प्यार करने की योग्यता

पुरुष के लिए प्यार करना एक योग्यता है, जो उसे प्राप्त होती है और फिर एक दिन चली जाती है. चले जाने के बाद ही कहीं उसे एहसास होता है कि प्यार करना उसकी एक योग्यता थी.
मास्टर रमाशंकर में यह योग्यता कोई ४० साल रही. पत्नी के आते ही उससे बहुत प्यार किया. ६ महीने बाद कभी कभार झगड़ा होने लगा. फिर बार बार झगड़ा होने लगा. हफ्ते हफ्ते पति-पत्नी बात तक नहीं करते थे. मगर रमाशंकर की प्यार करने की योग्यता बनी रही. ६० साल की उम्र होने तक. फिर तो कुछ हो ही जा जाता है. कहिए निरर्थकता का एहसास. बहुत कुछ चला जाता है तो प्यार करने की योग्यता क्या बचेगी.
उनके बेटे अनुज में जो कि सॉफ़्टवेयर इंजिनियर है, यह योग्यता २ साल ही रही. फिर पति-पत्नी बस अच्छे मित्रों की तरह रहने लगे. समझदार लड़का था,प्यार करने की अयोग्यता को उसने जीवन जीने की कला से ढांप दिया; जैसे बड़े बड़े फिल्म स्टार, नेता या उद्योगपति करते हैं.
स्त्री में इस योग्यता के होने या ना होने के बारे में कुछ विश्वस्तता के साथ नहीं कह सकता. लगता है लेखक और दार्शनिक, जो मेरी तरह पुरुष ही थे, स्त्री को प्यार करने की चीज़ या साधन बना कर अपने लिए और मेरे लिए उसकी प्यार करने की योग्यता का माप असंभव बना कर चले गये .
कोशिश करता हूँ, स्त्री में जब प्यार करने की योग्यता मापने की, तो लगता है इंच टेप से इंच टेप को माप रहा हूँ.

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अनुराधा शर्मा सुपुत्री श्री ताराचंद शर्मा

अनु. पूरा नाम अनुराधा शर्मा सुपुत्री श्री ताराचंद शर्मा.
दो दिन पहले विकास के साथ भाग गयी. विकास का शर्मा जी के घर पर आना जाना था, मुहल्ला जानता है.
घर में सन्नाटा है. पड़ोस में घुसर फुसर है. गली में अटकलबाज़ियाँ हैं और गाँव में फैली हैं अफवाहें.
ताराचंद शर्मा ने घर में बैग रखते ही पहले पानी नहीं पिया, सन्नाटे को तोड़ा.
” मुझे कुछ मत बताइए, क्योंकि मुझे कुछ नहीं सुनना. मैं जानता हूँ मेरी लड़की के साथ कुछ बहुत ग़लत हुआ है.”
ज़रा रुके. फिर बोले, ” ऐसा प्यार वार कुछ नहीं होता है कि हाथों में पाली हुई लड़की एक दिन यूँ ही किसी के साथ भाग जाए.”
घर में सब चुप थे. बौखलाहट कम होगी तो कुछ बात की जाएगी.
शर्मा जी घर से बाहर आ गये. ज़ोर से पड़ोसियों को सुना कर बोले, ” मैं सब जानता हूँ, मेरी लड़की के साथ कुछ बुरा हुआ है.”
पड़ोसी हक्का बक्का थे. ” यह लो, अपनी औलाद को तो दोष नहीं देते. बुरा उसने किया है या उसके साथ हुआ है? दिमाग़ ही फिर गया है शर्मा का तो.”
शर्मा जी गली में आकर चिल्लाने लगे, ” कान खोल कर सुन लो, मुझे अच्छे से पता है कि मेरी लड़की के साथ कुछ बुरा हुआ है. और यही रपट लिखवाउँगा .”
गली में लोग एक दूसरे का मुँह देखने लगे.
” एक तो वैसे ही इज़्ज़त खराब हो गयी. अब यह ऊपर से और क्यों फ़ज़ीहत करवा रहा है.”
किसी ने कहा, ” बाप है भाई बाप है, बर्दाश्त नहीं हो रहा.”
शर्मा जी ने गाँव इकठ्ठा कर लिया. चबूतरे पर चढ़ गये. बस एक ही बात कि ‘ मेरी लड़की के साथ कुछ बुरा हुआ है. ऐसे ही नहीं भाग जाती कोई लड़की. पूरे देश को जवाब देना होगा’.”
तमाशा बन गया. अख़बार वाले आ गये. टीवी चैनल पहुँच गये.
इधर अनुराधा ने जयपुर स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठे पापा को बेतहाशा न्यूज़ चॅनेल पर चिल्लाते देखा तो धक रह गयी.
सूखी और सूनी आँखें, और एक ही रट- ‘ मेरी बेटी के साथ कुछ बुरा हुआ है.”
अनुराधा ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगी. सभी यात्री दंग और विकास की तो सिट्टी पिटी गुम.
१८-२० साल की लड़की एक ६ साल की बच्ची की तरह चीख चीख कर रो रही थी.
“मुझे पापा के पास जाना है. किसी को कुछ नहीं पता और सौ कोस बैठे मेरे पापा को सब पता है. मुझे पापा के पास जाना है.”
विकास ने हाथ लगाया तो झटक दिया. ” हाथ मत लगाओ मुझे. कोई प्यार वार नहीं है मुझे. और तुम भी क्या, बस नीची डाल का फल समझ कर तोड़ लाए हो. दूर हटो. सच पता लगेगा तो भाग निकलोगे.”
भाग निकली बस अड्डे की ओर. भीड़ हैरान थी.
” लगता है, पागल है? भाई अगर तू इसका घर जानता है तो ठीक से घर पहुँचा दे.”
विकास पीछे से आकर साथ चलने की कोशिश करता तो और आगे भाग लेती.
बस में आकर बैठ गये. अनु पापा का चेहरा याद कर के फफक फफक कर रो रही थी. हर आदमी से पूछ रही थी, ” यह बस नारनौल ही जाएगी ना?.”
विकास को नारनौल पहुँचने तक अपने प्यार को जीवित रखना था. जो कठिन था.
समय ना धीरे चल रहा था ना तेज़. अपनी रफ़्तार से- एक सेकेंड में सही एक सेकेंड.

कहानीकार का जादू

“गुरुजी, ‘कुमारसंभव’ में कालिदास जब वर्षा की पहली बूँद का निर्वस्त्र तपस्यारत पार्वती के भाल पर गिरने और नाभि तक पहुँचने का जीवंत चित्रण करते हैं तो निश्चित ही उनकी कल्पना का आधार पत्नी विद्योतमा की देहयष्टी रहा होगा. आपका क्या विचार है?”
पिताजी ने आँखें मूंद रखी थी, और देर से कालिदास की इस धृष्टता पर, उसके कुष्ठपीड़न और निवारण पर, इन दो नवदीक्षित शास्त्रियों का मुखर विवाद सुन रहे थे.
मैं पास ही बैठा आर्कीमिडीज़ के सिद्धांत से सिर धुन रहा था, पर मेरे कान लगे थे इनकी चर्चा पर.
पिताजी ने विस्मयभरी मुस्कान के साथ आँखें खोली. बोले, ” २००० साल बीत गये, उस बूँद की यात्रा की अनेक संदर्भों में व्याख्या हुई है- ऋतुपरिवर्तन, सृष्टि-सृजन से लेकर शिव-पार्वती संभोग तक. आप स्वयं कल्पना कीजिए; एक बूँद पार्वती के मस्तक पर गिरती है, घनी भौं में अटकती है, नासिका के सिरे से टकराकर, काँपते होठों पर आ थमती है, ठुड्डी से फिसलकर पार्वती के उन्नत और सख़्त उरोज से टकराकर मुलायम पेट पर बिखर जाती है, और फिर एकत्र होकर नाभि में जा कर समा जाती है. अद्भुत! कालिदास ने जिस असम्भव को संभव किया उस पर किसी की दृष्टि नहीं पड़ी.”
कुतूहलवश दोनों युवा शास्त्रियों के कान खड़े हो गये.
” भला वर्षा की एक नन्ही सी बूँद इतनी लंबी, विकट और ऊँची-नीची यात्रा कैसे तय कर सकती है? यह किसी ने आज तक नहीं सोचा. सबका ध्यान उस बूँद के मार्ग और अर्थ की गहराई पर लगा रहा. यह होता है एक कहानीकर की कलम का जादू.”दोनों शास्त्री ऐसे देख रहे थे जैसे हाथ में लड्डू हो और मुँह में पान.
मैंने उसी दिन संकल्प कर लिया था,” बाबा आर्कीमिडीज़, मैं आपका सिद्धांत अवश्य पढ़ूंगा. आइनस्टाइन को भी पढ़ूंगा. पर क्षमा करना, लिखूंगा कहानी. केवल कहानी.

काम से छुट्टी

दरवाज़े की घंटी सुनते ही नीरज ने सौ का नोट ऊपर की जेब में रख लिया. उसका अनुमान सही निकला, मावसी ही थी.
” मेडम तो दो दिन के लिए दिल्ली गयी मावसी, उनके पापा की तबीयत खराब है.” नीरज ने दरवाज़ा पूरा नहीं खोला.
” झाड़ू पोंचा तो कर दूं साब.”
” अरे रहने दो मावसी, परसों सुबह आके अच्छे से साफ कर देना. मेडम को बोलना रोज़ पोंचा लगाया है.” उसने सौ का नोट मावसी की तरफ बढ़ा दिया . मावसी ने नोट नहीं पकड़ा.
” साब आप लोग गुलदस्ते लेते देते हैं, मैं छुट्टा काम निपटाके पूरे दिन गुलाब के फूल तोड़ती हूँ.”
” मतलब? मैं समझा नहीं.” नीरज थोड़ा चिढ़ गया.
” साब दो दिन काम पर नहीं आने के खाली सौ रुपये?”
” नीरज ने सौ का नोट जेब में रख लिया, और पर्स से पाँच सौ निकाल कर दे दिए.”
” अब ठीक है साब. कितने फूल रोज़ तोड़ती हूँ साब, पर इतनी सफाई से की क्या मज़ाल एक काँटा लग जाए.’

दो दिन या एक रात

मंटू के पापा हर शनिवार चार बजे आ जाते थे. उस दिन उनका मूड बहुत अच्छा होता था. किसी भी बात पर उन्हे गुस्सा नहीं आता था. इतवार सुबह से उन पर भूत सवार हो जाता था. हर बात पर झगड़ा. कई बार तो मम्मी को एक दो तमाचे भी लगा देते थे. शाम होते गुस्से से भरा मुँह लिए, अपना बैग और टिफिन उठाकर एक हफ्ते के लिए चले जाते थे.
एक दिन सोमवार को स्कूल जाते हुए मंटू ने मम्मी से कह ही दिया, ‘ मम्मी, पापा से बोल दो, जो हफ्ते में दो दिन के लिए आते हैं, नहीं आया करें.’
मम्मी ने कहा, ‘ नहीं रे मंटू ऐसा नहीं बोलते. तुझे थोड़ा ही ना कुछ कहते हैं. बस एक रात के लिए तो आते हैं.”
मंटू समझता था पापा दो दिन के लिए आते हैं. पर मम्मी जानती थी कि मंटू के पापा बस एक रात के लिए आते हैं.

लिछ्मी

लिछ्मी कतई मानने को तैयार नहीं थी.
” नहीं शंभू, नहीं ! तेरा मन करे तो यहाँ आ जाया कर. नहीं तो कोई बात नहीं. अब इन हाथों में जान नहीं है रे.”
उसने अपने दोनों हाथ शंभू के आगे कर दिए और उसका सिर ना में हिलता रहा.
शंभू उसकी हथेलियों को सहलाता हुआ बोला, ” अरे बावली, मैं इन हाथों को मशक्कत कोई ना करने दूँगा. मेरे साथ रहेगी तो तू सुख भोग़ेगी.”
” क्या है ना शंभू, जब तक औरत मर्द के क़ब्ज़े में नहीं आती वह ऐसे ही मिन्नत करता है और बस एक बार उसकी हुई तो हैवान हो जाता है. जानवर सा टूट टूट के पड़ता है. मैं बोलती हूँ ना अब मुझ में जान नहीं रही.”
शंभू उसकी अँगूलिओं से खेल रहा था.
“बिरजू भी शुरू में ऐसे ही बोलता था. पर मुझे याद है वह दिन.”
उसने आँखें ऊपर करके शंभू की आँखो में देखा.
” उस दिन जो मेरा हाथ ज़रा सा काँप जाता तो बिरजू की जगह मेरी लाश पड़ी होती. टुकड़े टुकड़े करता वो मेरे. ये तो दुर्गा माई ने पता नहीं कहाँ से मुझे ताक़त दे दी थी…. पर अब नहीं शंभू, अब इन हाथों में जान नहीं है.”
शंभू ने झटके से लिछ्मी का हाथ छोड़ दिया. ज़मीन को घूरता रहा और फिर उठ कर चला गया. दोबारा कभी नहीं आया.

हीरवाल की दंत-कथा

बीर सिंघ यूँ तो भरा पूरा नौजवान था मगर दुर्भाग्य से एक आँख बचपन में ही माता ने छीन ली थी. लक्ष्मी की थोड़ी कृपा थी तो स्त्रीगमन के मौके भी यदा कदा आए. पर नारी की कोमल देह को देखने की ललक कभी पूरी नहीं हो पाई. हीरवाल में मान्यता थी अगर किसी एक-नेत्री की नज़र स्त्री की निर्वस्त्र काया पर फिर गयी तो उसका यौवन पेड़ से टूटी डाल की तरह देखते देखते ही सूख जाएगा.
समय ने करवट ली. बीर सिंघ के घर भी एक दिन दिया जलाने वाली का पैर पड़ा.
दिया जला तो बीर सिंघ ने बुझाने से मना कर दिया. हीरामन ने लाख मिन्नत की पर बीर सिंघ नहीं माना. हीरामन गठरी होकर बैठ गयी. बीर सिंग ज़िद पर आकर उसकी ओढनी खींचने लगा. वह अपनी ललक पूरी करने पर आमादा था. बहुत देर की खींचतान के बाद हीरामन के हाथ से ओढनी छूट गयी. जैसे ही ओढनी हटी तो बीर सिंघ की इकलौती आँख तीन बार झपझपाई और उसका कलेजा मुँह में आ गया. उसे लगा हीरामन का चेहरा तो स्त्री का है पर शरीर किसी बड़ी सी मछली का है. उसके पेट पर नाभि नहीं थी. हीरामन उसे एक मत्स्यकन्या लग रही थी. वह कई देर तक ओढनी का एक सिरा पकड़े चित्रवत सा हीरामन को देखता रहा. होश आया तो उसने ओढनी का पल्ला छोड़ा, घर छोड़ा, गाँव छोड़ा और सीधा बीहड़ में चला गया. आगे जाकर वह डाकू बीर सिंघ के नाम से कुख्यात हुआ. उसने हीरवाल में बहुत डाके डाले पर कभी किसी औरत की तरफ नज़र उठा कर नहीं देखा.
इधर हीरामन उठी, अपनी ओढनी ठीक की और रात को ही जाकर गाँव के बाहर बड़े तालाब में कूद गयी. गाँव वालों को पता चला तो बड़े बड़े तैराक और गोता खोर तालाब में उतारे. पर ना हीरामन की लाश मिली ना उसके कपड़े. चौथे दिन किसी की भी तालाब में उतरने की हिम्मत नही हुई .बात फैलती हुई अँग्रेज़ की सरकार तक गयी तो पूरे तालाब को छंतवाया गया. पर हीरामन का नामोनिशान नही मिला.
हीरवाल के लोगों का कहना है कि आज भी कोई अकेला मर्द तालाब के पास जाए तो हीरामन जलपरी बन कर पानी पर नाचती है.
बाबा बिहरिदास का कहना है- नाभि का शरीर में कोई काम नहीं होता है. पर नाभि के बिना मनुष्यदेह असंभव है. ब्रह्मा भी नाभि बनाए बिना मनुष्य की रचना नही कर सकता.
मेरा सोचना है, हीरामन जगतपिता की पहली और आखरी भूल से पैदा हुई थी.