये बेमतलब की चीज़े लाने का दिखावा किसलिए करता है.
“मैं जो हॉंगकोंग से टी-शर्ट लाया था, वो दे दी उसको?”
यह सवाल कम और प्रहार ज़्यादा था. ‘जब उसके लिए लाए थे दे ही दी होगी. कहो ना यह जानना है कि और क्या क्या दे दिया टी-शर्ट के साथ. या तो मुझे सब बताओ, या फिर भाई के हेज़ के गुनाह को महसूस करो.’
कांताबाई पोंचा लगाते हुए बोली, ” कितने अच्छे हैं साब. हर बात कितने प्यार से पूछते हैं. और कितना ध्यान रखते हैं आपका, है ना? मेरा मर्द तो हर बात पे ऐसे चिल्लाता है कि दिल करता है कुछ उठा के उसके सर पे मार दूं.”
विभा बोली, ” कांता उधर हवा आ रही है?”
“नहीं तो मेडम, बिल्कुल भी नहीं.”
“ज़रा इधर आओ तो.” विभा का स्वर भारी था.
“….. मैं यहाँ खिड़की के पास बैठी हूँ, यहाँ भी बिल्कुल हवा नहीं है. है ना?”
कांता मुँह बिचका कर वापस पोंचा लगाने चली गयी. सोच रही थी, ‘मर्द डाँटता पीटता रहे ना तो ही औरत का दिमाग़ ठीक रहता है रे बाबा. नहीं तो खिसक जाता है थोडा. खिड़की के पास हवा नही आ रही तो मैं क्या करूँ. उन्ह!’

प्रेम-पत्र का सच्चा-झूठ

हमारी सगाई और शादी के एक साल में मैंने अपनी पत्नी को बहुत प्रेम-पत्र लिखे, लगभग हर सप्ताह एक. पत्र भी ऐसे जैसे कोई पारंगत प्रेमी लिखता है.
शादी के कुछ दिन बाद पत्नी ने पूछ ही लिया, ‘ आप के पत्र मुझे अच्छे लगते थे, पर पढ़कर हमेशा ऐसे लगता था कि यह आदमी जाने कितने ऐसे प्यार भरे खत लिख चुका है. सच बताइए कब से लिख रहे हैं आप ये प्यार भरी पाती” वह मुस्कुरा रही थी, मगर संदेह उनकी आँखों में लिखा था.
मैंने विचार कर कहा, ” देखिए, मैं आपसे झूठ नहीं बोलूँगा. मैंने बहुत प्रेमपत्र लिखे हैं, और बहुत दिल से लिखे हैं. तुम मेरा विश्वास करोगी यह सोच कर मैं आज तुम्हें पूरा सच बताता हूँ.

हमारे एक चाचा थे दूर के- रज्जु चाचा. जब २५ पार कर गये और शादी नहीं हुई तो सब उनका मज़ाक करने लगे. रज्जु चाचा वैसे तो हंस कर टाल देते थे, पर अंदर से बेचैन रहने लगे. गुमसुम से हो गये.
हुआ यह कि एक दिन उनके नाम से एक लिफ़ाफ़ा आया. कोने पर लिखा था: भेजनेवाली, आपकी अपनी. सब के कान खड़े हो गये. महेन्द्रगड़ की मुहर थी. सब रज्जु चाचा के पीछे पड़े तो उन्होने लजा कर दो शब्दों में बताया, ” बुलाया है.”
उस दिन के बाद नहर के काम से शनिवार को जैसे ही छुट्टी मिलती, रज्जु चाचा सीधे महेन्द्रगड़ की राह पकड़ लेते. लिफ़ाफ़ा हर हफ्ते आने लगा. हर बार रज्जु चाचा एक आध प्यार भरा जुमला सबको बताते. बात आगे बढ़ाने की कवायद शुरू हुई कि चाचा बीमार पड़ गये. बीमारी भी पता नहीं क्या थी कि हफ्तों खाट से नहीं उठे. एक हफ्ते तो प्रेमपत्र आया, फिर बंद हो गया. लोग ‘आपकी अपनी’ को कोसने लगे. ” औरत की जात है, माल मिलना बंद तो चिट्ठी भी बंद.”
संयोग से मेरी पहली नौकरी महेंद्रगड़ में लग गयी. लोग तो अब मेरे पीछे पड़ गये, ” अरे तू ही कुछ पता कर. उसको बीमारी की खबर नहीं है, या मुँह मोड़ कर चली गयी.”
मैं क्या करता? रज्जु चाचा कुछ बोलें तो खोज खबर लूँ.
एक दिन मेरा पीछा छूटा. लिफ़ाफ़ा आ गया. और अब के जो पत्र आया तो पढ़ने सुनने वालों की आँखो में पानी आ गया. ज़माने के पहरे, तड़पता दिल, भीगा तकिया… चाचा की भी आँखें फटी रह गयी. बीमारी थी कि ठीक होने का नाम नहीं. पत्र गमगीन होते गये, जैसे खून से लिखे गये हों. कुछ हो गया तो सती होने की ज़िद तक बात पहुँच गयी.
होना तो लिखा था, रज्जु चाचा की चलाचली का दिन आ गया. सबकी नज़रें गलियारे पर लगी थी कि आज तो हो ना हो ‘आपकी अपनी’ बिलखती हुई आएगी.
रज्जु चाचा की नज़र मुझ पर टिकी थी. एक आँसू बहा और आँख बंद हो गयी.
मुझे पता लग गया था कि रज्जु चाचा शनिवार को महेंद्रगड़ जाकर खुद चिठ्ठी डाल कर आते थे.
पत्नी ने लंबी साँस ले कर कहा,” पता नहीं आपकी कहानियों पर विश्वास करूँ या आप पर.”
और मुस्कुरा दी.

बचा हुआ आदमी

जब जब मुंबई में आतंकी हमला हुआ वह अपने घर पर था. हर बार उसने टी वी का रिमोट हाथ से नहीं छोड़ा. बार बार, सिलसिलेवार, उसने पूरा घटनाक्रम देखा. अपनी कल्पना में वह वी टी स्टेशन पर था जब अँधाधुन्ध गोलियाँ चली, और अपनी कल्पना में ही भाग कर, छिप कर, कूद फाँद कर, बच गया. टी वी के सामने बैठे ही उस की साँस फूल गयी. पर बच गया. यह सब बताने के लिए कि कैसे सब कुछ हुआ. ऐसे आतंकी हमले में बच कर आना युद्ध से लौट कर आने जैसा है. सारी दुनिया आपको टी वी पर देखती है, भाग्यशाली समझती है. लगता है ईश्वर ने आपको प्रसिद्ध होने के लिए बनाया, और बचाया. पर सब कल्पना में.
लंदन में हुए हमले में, पॅरिस में हुए हमले में, हर जगह हुए हमले में, हर बार उसने अपने आपको वहाँ रख कर देखा और भाग दौड़ कर, चोट खा कर, अपनी जान बचाई. बस कल्पना में.
बढ़ते हुए आतंकवाद के साथ उसकी कल्पना गहरी होती गयी और विश्वास भी, कि एक दिन वह वहीं पर होगा जहाँ हमला होगा, और बच जायेगा. दुनिया भर के मीडीया को पूरी घटना बताने के लिए, मशहूर होने के लिए.
एक दिन वह दिन आया. वह इस्तांबुल एरपोर्ट पर था कि दनादन गोलियाँ चल पड़ी. विस्फोट हुआ. मगर वह बच गया. उस क्षण के लिए जिसका उसे इंतज़ार था. पर इतने में ही एक गोली चली जो उसकी कनपटी पर आकर लगी. उसकी गिनती फिर भी मृतकों में नहीं हुई. वह गंभीर तौर पर घायल था. अस्पताल में दुनिया भर के चॅनेल आए. सबके कैमरों में उसका चेहरा आया.
उसे कुछ नहीं पता. वह कोमा में है.

प्यार करने की योग्यता

पुरुष के लिए प्यार करना एक योग्यता है, जो उसे प्राप्त होती है और फिर एक दिन चली जाती है. चले जाने के बाद ही कहीं उसे एहसास होता है कि प्यार करना उसकी एक योग्यता थी.
मास्टर रमाशंकर में यह योग्यता कोई ४० साल रही. पत्नी के आते ही उससे बहुत प्यार किया. ६ महीने बाद कभी कभार झगड़ा होने लगा. फिर बार बार झगड़ा होने लगा. हफ्ते हफ्ते पति-पत्नी बात तक नहीं करते थे. मगर रमाशंकर की प्यार करने की योग्यता बनी रही. ६० साल की उम्र होने तक. फिर तो कुछ हो ही जा जाता है. कहिए निरर्थकता का एहसास. बहुत कुछ चला जाता है तो प्यार करने की योग्यता क्या बचेगी.
उनके बेटे अनुज में जो कि सॉफ़्टवेयर इंजिनियर है, यह योग्यता २ साल ही रही. फिर पति-पत्नी बस अच्छे मित्रों की तरह रहने लगे. समझदार लड़का था,प्यार करने की अयोग्यता को उसने जीवन जीने की कला से ढांप दिया; जैसे बड़े बड़े फिल्म स्टार, नेता या उद्योगपति करते हैं.
स्त्री में इस योग्यता के होने या ना होने के बारे में कुछ विश्वस्तता के साथ नहीं कह सकता. लगता है लेखक और दार्शनिक, जो मेरी तरह पुरुष ही थे, स्त्री को प्यार करने की चीज़ या साधन बना कर अपने लिए और मेरे लिए उसकी प्यार करने की योग्यता का माप असंभव बना कर चले गये .
कोशिश करता हूँ, स्त्री में जब प्यार करने की योग्यता मापने की, तो लगता है इंच टेप से इंच टेप को माप रहा हूँ.

तिरंगी

तिरंगी पुल की छाँव और सिग्नल की धूप खा कर ना जाने कब बच्ची से भरी पूरी लड़की हो गयी है . तंग उधड़ी कमीज़ में उसका चढ़ता उतरता जिस्म , चीथड़े सी बदली में छुपे पूरे चाँद सा, जितना छिपता है उससे ज़्यादा दिखाई देता है. भीख माँगना अब उसके लिए एक खेल सा हो गया है. कमीज़ ठीक करते हुए कार की खिड़की के पास जा कर खड़ी होती है तो शीशा अपने आप नीचे उतरने लगता है. हर बार दो नयी घूरती आँखे उसके बदन का ऐसे मुआयना करती हैं जैसे कोई छुटभैया बिल्डर खाली पड़े प्लॉट की कीमत आँकता है. साँप सा रेंगता एक हाथ अक्सर बाहर आता है और एक सिक्का तिरंगी के हाथ में थमा देता है. कभी कभी तो हाथ का अंगूठा उसकी हथेली पर निशान लगाने की कोशिश करता है. सिक्का हाथ में आते ही मतवाली सी तिरंगी अचानक छोटी बहन सा चेहरा बना लेती है और खिसक जाती है.
उसकी माँ- ना जाने पैदा करके बनी है या उठा कर- कहती है, ‘तू तकदीर वाली है रे तिरंगी, मैं बोलती हूँ तेरे को.’
उस दिन तिरंगी ने सिग्नल पर सबसे बड़ी गाड़ी को चुना और खिड़की के पास जाकर अपनी अदा दिखाई. शीशा उतरा. दो आँखें उसके उभारों पर लेज़र के फोकस सी टिक गयी. तिरंगी थोड़ी बेचैन हुई पर दाव बढ़ने के लालच में मूर्ति बनी रही. रेंगते हुए हाथ में सौ का नोट देख कर उसकी आँखे चमक गयी. दिनेश ने नोट उसके हाथ में रखते हुए हथेली ऐसे दबाई जैसे कोई अलिखित करार की चाह है. पूनम रियर व्यू में अपने पति की यह लंपटबाज़ी देख कर बिलबिला गयी.
ज़ोर से चिल्लाई, ‘ ए लड़की..!’
तिरंगी ने सौ का नोट अपनी मुट्ठी में भींच लिया.
‘इधर आओ तो.. यह क्या चुड़ैल बन कर फिर रही हो.’ इतना कह कर उसने अपना बेशक़ीमती शॉल तिरंगी पर फेंक दिया.
यह शाल उसे दिनेश ने पिछले जन्मदिन पर गिफ्ट दिया था. 
कार फ़र्राटे से निकल गयी. दिनेश भुन रहा था, दस हज़ार का शॉल जो इतने दुलार से उसने पूनम को दिया था, उसने एक भिखारिन पर फैंक दिया. अपनी लंपटता को तो उसने अंगुलियों पर टिश्यू पेपर रगड़ कर भुला दिया था.
तिरंगी शॉल छाती से चिपकाए , सौ का नोट मुट्ठी में दबोचे, हाँफती हुई माँ के पास आई. नोट माँ की गोद में डाला और शॉल लपेट कर मोरनी सी नाचने लगी. माँ अपनी अनुभवी आँखों से हवा को तौलती रही.
डिनर टेबल पर पसरे सन्नाटे को तोड़ते हुए दिनेश बोला , ” सौ- पचास रुपये की बात अलग है पूनम, तुम्हे पता है उस शॉल की क्या कीमत थी? मैने तुम्हे गिफ्ट दिया था वो शॉल!”
पूनम ने अपनी आँखे दिनेश की आँखों में गड़ा कर कहा, ” जितनी भी हो मिसटर बंसल , एक लड़की की इज़्ज़त से बहुत कम थी. और हाँ गिफ्ट….तुमसे..! जिसकी नज़र में एक ग़रीब लड़की के उभरे हुए अंगों की कीमत केवल सौ रुपये है.”
वह उठ कर अपने कमरे में चली गयी. दिनेश का मुँह खुला रह गया और उसके हाथ का नीवाला उसकी सफेद शर्ट पर गिर गया.
तिरंगी रात भर शॉल से लिपटी रही और बार बार उसे साफ़ करती रही. दूसरे दिन शॉल ओढ़े ही सिग्नल पर भीख माँगने गयी. ना किसी कार का शीशा नीचे उतरा और ना ही कोई रेंगता हुआ हाथ उसकी ओर बढ़ा. रुआंसी होकर शाम को लौटी और शॉल उतार कर अपनी माँ पर फेंक दिया.
” सब लोग मेरा शॉल देख कर जलते हैं. मुझे नही ओढना यह!”
माँ समझ गयी. शॉल को अपनी पोटली में ठूँसते हुए बोली, ” पता नही किस अभागिन का शॉल है रे! मैं बोलती ना तू तो तकदीर वाली है ऐसे ही अच्छी लगती है रे! अगला महीना तो तेरा ही है, तुझे अबके मैं दो बंडल तिरंगे ला के दूँगी.”
भाग भाग कर सिग्नल पर तिरंगे बेचने वाली इस लड़की को सब बचपन से ही तिरंगी कहने लगे थे.