अच्छा भी और बुरा भी

पुरुषों के साथ आधी सैंडविच बाँट कर खाते हुए दस साल हो गये हैं उसे. किसी पुरुष की नज़र उसके शरीर पर कहाँ उलझ रही है वह बिना देखे जान जाती है. पुरुष वैसे भी कौन सी पहेली है. घर के पुरुष का सुबह चेहरा देख कर बता सकती है आज रात वह देर से आएगा. पुरुष का राज चलता है यहाँ, तो कुछ भी छिपाने की आदत ही नहीं है उसे.
मगर यह आदमी उसे समझ में नहीं आ रहा है. ऐसे अवहेलना करता है कि अस्तित्वहीन कर देता है. जानती है कि मैं उस कशिश की मालकिन हूँ जिसे देखकर कोई भी एक पल के लिए लड़खड़ाता है. पर यह नहीं.
जब भी वह अपना प्रॉजेक्ट उसे दिखाने गयी है, पाँचवी क्लास की बच्ची बना दिया.
शायद इस तरह के लोग अपनी मंशा जाहिर करने से पहले लड़की में एक हीन-भावना पैदा कर देते हैं. बड़े केबिन में बैठने वाले ऐसे बाज़ों को भी देखा है उसने. यह लगता है उन्हीं में से एक है.
” नहीं सर, प्राब्लम मेरे प्रॉजेक्ट में नहीं है. मुझे लगता है प्राब्लम आप के सोचने में है.” रिचा ने आख़िर शंख बजा दिया.
उसने नज़र ऊपर की, पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
” अपना लॅपटॉप यहाँ रख दो. और थोड़ी देर में आना. मैं तुम्हें कर के बताता हूँ.”
रिचा को अंदाज़ा हो गया था. इनक्रिमेंट तो भूल जाए इस साल, बल्कि रेज़्यूमे भेजना भी शुरू कर दे तो बेहतर होगा .
थोड़ी देर बाद उसने बुलाया. और एक प्रॉडक्ट का पूरा प्रेज़ेंटेशन १० मिनिट में तैयार कर दिया.
“ऐसे करना है. बाकी भी इसी तरह करने हैं. होप यू कॅन डू नाउ .”
रिचा नीची नज़र करके निकल आई. मन में ग्लानि हो रही थी. सबको पिछले एक हफ्ते में बोल दिया था. “यह आदमी लगता है मैना पालता है.”
अब सबको जा जा कर बोल रही थी, ” मैं ग़लत थी. ही इज़ ए पर्फेक्ट जेंटलमन. और ज़ीनिएस है यार. क्या काम जानता है!”
कुछ दिन में बॉस से अच्छी जमने लगी. काफ़ी खुल गयी. इनक्रिमेंट भी पूरा मिला. कभी ग़लती से हाथ भी लग गया तो बुरा नहीं लगा.
एक दिन वह कान्फरेन्स रूम में अकेली बैठी कुछ काम कर रही थी कि किसी ने आकर उसके दोनों कंधों पर दोनो हाथ रख दिए.
वह चौंक कर पलटी- वही है! मैं ग़लत थी. ” सर.. !” वह खड़ी होकर दूर हट गयी.
वह चौंक गया था. पर सहज था. उसके चेहरे पर कुछ भी ग़लत नहीं था.
हंस कर बोला, ” क्या हुआ रिचा?’
वह कुछ समझ नहीं पाई.” कुछ नहीं सर, बस ऐसे ही चौंक गयी थी.”
‘यह क्या हो गया रिचा तुझको. तुझे… रिचा तुझे ! पता नहीं चल रहा कि आदमी अच्छा है या बुरा ! कहीं ऐसा तो नहीं है,
कॉर्पोरेट वातावरण में पुरुष अब अच्छा या बुरा नहीं होता है, अच्छा और बुरा होता है. एक साथ,अच्छा भी और बुरा भी.

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पीड़क प्यार

जैसे ही रामसरूप की अगिनाइ नज़र सीतडी की कनखियों से टूरती आँखों से मिली, उसे लग गया दिन आ गया है. भय की एक लहर उसके तन को कंपकंपा गयी. उसने जिया है इस भय को, डरते डरते पल्ले से बाँधकर. कभी कभी तो इंतज़ार भी किया है, जब नहीं आया यह कई दिन तक. वह भागेगी नही इस भय से. बस बचेगी थोड़ा सा. बचेगी, इसलिए कि इस तन से ज़्यादा कुछ भी तो नहीं इस दुनिया में अपना.
कहीं हिंसा ने ही तो नहीं जन्मा है इस प्यार को. भूख… भूख से हिंसा… हिंसा से प्यार.
ना जाने कब कुछ भी आकर लगे उस के सिर में और एक टटोला बन जाए. फूट कर खून भी आ जाए. या फिर एक ज़ोरदार हाथ पड़े और काली पड़ जाए उसकी आँख और कनपटी, जो कई दिन उसको पल्ले से छुपानी पड़े. कुछ तो होगा. डरती सी रामसरूप के पास से होकर दूर जाती सीतडी – दो चौपाए; एक हिंस्र, एक आहत होने को तत्पर भी, भयभीत भी. शब्द नहीं आए हैं अभी तक, कोई पूछेगा?
आज टटोले का दिन था. ननद, काकस, आई थी भाग कर, हमेशा की तरह थोड़ी देर से. तब तक कुत्ते भगाने की लकड़ी सीतडी के सिर पर टिक चुकी थी. फूट नहीं निकली. टटोले का दिन था आज.
चिंपान्ज़ी बन कर बैठ गया रामसरूप, घर के बाहर.
“देख लेना, बुढ़ापे में कोई पानी का गिलास नहीं देगा तुझे! पराई जाई पर इतना ज़ुल्म ठीक नहीं है “- काकस जबड़ा भींच कर बोली. रामसरूप तो चिंपान्ज़ी बन गया था. तो चिंपान्ज़ी की तरह देखता रहा कहीं भी.
शिव जी के भूत प्रेत फेरा लगा कर चले गये हैं. चाँद अचानक भाग चला है, बादलों की ओट ओट. रात की चादर मैली से काली हो गयी है. आज रहने दो रोटी और साग को छींके पर ही. आज कुछ और दिन है.
सिर पर पट्टी बाँधे मड़ई के एक कोने में दरी पर सिकुड़ी पड़ी है सीतडी. अंधेरे में एक आहट की बाट है. रात को और गहराने दो. ठहरो.
एक हाथ आकर धीरे से टिकता है, वहीं टटोले पर. एक हल्की सी चीख. आँखों से चूने लगते हैं आँसू.
हाथ से टोकने पर भी हाथ ने ढूँढ ली है राह. वह पोंछ रहा हैं आँसू , जो अब बहेंगे और तेज़, जैसे टूटा है मन में कोई बाँध.
हाथ अब रेंगने लगा है साँप सा. पर नहीं खोलेगी सीतडी अपने वस्त्र, और नहीं खोलेगी अपना मन.
वह स्तनधारी है. स्तनधारियों में भी श्रेष्ठ , वह नारी है. पर होने दो, ऐसे ही होने दो इस विषपायी प्यार को. इतना भी बहुत है इस पीड़क प्यार को.

पीरगढ़ की बहुएँ

जम्बू द्वीपे भरतखंडे एक छोटी सी नगरी है. नाम है पीरगढ़.
पीरगढ़ में आई एक नई बहू को एक दिन अजीब और शर्मनाक अनुभव हुआ. सपने में किसी ने उसके साथ बलात्कार किया. बहुत विचलित हुई, पर बात को मन में दबा कर रह गयी. दो तीन दिन बाद फिर वही दुस्वपन, वैसा ही आदमी, अकेली पाकर उसकी ओर आया और जबरन उसके साथ दुष्कर्म किया. किसी को बता भी नहीं सकती थी. सुनने वाला यही कहेगा, ” जो मन में होगा वही सपने में आएगा.” फिर तो यह बार बार होने लगा.
एक दिन उसने हिम्मत की और अपनी बहुत ही नेक दिखने वाली पड़ोसन को विश्वास में लेकर बता ही दिया. पड़ोसन कुछ पल तक हैरानी से उसका चेहरा देखती रही, फिर बोली, ” सच कह रही है तू? मैं तो समझ रही थी मेरे अकेली के साथ ही ऐसा हो रहा है. लेकिन कब तक छुपाएँगे, किसी से तो बात करनी ही पड़ेगी?”
उन दोनों ने कुछ और बहुओं से दबी ज़बान में अपनी बात कही तो पता चला बहुतों के साथ ऐसा ही हो रहा है. बस सब शर्म के मारे चुप हैं. धीरे धीरे सब में घुसर फुसर होने लगी. किसी ने बताया,” यह तो कोई अभिशाप है इस नगरी की बहुओं को. भगवान कृष्ण के भजन करो, गीता का पाठ सुनो.” फिर भी पीछा नहीं छूटा तो किसी ने कहा,” अरे हमारे भजन करने से क्या होगा, वे दुष्कर्मी जो हमारे सपने में आते हैं उनका भगवान कुछ करे तभी तो छुटकारा मिलेगा.”
संकट तो तब गहराया जब उनमें से कई गर्भवती हो गयी. ” हे भगवान अब क्या होगा? अगर यह संतान उस बलात्कारी की ही हुई तो जनम ही भ्रष्ट हो जाएगा.” कुछ ने सूझाया आत्महत्या कर लेनी चाहिए.
आख़िर बात पीरगढ़ की सबसे वृद्ध औरत के पास पहुँची तो उसने भजन के बहाने सभी बहुओं को मंदिर में बुलाया
अपनी काँपती आवाज़ में कहा,” एक बात बताओ, तुम में से कभी कोई अपने सपने में मरी है क्या?”
सब सोच में पड़ गयी. विचार कर सबने एक साथ कहा, ” नहीं दादी जी, मरने से पहले तो सपना टूट जाता है.”
बुढ़िया के चेहरे पर पीर भरी मुस्कान आई,” बस तो, समझ लो बलात्कार तो मौत से भी बुरा है. ऐसा सपना हो ही नहीं सकता जो ऐसा जघन्य पल आने से पहले नहीं टूटे. बहुओ, तुम्हारा सपने में नहीं सचमुच बलात्कार हो रहा है. पीढ़ियों से औरत का बलात्कार हो रहा है. बस तुम नयी बहुओं को लग रहा है कि यह सब सपने में हो रहा है.”
बुढ़िया ने साँस ली.
” ऐसा इसलिए है कि तुम्हें थोड़ी आज़ादी मिल गयी है और कभी कभार तुम अपने पति से पहले सो जाती हो. पर हाँ, इसमें कोई शक़ नहीं जो संतान तुम पैदा करोगी वह बलात्कारी की ही होगी. जैसे कि तुम्हारे पति हैं. “

राम जी की गाय

जैसे ही प्रेयिंग मॅनटिस फ़ेसबुक आइडी से मित्रता का अनुरोध देखा मुझे अनायास राजबाला की याद आ गयी. जब आठवीं में थी तो किसी शरीर लड़के की खोपड़ी में विचार कौंधा, ‘देखो इस लड़की को- राम जी की गाय लगती है ना?’
राम जी की गाय अर्थात एकदम हड़ियल और ऊपर से बे-अनुपात डील-डौल. पतले पतले लंबे हाथ, सारस सी गर्दन पर छोटा सा सिर. समाधिस्थ सी आँखें जो देखने वाले को बिना देखे देख लेती हैं. कॉलेज में गयी तो बाइलोजी में टिड्डी पढ़ने वालों ने कहा– प्रेयिंग मॅनटिस.
यह राजबाला ही है तो हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी. दूसरे जिस नाम से तुम्हें चिढ़ाएँ, उसे अपनी पहचान बनाना, वह भी लड़की होकर! कलेजा चाहिए! ८४० बटे १००० की औसत में राम जी की गाय के पीछे लगने वाले भी होते हैं. पर यह कोई प्रेम-पिपासु नहीं था, बल्कि अपने आप को गर्व से वैश्यसुत कहने वाला गजिया था. मेरा रूम मेट, पूरा नाम गजेन्दर . मुझे लल्लू कह कर बुलाता था. बस उन्हीं दिनों लल्लू को शरीफ का पर्यायवाची माना जाने लगा था.
मगर जब फ़ेसबुक ने इत्तला दी कि यह प्रेयिंग मॅनटिस दिल्ली के बड़े होटल की मालिक है तो थोड़े संदेश आदान प्रदान किए. पता चला यह तो राजबाला ही है. वाह, राम जी की गाय, वाह! पुरानी यादें ताज़ा की, नंबर लिए दिए. और पिछली बार दिल्ली गया तो मिलने पहुँच गया महारानी बाग.
रास्ते में बीते दिन याद आ गये.
“देखो ल ल्लू! ये जो तितलियों के पीछे घूमते हैं, ये सब बेवकूफ़ हैं. हम यहाँ शादी करने नहीं आए हैं. मैने बहुत सोच समझ कर इस राम जी की गाय को चुना है. रोज़ टिफिन में कुछ खास होता है अपने लिए. ये देख, कल बटन टूट गया, यहीं यू पी टी में बैठ कर लगा दिया. ”
यू पी टी तथा यू ए न टी अर्थात अंडर पीपल ट्री और अंडर नीम ट्री ये दो खुले क्लास रूम थे, राजकीय महाविद्यालय नारनौल में.
“कौन नखरे झेले यार सुंदर लड़कियों के, और मिलना क्या है ? वक़्त खराब ! यहाँ सब कुछ मिल रहा है. लड़की को लग रहा है, यह कोई ऊपर वाले ने फरिश्ता भेजा है मेरे लिए. खुश है. कॉलेज हुआ तो इश्क़ हवा. समझे लल्लू!” उसने मुझे अपनी दिल की बात बताई, मुझे उसकी जात समझ में आई.
बड़ा सा फ्लॅट. नौकर ने दरवाज़ा खोला. खाली हाल के एक कोने में कराह रहे मरीज़ ने दो तीन बार मेरी और देखा. इतने में राजबाला आई. वैसी ही है, हड़ियल सी, मितभाषी.
“गजेन्दर हैज़ टर्मिनल इलनेस. मुझे ही सब कारोबार देखना पड़ता है.” इतना कह कर सोफे पर हाथ टिका कर बैठ गई, राम जी की गाय बनकर.
‘गजेन्दर तुम्हारा पति है? वही गजेन्दर..?’
कराह रहे मरीज़ के चेहरे मे मुझे अब गजेन्दर दिख गया था. मैं पास गया, ” हे गजिया, मैं लल्लू.”
उसने हाथ हिलाया. जैसे कह रहा था- वापस उन दिनों में जाने की हिम्मत नहीं है. तुम जाओ यार.
मुझे गजिया पर तरस आ गया. याद आया, कहीं पढ़ा था- मादा प्रेयिंग मॅनटिस धैर्य से अपने शिकार को पकड़ती है. और अपने कामसखा की तो जान ले लेती है.

कमज़ोर औरत

ताई रामदेइ का जैसे आख़िरी वक़्त नज़दीक आया, चेहरे पर संतोष बढ़ता गया. देखकर अजीब सा लगता था.
अब अस्पताल में केवल इसलिए रखा हुआ था प्राण निकलें तो कोई तकलीफ़ नहीं हो. रंडुए की घरवाली बनकर खूब सेवा की सरपंच की, और घर भी संभाला.
मेरा गाँव जाना हुआ तो मिलने गया. बस एक आध दिन की मेहमान थी. मुझे देख कर मुस्कुराइ.
मैने भी हल्के से मज़ाक किया, ” ताई, यहाँ अस्पताल में मरने आई है क्या तीर्थ करने? बड़ी सुखी लग रही है.”
मेरी तरफ़ रहस्यभरी नज़र से देख कर, हल्के से हँसी, ” सचमुच बहुत सुखी हूँ बेटे.”
थोडा रुकी, फिर बोली, ” वैसे तू भी दुनिया की तरह सोच रहा होगा कि मैने सरपंच का घर क्यों बसाया?”
” ताई देख अब तेरे से क्या छुपाऊँ, सारे गाँव को शक है कि सरपंच ने ही तेरे आदमी को मरवाया, पर सबको अचंभा है कि ऐसी भी क्या औरत कि अपने पति के हत्यारे की ही चूड़ियाँ पहन ली और घर बार संभाला, इतने अच्छे से. ” मैने पूछ ही लिया
“बेटा, गाँव को तो तो शक है पर मुझे नहीं….. मुझे तो पक्का पता है कि सरपंच ने ही मेरे आदमी को मारा था.”
” और फिर भी ताई…?” शब्द मेरे होठों से छूट गये.
“क्या करती बेटे ? औरत कमज़ोर होती है,बहुत कमज़ोर.” ताई सोच में कहीं दूर चली गयी थी. “और सरपंच की घरवाली भी तो १ साल के लड़के को छोड़ कर चली गयी थी. मैं भी औरत हूँ, समझा मेरा गुज़ारा हो जाएगा और उसका बच्चा पल जाएगा.”
“पर ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ नहीं होती ताई, सही कहा है. दस साल का पाला पलाया लड़का कुएँ में पड़ के मर गया. कैसे जान डाल रखी थी सरपंच ने उसमें. और आप का भी तो कितना लाड़ला था. कोई सग़ी माँ भी इतना नहीं कर सकती.” मैं कहे बिना नहीं रह सका.
“सही है बेटा, मैने भी लाड़ तो बहुत किए उसके. पर ज़िंदगी का हिसाब तो पूरा करना ही पड़ता है. क्या छाती पीट कर रोई थी मैं. सचमुच कलेजा फट रहा था . पर क्या करती? ” ताई फिर खो गयी.
“आज भी याद है सरपंच बार बार कह रहा था मेरे नंदू की तगड़ी में एक ढबली सिक्का था तांबे का. अगर लड़का पैर फिसल के गिरा तो सिक्का कहाँ गया ?” ताई की आँख नम हो गई.
फिर अपनी थैली खोली, उसका कोना फाड़ कर तांबे का सिक्का निकाला और बोली, ” ले बेटा, मेरे प्राण निकलते ही यह सरपंच को दे देना. बोलना हिसाब बराबर हो गया. इसी दिन के लिए छुपा कर रखा था “

ताई रामप्यारी, हेमिंगवे, और फ्रायड

ताई रामप्यारी मटके पर सेवइयाँ बना रही थी. मुझे देखते ही बोली, ‘बैठ बाबू!’
मुझे पता चल गया था कुछ नया किस्सा है ताई के पास.
“यह मास्टर जी के घर की भी अलग ही कहानी है रे बाबू, और मैं बिना बात बीच में आ गयी.”
ताई जब कोई नयी बात बताती तो मुझे अपने सवाल या जवाब चेहरे से ही पूछने या बताने पड़ते थे, बीच में बोलने से मज़ा बिगड़ता था.
” मास्टर जी ने कर दिया है बड़े वाले को अलग. बोल दिया, तेरी और तेरे बच्चों की इस घर में नहीं निभेगी. बात असली क्या है कि यह बड़े वाला मास्टर जी की हाँ में हाँ नहीं मिलाता. अपनी माँ की तरह बड़े बड़े दीदे निकाल कर अड़ के खड़ा हो जावे है. है भी एक दम अपनी माँ के जैसा. मास्टर जी को फिर बर्दाश्त नहीं होती. छोटे वाले की बात अलग है , सूमड़ा सा, दूसरा मास्टर जी है देखने में. और बस करता है सारे दिन ‘ हाँ पिताजी, जी पिता जी.’ ”
ताई ने नज़र घुमा कर मेरी रूचि का जायज़ा लिया. संतुष्ट हुई.
“चलो भई उनके घर की बात. अपने को क्या? पर मेरे को बीच में फँसा लिया बिना बात. माँ का तो लाड़ला है ना बड़े वाला. मास्टर जी स्कूल गये नहीं कि कभी खीर तो कभी लड्डू, छुपा कर दे के आएगी. अब बर्तन वापस कैसे ले? बहू को बोल रखा है, रामप्यारी के यहाँ छोड़ दिया कर. अब मैं भी क्या करूँ तू ही बता? मुँह बोली बहन बना रखा है. खाली बर्तन बहन दे कर आए.”
मुझे पता लग जाता था मेरे बोलने का समय आ गया है. कहानी में कुछ जोड़ने के लिए.
‘”ताई, क्या है ना, किसी पर माँ का मन ज़्यादा तो किसी पर बाप का. यह तो होता ही है हर घर में.”
मेरा इतने कहने से काम नहीं चल रहा था, तो मैं आगे बढ़ गया थोडा. कॉलिज जो जाने लग गया था.
” जो बेटा अपने ऊपर जाता है ना उस पर ज़्यादा मन होता है ताई, क्यों?”
ताई ने मेरी तरफ देखा जैसे कह रही हो- ‘ये सब बातें कहने की नहीं समझने की होती हैं. ये कुदरत के खेल हैं. तू क्या समझता है ताई में इतनी अकल नहीं है.’
हेमिँगवे भी शायद ऐसा ही कहता- ‘कहानी को पूरा खोल कर उसका मज़ा किरकिरा मत करो. सुनने पढ़ने वाले की कल्पना के लिए भी काफ़ी कुछ छोड़ो.’
मैं रुक गया, ताई का रुख़ देख कर. वरना मुझे तो फ्रायड याद आ रहा था.
‘ मास्टर जी के अवचेतन में संदेह छुपा है. छोटे वाला लड़का तो ज़रूर मेरा ही खून है. बड़े वाला का पता नहीं?’
मुझे पता था ताई एकदम भड़क जाएगी. ‘ बाबू तू तो कॉलिज क्या गया तेरी तो बुद्धि ही कुबुद्धि हो गयी. देख भई, ऐसी बात करनी है तो ताई के पास नहीं कहीं और जा के किया कर.’
ताई बिल्कुल सही है. उसे कहानी बताना आता है. पेड़ के बारे में सब कुछ बताने के लिए उसकी जड़ निकालने की ज़रूरत नहीं होती है. पेड़ मर जाएगा. ऐसे ही होती है कहानी. ‘बड़े वाले के माँ के जैसे बड़े बड़े दीदे और छोटे वाला मास्टर जी के जैसा सूमड़ा सा’- कहानी तो इतने में ही हो गई.

अच्छा परिवार

एक छोटी सी झुग्गी है. झाँक कर देख लीजिए. अंधेरा है पर जैसे ही पुतलियाँ थोड़ी बड़ी होंगी, सब दिख जाएगा. एक टूटा हुआ पुराना सा सोफा कम बेड. जिस पर गंदा सा कपड़ा ढका है. एक कुर्सी है, एक हाथ की. कोने में कुछ बिस्तर पड़े हैं. एक चटाई खड़ी है. किचन भी है. बस कमरे में ही एक ईंट की छोटी सी आड़ बना दी है. उस तरफ की तीन फुट की जगह किचन है. यह जो प्लास्टिक का परदा टंगा है, यह दो फुट का एरिया बाथ रूम है.
सीलन भी है और एक गंध भी. यह गंध कई चीज़ों की गंध मिलकर सालों में बनती है.
औरत को अभी अभी पीट कर आदमी बाहर गया है. अच्छा आदमी है. जब ग़लत कुछ करता है तो दारू का सहारा लेना पड़ता है. लड़की कुछ दिन से गड़बड़ कर रही थी. पता नहीं कहाँ से पैसे ला रही थी. अब पूरा खुलासा क्या करना. कल से नहीं आई है. लगता है भाग गयी. लड़का एक महीने से जेल में हैं. कुछ काला कांडी करता था. वैसे अच्छे बच्चे हैं दोनों.
ये सब अच्छे लोग हैं. वरना हो सकता है आदमी ने औरत को काट डाला होता या औरत ने बाजू वाले आदमी से मिलकर अपने आदमी को मरवा दिया होता. लड़की खुले आम अपने आपको बेच रही होती. लड़के ने बाप का ही खून कर दिया होता. पर नहीं, ये लोग क्रिमिनल नहीं हैं.
क्या है कि इनको हवा, पानी और रोशनी नहीं मिल रही. और जब आदमी को साँस लेने के लिए कम हवा मिले, पीने और नहाने के लिए कम पानी मिले, और इतनी कम रोशनी मिले कि कभी ढंग से अपना चेहरा भी नहीं देख पाए तो वह ऐसा ही होता है. मर भी सकता, मार भी सकता है. कुछ भी कर सकता है. अगर विश्वास नहीं हैं तो ज़रूरत से कम हवा, पानी और रोशनी में रह कर देख लीजिए.
कल इनमें से कोई एक संगीन गुनाह में पकड़ा जाता है तो आरोपी में सरकार का नाम भी लिखा जाना चाहिए. मैंने बहुत बार सुना है सबको हवा, पानी और रोशनी सरकार ही मुहैया करवाती है.