पुरुष, और पुरुष

नहीं, तुम अभी भी पुरुष बनकर पढ़ रहे हो मेरी कहानियाँ
और, और भी पुरुष बन सोच रहे हो मेरी नायिका के बारे में.
और मैं, हो जाना चाहता हूँ स्वयं एक स्त्री
ताकि पूरी तरह जान सकूँ अपनी नायिका की पीड़ा
तुम चाहो तो मुझे ‘हिजड़ा’ कह लेना
अपने पुंसत्व की झूठी पहचान के लिए.
मैं अर्धनारीश्वर सा हो जाऊँगा तुम्हारे ईश्वर की तरह?
या बृहन्नला सा, तुम्हारे महान योद्धा की तरह?
मगर मुझे नहीं होना कोई ईश्वर या कोई योद्धा
मुझे होना है स्त्री बन कर एक पूरा मनुष्य
मुझे नहीं होना तुम्हारी तरह और पुरुष, और पुरुष.
और तुम भी नहीं जाना मेरी नायिका के पास
बन कर पुरुष, और पुरुष, और पुरुष
हो सकता है वह तुम पर वार कर दे
जब तुम मदमाए हुए हो अपने पुरुषत्व में
और तुम लौट कर ही नहीं आओ
और आए तो तुम्हें घृणा हो जाए अपने पुरुषत्व से

एक माँ की बाइट

दूध सूखते ही हरदेई ने अपने दूसरे बच्चे को भी दहलीज़ के बाहर छोड़ दिया. वह फिर पेट से थी. आख़िर सात में से चार ही बच पाए. दूसरा मंगल को हुआ था सो मंगल नाम पड़ा.
चार में से एक लड़की थी, जो प्लास्टिक चुगते चुगते जवान हो गयी और एक दिन वापस नहीं लौटी. बड़े वाला दया बस्ती स्टेशन पर पड़ा, ब्रेड पर बूट पोलिश लगा कर जीवन को मज़ेदार बनाने की कोशिश में मर रहा है. सबसे छोटा अपाहिज़ है सो रोटी की बाट में दिन गुज़ारता है. घर में पड़ा है तो दिखता है. बाप जवानी में ही बूढ़ा होकर मर गया.
मंगल तो जब हाथ स्टेशन के नल तक पहुँचने लगे तभी निकल गया था.. इस तरह निकलने वाले दिशा और मंज़िल की नहीं सोचते.
२० साल बाद टीवी पत्रकार कैमरा उठाकर हरदेई की झुग्गी में पहुँच गये हैं.
” देखिए, आपका बेटा बलात्कार और हत्या के जुर्म में पकड़ा गया है. आप ने टीवी पर देखा होगा?”
एक ने पूछा ,” आप को कैसा लग रहा है? आप एक माँ हैं?”
दूसरे ने कहा, ” उसे फाँसी भी हो सकती है.”
हरदेई सब के जवाब में दाएँ से बाएँ सिर हिलाती रही.
“आप कुछ तो बोलिए, आप एक माँ है… माँ की ममता है आप में !” ढीठ पत्रकार कहाँ मानने वाले थे. उन्हें हरदेई की बाइट तो लेनी ही थी.
आख़िर हरदेई ने अपने अस्फुट स्वर में बाइट दी.
” काहे की ममता… सात हुए थे. मैने कोई ना किए थे.”

बीमार सूरज भयभीत चाँद

आज कल बहुत कम लोग उगते हुए सूरज को देखते हैं. पर उस दिन जिसने भी देखा लगा होगा सूरज कुछ बीमार सा है. मुँह धोने में भीं देर लगाई और फिर चिड़चिड़े मन से निकल पड़ा. दुपहर तक बुखार से तपने लगा. शहर के लोग व्यस्त थे किसी ने ध्यान नहीं दिया. एक आध आवारा से बादल के सिवाय जिसका बारिश से कोई लेना देना नहीं था, आसमान साफ था.
यही था वह दिन जब बुखार में तपते हुए सूरज के सामने कुछ लोग बंदूकें लिए हुए स्कूल में घुसे और देखते ही देखते १३२ बच्चों को गोलियों से भून डाला. बुखार की खुमारी में रात होने तक सूरज ने यह खूनी खेल देखा. फिर चाँद आया, और फटी आँखों से बच्चों की नन्हीं नन्हीं लाशों को देखता रहा . भय से सुन्न था चाँद. उस दिन के मौसम, हवा, और पेड़ों की चुप्पी सबका वृतांत है मेरे पास.
पर नहीं दोस्तो,मैं वह सब नहीं लिखूंगा. अगर लिख दिया तो सब पूछेंगे कि मैं बाबूलाल शर्मा वल्द वेदप्रकाश शर्मा, साकिन मौजा: सीहोर, ज़िला: महेंद्रगड़ उस समय उस स्कूल के पास क्या कर रहा था.
माफ़ कीजिए, मेरी पत्नी जिसे मैं बहुत प्यार करता हूँ कुछ अरसे से टीवी पर समाचार देख देख कर अनिद्रा से पीड़ित है.

मैं और शिबी

आज मुझे कोई सबसे ज़्यादा याद है तो शिबी.
मेरी पत्नी मुझे छोड़कर चली गयी थी और मै समय के प्रवाह के साथ बह रहा था , तो शिबी से मेरी मुलाकात हुई. जहाँगीर आर्ट गॅलरी में, जब उसकी कुछ ढूँढती आँखें मेरी खोई हुई आँखों से टकराई, मुझे याद है वह क्षण. हम फिर पूरे दिन साथ रहे, पूरी रात भी, और फिर कभी अलग नहीं रह पाए. मेरे और मेरी पत्नी के बीच अहम का एक पहाड़ था, और मेरे और शिबी के बीच अगर कुछ नहीं था तो अहम.
उसने हमारा रिश्ता ऐसे सहेजा हुआ था जैसे वाद्य में सुर होते हैं. हम आत्मसखा थे. बीस साल साथ रहे. पिछली २३जुलाई की रात तक, जब मैं एक बुरे सपने से बाहर आया, शिबी का हाथ मेरी छाती पर रखा था. एकदम ठंडा. पहले तो मुझे लगा यह मेरा हाथ है और मैं मर चुका हूँ. मगर नहीं, ऐसे खूबसूरत रिश्ते में भाग्यशाली पहले जाता है.
वह जब औरत के लिए कुछ कहता था तो बोलता- ‘ ये रोती हुई रानियाँ’ और पुरुष के लिए कहता- ‘ तुम बेदिल बदतमीज़’. इस से ज़्यादा कठोर शब्द उसने कभी इस्तेमाल किए. मुझे नहीं पता शिबी पुरुष था या स्त्री. हालाँकि हम ज़्यादातर एक ही बिस्तर पर सोते भी थे. उसे पता था मैं पुरुष हूँ. मैं उसे जैसा मन हुआ वैसे बुलाता था- ‘ आज शाम को कहाँ जाना चाहोगी’ या ‘अब तैयार भी होगा या इस पेंटिंग में ही उलझा रहेगा’. सहूलियत के लिए यहाँ उसे पुल्लिंग बता रहा हूँ.
मैने उस दिन उसे अपने हाथों से नहलाया. एक छोटे बच्चे सा लग रहा था. मगर मुझे आज भी नहीं पता शिबी एक पुरुष था या स्त्री थी .कभी मेरे पिता सा, कभी माँ सा, कभी पत्नी सा, कभी भाई सा, कभी बहन सा, वह मेरा सब कुछ था. मैं एक लेखक था और शिबी एक पेंटर. वह ज़्यादातर मेरी कहानियों की पैंटिंग बनाता था. उस के जाने के बाद मैने कोई कहानी नहीं लिखी है. मेरी कहानियाँ तो आपने पढ़ी हैं, मगर जब आप शिबी की पेंटिंग देखेंगे तो मेरी कहानियाँ उनके सामने छोटी पड़ जाएँगी.
बाद में सभी लेखक और आर्टिस्ट मित्रों को फोन किया. मेरी पत्नी भी आई थी. सब उठ कर जा रहे थे तो मेरे पास आई. “अब क्या करोगे? तुम्हें तो अपनी देखभाल करना भी नहीं आता. चाहो तो मेरे पास आकर रहो.”
मैने कहा,” नहीं, अब संभव नहीं होगा. अब तो मेरा एकांत ही मेरी दुनिया है.”
मुझे लग रहा था. प्रलय के बाद मैं अकेला बचा हूँ और सृष्टि का फिर से सृजन होना है.

एक ग़ज़ल

दिन का चेहरा देखिए जैसे दहकती रात है !
है खुशी बेचैन गोया गम कहीं पर पास है !!
तन्हा लड़ता एक दिन उस घर सा तू हो जाएगा
जिसमें कोई है नहीं चूल्‍हे में लेकिन आग है !!
कुछ तो अब्बा की भी सुनते खुद कहेगा देखना
दिल की जो सुनते हैं उनके काम की यह बात है !!
क्या कहूँ बच्चों को अब मैं किसलिए बेज़ार हूँ
आज भी सपने में माँ दिखती है पर नाराज़ है !!

हम लुटेरे हैं

वह बोलता जा रहा था. उसकी आँखों में एक अजीब सा आक्रोश था.
” १९८४ में मैंने अपनी आँखों से देखा. कैसे आनन फानन में भीड़ का गुस्सा लूट की नीयत में बदल गया था. कैसे जल्दबाज़ी में घनश्याम तोतला एक ही पैर के दो जूते उठा लाया था. अबकी बार किसी ने ऐसी ग़लती नहीं की. सबने इत्मीनान से लूटा. लूटने के लिए आग अनिवार्य है, बाहर भी और अंदर भी. …हम लुटेरे हैं !”
उसका आक्रोश बढ़ रहा था.
“आंदोलन हमारे लिए लूटने की तमन्ना का उत्कर्ष है. प्यार भी हम इसीलिए करते हैं कि हमारी निगाहें लूट पर लगी रहती हैं.”
उसकी आवाज़ तेज़ हो रही थी.
” हम पेड़ों से फल लूट लेते हैं, पकने का भी इंतेज़ार नहीं करते. वरना कोई और लूट ले जाएगा. हम पौधों से उनके फूल लूट लेते हैं. फूल कुछ काम नहीं आते , बस हमें अच्छे लगते हैं. और जो कुछ भी हमें अच्छा लगता है, हम लूट लेते हैं. ”
वह गुस्से से काँपने लगा था
“हमने गायों से उनका दूध लूटा है. धरती से उसका धान लूटा है. हम धूप लूट सकते हैं. हवा लूट सकते हैं.. हम दूसरों को लूट सकते हैं. खुद को लूट सकते हैं…..”
वह हलकान होकर चुप हो गया.
अचानक ज़ोर से हँसा, और चिल्लाकर बोला. “डी जे, चलो म्यूज़िक बजाओ. हम लूटगान गाएँगे.”
” हम लुटेरे हैं….! हम लुटेरे हैं ….! ” गाता हुआ नाचने लगा

भगवान है रे, पक्का है!

तुम बताओ यह ६ साल का बांद्रा स्टेशन पर फिरता लोटिया कौन है?
नहीं मालूम !

मैं बताता. इस अनाथ छोकरे को कालिया गनी किधर से उठा के लाया. उस का इरादा था इसके दोनों हाथ काटकर भीख माँगने को बिठाएगा. हाथ काटने को अंधेरे में रेलवे की पटरी पर लेकर गया तो कालिए को एक आइडिया आया. बोला, ‘ लोटिया देख, मेरे को तेरे दोनों हाथ काटना था, पर नहीं. आजकल साली पब्लिक ना बड़ी बेरहम हो गयी है. हाथ कटा बच्चा देख के मुँह फेर लेती रे. सुन ! तू यह हाथ रख. पर मेरे को रोज़ सौ रुपये ला के दे. भीख माँग… चोरी कर.. बर्तन धो. सब छूट. पर सौ रुपये ला के दे रोज़. जिस दिन नहीं तो फिर हाथ नहीं. ”
अब रोज़ लोटिया सौ रुपये ला के देता है. हाथ नचा के. खुश है. कालिया भी खुश है अपने आइडिया पर. बोलो, भगवान है के नहीं!
चलो छोड़ो. मुंगरी को ले लो. उत्तन की है. सड़क पर ताड़ गोला बेचती थी. १४ साल की हुई, कपड़े हुए के प्यार हो गया. ग़रीबी में प्यार तो फट से होता है,इसकी मा की.. बाजू के राजू लवनडे के साथ बंबई भाग आई. ये राजू कूतरी के ने खूब ‘प्यार’ किया उसको. जगह जगह ले जाके ‘प्यार’ किया. दिन भर भटकते. रात को ‘ प्यार’ करते. फिर एक दिन बोला, ” तू बैठ. मैं तेरे लिए पाव भाजी ले के आता.” भाग गया हरामी. पर भगवान तो है ना. एक गाड़ी वाला आया. सफेद पैंट, गॅंजी खोपड़ी. बोला, ‘ ए लड़की, बैठ गाड़ी में’. एक अच्छी सी जगह ले के गया. उसने भी वही किया जो राजू कुतरिया करता था. बस प्यार व्यार कुछ नहीं बोला. ५०० का नोट दिया. अब बोलो, भगवान है क्या नहीं!
और सुनो ! इधर ढाकन गाँव में २ बीघा ज़मीन है रामली की. अगर प्रधान बोलता कि कर काग़ज़ पर साइन तो क्या कर लेती. माँगता तो मरवा भी देता. पर नहीं. अच्छे से बोला, ‘ रामली तू कागज साइन कर दे और जब तक जीती है रोटी खाती रह.’
अब बोलो. है ना भगवान. पक्का है रे !