चला गोली!…चला गोली!….चला गोली!

मैं आसमाँ सा बुलंद हूँ
मैं हवा सा हूँ रवाँ रवाँ
मैं ज़मीं से ज़्यादा ठोस हूँ
मैं धधक रहा हूँ आग सा !
चला गोली!… चला गोली!…चला गोली!
उठा बंदूक और तू दाग ऊपर की तरफ
तेरी लाचार सी गोली उडेगी कुछ ऊँचाई
गिरेगी टन से आकर फर्श पर खाली कटोरी सी, चला गोली!
चला फिर से निशाना बाँध अच्छे से
ज़रा सी दूर जाएगी घिसटती हवा में
और गिर पड़ेगी
कहीं मलबे में या खुल्ले गटर में, चला गोली!
चला आक्रोश में और बेध दे धरती का सीना
तेरी गोली उसी लम्हा दफ़न हो जाएगी
लगेगी हाथ बरसों बाद एक मज़दूर को
थमा देगा उसे जो हाथ में बच्चे के अपने
और कहेगा- ले बेटा खेल इस से, चला गोली!
रंग दे लाल लपटों को तेरे खूनी इरादों से
जो तेरा हाथ कांपे, साँस लेले, फिर चला
यह तेरा आख़िरी है वार
पिघल जाएगी अबकी बार गोली देख ले
बन जाएगी एक पीतल का पारा सोच ले
तुझे फिर हार कर बंदूक अपनी डालनी होगी
फ़तह मेरी ही होगी
क्योंकि मैं मर नहीं सकता
कभी भी मर नहीं सकता
मैं ख़याल हूँ . मैं ख्याल हूँ
मेरा ना जिस्म है कोई ना कोई उम्र है
मेरी हद है ना कोई दायरा है

मैं आसमाँ सा… मैं हवा सा…
मैं धरती सा… मैं आग सा..
मैं ख़याल हूँ… मैं ख़याल हूँ
चला गोली!

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ज़िंदगी जब मैं छटपटाता हूँ !
देख ले कस के काट खाता हूँ !!
क्या रखा है ग़ज़ल में जाने दे
ले सुन बाराखड़ी सुनाता हूँ !!
रोज़ बुनता हूँ एक ख्वाब नया
गम नया उसमे जो छुपाता हूँ !!
पैर उठते हैं दर्द में ठक ठक
चैन आए तो लड़खड़ाता हूँ !!
‘जय हे’ कहते गला रुँधे चाहे
गीत मैं फिर भी पूरा गाता हूँ !!

पुरुष, और पुरुष

नहीं, तुम अभी भी पुरुष बनकर पढ़ रहे हो मेरी कहानियाँ
और, और भी पुरुष बन सोच रहे हो मेरी नायिका के बारे में.
और मैं, हो जाना चाहता हूँ स्वयं एक स्त्री
ताकि पूरी तरह जान सकूँ अपनी नायिका की पीड़ा
तुम चाहो तो मुझे ‘हिजड़ा’ कह लेना
अपने पुंसत्व की झूठी पहचान के लिए.
मैं अर्धनारीश्वर सा हो जाऊँगा तुम्हारे ईश्वर की तरह?
या बृहन्नला सा, तुम्हारे महान योद्धा की तरह?
मगर मुझे नहीं होना कोई ईश्वर या कोई योद्धा
मुझे होना है स्त्री बन कर एक पूरा मनुष्य
मुझे नहीं होना तुम्हारी तरह और पुरुष, और पुरुष.
और तुम भी नहीं जाना मेरी नायिका के पास
बन कर पुरुष, और पुरुष, और पुरुष
हो सकता है वह तुम पर वार कर दे
जब तुम मदमाए हुए हो अपने पुरुषत्व में
और तुम लौट कर ही नहीं आओ
और आए तो तुम्हें घृणा हो जाए अपने पुरुषत्व से

एक ग़ज़ल

दिन का चेहरा देखिए जैसे दहकती रात है !
है खुशी बेचैन गोया गम कहीं पर पास है !!
तन्हा लड़ता एक दिन उस घर सा तू हो जाएगा
जिसमें कोई है नहीं चूल्‍हे में लेकिन आग है !!
कुछ तो अब्बा की भी सुनते खुद कहेगा देखना
दिल की जो सुनते हैं उनके काम की यह बात है !!
क्या कहूँ बच्चों को अब मैं किसलिए बेज़ार हूँ
आज भी सपने में माँ दिखती है पर नाराज़ है !!

शब्द गये भाड़ में,
चेहरा पढ़ो.
देखो इस पाँच सितारा होटल की
स्वर्गिक संडास में खड़े वेटर को
जो टिश्यू पेपर थमाते हुए
कह रहा है, ‘ लीजिए सर.’
मगर देखो उसके चेहरे पर फैली
कपट भरी विनम्रता जो कह रही है-
‘कुछ दीजिए सर.’
देखो अपने राजनेता को चिल्लाते हुए
( हाथ उठा कर कांख छिपाकर- धूमिल )
जो कह रहा है, ‘ बदल डालो!’
मगर उसकी फड़कती आँख कह रही है-
‘कुचल डालो.’
शब्द गये भाड़ में
चेहरा पढ़ो.
चेहरा पढ़ो उस छोकरे
का जो लड़की को सीट देकर
उसे घूरने की धृष्टता का अधिकार कमा चुका है.
और हो सके तो चेहरा पढ़ो इस माँ का
जिसकी इबारत समझ में नहीं आती है.
लिख दिया है समय ने इतना कुछ
कि लिकोले बन गये है.
शब्द गये भाड़ मे.
चेहरा पढ़ो.

जब सब जुआले में बैठ
मेरी छोटी सी उपलब्धि को
बड़ा करके बताते थे.
वह चुप रहता था.
उसने कभी मेरी प्रशंसा नहीं की
कभी भी नहीं
बहुत शब्द थे उसके पास
पर वह नहीं चाहता था
उनमें बाँधना
मेरी छोटी छोटी उपलब्धियों को.
वह मेरा पिता था.
और घर के आँगन में
अपने थोड़े से शब्दों को दिन भर
लुटाती थी वह
मेरी छोटी छोटी उपलब्धियों को बड़ा करने में
वह मेरी माँ थी.

नहीं, अभी नहीं

अभी नहीं,
अभी मैं तुम्हारे पक्ष में कविता नहीं लिखूंगा.
अभी तो तुम्हारे काँटे भी कोमल हैं
हाथ लगाओ तो गुदगुदी सी होती है.
तुम्हारी आँखों से अभी तो पता भी नही चलता है
कि ये किसी निरीह मवेशी के बच्चे की हैं
या किसी ख़ूँख़ार बिलौटे की.
और तुम्हारा शिश्न भी नन्हा सा है अभी तो
निर्दोष सा , निश्पाप सा
नहीं, मैं अभी तुम्हारे पक्ष में कविता नहीं लिखूंगा
क्योंकि बार बार ग़लत साबित हो जाना मूर्खता है,
कविता नहीं.