निपुण सेक्रेटरी

(लालच, फरेब, और धोके की एक लम्बी कहानी का गुद्दा गुद्दा )
सेक्रेटरी अपने काम में निपुण थी. स्मार्ट थी, मगर उसके कर्वस छोटे थे यानी ‘s’.
इसको भी काम का ज्ञान था, सेक्सी थी, स्मार्ट भी, और इसके कर्वस बड़े थे, यानी ‘S’.
इधर, बॉस ने लंबी साँस लेकर कहा, ” ‘S’, वी हॅड ए वंडरफुल टाइम. मैं तुम्हें हमेशा मिस करूँगा. मैं हमेशा के लिए इंडिया से बाहर जा रहा हूँ. ..एंड दिस ईज़ फॉर यू. मेरी तरफ से पार्टिंग गिफ्ट.”
” वाउ” सोने का हार देख कर ‘S’ की आँखें लार से भर गयी, ” सो स्वीट ऑफ यू!”
“मगर मैं इसे घ र कैसे ले जाऊंगी? मेरे हसबेंड से क्या कहूँगी?”
“ओह, वी मॅन आर रियली ए स्टुपिड बंच…. कुछ करता हूँ…. ( सोच कर) ‘ s’ से एक छोटा सा बॅग बनवाए देता हूँ. उसकी चाबी नहीं होगी. तुम्हारे पति को ताला तुड़वाना पड़ेगा. उसमें तुम्हारे सीधे सादे पति के लिए एक i- फोन भी होगा.” बॉस अपनी चतुराई पर बलिहारी था.
उधर , पति ने जान पूछ क र फिर दोहराया, ” यह तुम्हारी बुद्धू चचेरी बहन कब तक यहाँ और रहेगी. डफर है (यानी D) कुछ काम नहीं कर सकती. ”
उसे वही उत्तर मिला जो चाहता था, ” नहीं नहीं, देखो उसे काम सिख़ाओ, आप सारे दिन भागे फिरते हैं, मुझे कितना बुरा लगता है. उस से कहो, मैं भी बोलती हूँ, सारे इंशोरेंस के फॉर्म तो भरती रहे, घर पर बैठी. पर उसकी शादी तक हमें ही संभालना है. चाचा जी से वादा किया था. ”
एक हफ्ते बाद भोले से अंदाज़ में अपने पति को छोटा नीला बॅग थमाते हुए ‘S’ ने कहा, ” कितने दिन से यह बॅग मेरे कैबिन में पड़ा है. सब से पूछ कर देख लिया. इसे ले जाओ, ताला खुलवा कर तो देखो.”
पति ने त्योरी डाल कर मुस्कुराते हुए कहा, ” और कुछ कीमती निकला तो?”
” आपका!…. हाँ बस कुछ जुएलरी निकली तो मेरी.”
एक घंटे बाद पति का फ़ोन आया, ” कमाल हो गया. इसमे तो एक i- फोन है. मुझे कितने दिन से चाहिए था. और तुम विश्वास नहीं करोगी. जुएलरी भी है. मैं अभी आ रहा हूँ.”
‘S’ का भाव था जैसे कोई चश्मदीद को सुनी हुई बात बता रहा हो.
” देखो.. !”
‘S’ आश्चर्य से घूर रही थी. ” यह अंगूठी..बस.. तुम तो कह रहे थे ज्वेलेरी?”
” अरे कम से कम डेढ़ तोले की है. और डाइमंड भी लगा है.”
‘S’ सकते में थी. यह क्या हुआ?
तीन दिन बाद ‘S’ और हसबैंड को एक पार्टी में जाना था .
” तो चलो अब कितनी देर और लगाओगी? ” पति ने शिकायत के स्वर में कहा .
“मैंने उस बुद्धू को भी बोल दिया है . अकेली यहां क्या करेगी . ”
‘D’ नीचे उतरी तो उस गले में हार जगमग कर रहा था .
‘S’ पार्टी में भुनती रही.
घर लौटते ही बहाना बना कर ऊपर के कमरे में गयी . ‘D’ की एक तमाचा लगाया .
” कमीनी! जिस थाली में खाती है उसी में छेद करती है. उन्होंने दिया है ना यह हार ?”
‘D’ ने मुस्कुरा कर कहा , “बॉक्स के साथ दिया था उसके लाल मखमल के नीचे एक लेटर भी था . वह मैंने जीजा जी को नहीं बताया है.”
दूसरे दिन ‘D’ आयी , ‘S’ के पास , गुस्से में भरी , ” यह पकड़ो अपना हा र , नकली पड़ा है . निकालो मेरी अंगूठी, मेरे बॉयफ्रेंड इतने प्यार से दी है.”
रात को हसबेंड ने पूछा , “अरे तुम्हारी अंगूठी कहाँ गई? ”
‘S’ ने सकपका कर कहा , “उसने बदला कर लिया, बोली दीदी यह हार तुम ले लो, तुम्हें ज़्यादा फबता है. ”
“देखा, मैंने कहा ना बिलकुल बुद्धू है .”
निपुण सेक्रेटरी ‘s’ को नहीं पता बाद में बैग का क्या हुआ .

Advertisements

नफ़रत की क्रूर महारानी

जिस उम्र में एक औसत गृहिणी गर्भाशय में बढ़ रहे फिब्रोइड्स से हलकान हुई होती है, या फिर कभी कभी तो वेजाइनल प्रओलॅप्स को लेकर अपने जन्म को कोसा करती है, सुदीप वर्मा की पत्नी अंजू उसे छोड़ कर, अपनी बसी बसाई गृहस्थी छोड़ कर, और जो हथिया सकी उसे लेकर, अपने पेंशनयाफ़्ता कुलीग के साथ भाग गई. गालियाँ छिड़क छिड़क कर सुदीप जब अपनी व्यथा कथा सविश्लेषण मुझे सुना रहा था, मैं लाख कोशिश करके भी कोई सही भाव अपने चेहरे पर नहीं ला पा रहा था.
मैं उसका दर्द समझ रहा हूँ यह दिखाने के लिए मैने कह दिया, ” इंसान की फ़ितरत को समझना बहुत मुश्किल है.”
“बिल्कुल नहीं. बल्कि बहुत आसान है.” सुदीप बिफर गया और बोलता चला गया.
“अगर तुम सोच रहे हो यह कोई प्यार-व्यार या सेक्स का चक्कर है तो समझ लो दुनिया की तरह तुम्हारी अकल भी अभी घुटनों के बल चल रही है. और ना ही यह कोई पैसे वैसे का लालच है. प्यार तो दरअसल कुछ होता ही नहीं है. जब कोई कहता है ‘ आई लव यू’ तो वह कह रहा होता है- आई हेट माइसेल्फ, या आई हेट माई फॅमिली, आई हेट दिस वर्ल्ड, आई हेट दिस लाइफ. यह नफ़रत है मेरे दोस्त नफ़रत. यह नफ़रत की क्रूर महारानी ही ज़िंदगी का पूरा राजपाट चलाती है.”
उसने साँस ली और सहज होकर बोला,” मेरी पत्नी मुझसे नफ़रत करती थी. उसने लगातार ३० साल मुझ से नफ़रत की. सही पूछो तो पति- पत्नी का रिश्ता ही नफ़रत का रिश्ता है.”
” मगर ज़्यादातर तो पूरी ज़िंदगी भर साथ रहते हैं.” मुझसे रहा नहीं गया.
” तरस खा कर, मेरे दोस्त, तरस खा कर. जब आप किसी से दिन रात नफ़रत करते हैं तो उस पर तरस आने लगता है. बस उस नीच औरत को मुझ पर तरस नहीं आया या कहिए तरस आना बंद हो गया. और कुछ भी नहीं.”
मैंने कहा, ” मैं तुम्हारे लिए एक ड्रिंक बनाता हूँ सुदीप. हॅव वन, यू विल फील बेटर.”
दरअसल उसकी बात सुन कर मेरे भीतर एक धूल का बबूला सा उठ रहा था जिस पर पानी छिड़कना ज़रूरी था.

जितने किरदार उतनी कहानियाँ

जमील भाई बता रहे थे.
सर, जैसे ही सद्दाम की फ़ौज़ कुवैत में घुसी, इंडियन दूतावास ने हमको बता दिया था कि अब जल्द से जल्द सब को यहाँ से निकल जाना चाहिए. बस तीन शिप और जाने वाले थे. मेरा और नासिर का कामकाज अच्छा चल रहा था, और इंडिया में आकर कुछ करने को भी नहीं था. मैं अकेला था सो पैर जमाए रखना चाहता था. नासिर की बीवी और फूल से दो बच्चे भी साथ थे. हमने ज़ुबैदा भाभी को लाख समझाया कि वह बच्चों को लेकर आगे चली जाए. हम जैसे हालात बनेंगे उसके हिसाब से फ़ैसला ले लेंगे, जल्दबाज़ी में पूरा काम चौपट करना ठीक नहीं था.
पर ज़ुबैदा भाभी एक सुनने को तैयार नहीं. ” इनके सिवा और कौन है मेरा. जीएँगे तो साथ जीएँगे, नहीं तो साथ मरेंगे. मैं इनको पीछे छोड़ कर बिल्कुल इंडिया नहीं जाऊंगी.”
हार कर हम सब आख़िरी जहाज़ अकबर से, जो कुछ समेट सके समेट कर, इंडिया के लिए रवाना हुए. नासिर को रोकने के चक्कर में मुझे भी घिसटते हुए आना पड़ा.
इंडिया आकर नासिर ने मिल्लत नगर में हमारे पड़ोस में दो कमरे का एक मकान ले लिया. और जंग ख़त्म होने का इंतेज़ार करने लगे.
देखो फिर क्या से क्या हुआ. ज़ुबैदा भाभी को दो तीन महीने बाद इंग्लिश सीखने का शोक चढ़ गया. बोली, कुवैत वापस गयी तो कोई नौकरी कर लूँगी. नासिर को भी तज्बीज पसंद आई. सामने ‘टीपू सुल्तान’ सीरियल का एक छोटा सा एक्टर रह रहा था, फ़िरोज़ कुछ नाम था, उस से इंग्लिश सीखने लगी.
इसके कोई पंद्रह दिन बाद नासिर भाई तड़के ६ बजे मेरा दरवाजा पीटने लगे. बौखलाए हुए थे, छूटते ही बोले, ” कोई बार खुली होगी क्या?” मैं बोला, ” इस समय? बोल ना क्या हुआ?”
नासिर भाई के होंठ नहीं खुल रहे थे. बड़ी हिम्मत करके बोले, ” ज़ुबैदा उस हरामजादे के साथ भाग गयी, दोनों बच्चों को छोड़ कर.”
अब बताओ साहेब इसको क्या कहेंगे? जमील भाई का अंदाज़ मुझे चित कर देने का था. चित मैं हो भी गया था, पर पैंतरा अभी था मेरे पास.
मैने कहा, ” जमील भाई यह तो हुई नासिर भाई की कहानी. अगर आप ज़ुबैदा से सुनेंगे तो यही कहानी कुछ और हो जाएगी, और फ़िरोज़ से सुनेंगे तो एक नयी कहानी बन जाएगी. सो जितने किरदार उतनी कहानियाँ…. अब यह बताओ आप की क्या कहानी है इसमें?”
जमील भाई मेरा मतलब समझ गये और झट से बोले, ” नहीं, नहीं अल्लाह कसम, इसमें अपनी कोई कहानी नहीं है.”

रीक्लेमेशन

चरित्रहीन पुरुष दूध पीती बिल्ली की तरह होता है; नीयत से चालक पर आत्मा से अँधा. राकेश जितना मृदुल है, चरित्र का उतना ही ढीला. ऐसे पुरुषों के हिस्से दो तरह की पत्नियाँ आती हैं. एक तो वे सीधी सरल जिनके लिए सच उतना ही होता है जितना कि वे जानती हैं, और दूसरी वे जो मन के क्षय को पूरा करने के लिए अपना अधिकार क्षेत्र थोड़ा बढ़ा लेती हैं जैसे धरती समुद्र से अपने पाटे हुए हिस्से को धीरे धीरे रीक्लेम कर लेती है. राकेशों से लिपटी औरतें इस कहानी का हिस्सा नहीं हैं. अपनी पूनम भी पहली तरह की थी…. मगर पहले पहले.
ऐसा चरित्र एक दिन उजागर तो होता है पर कभी भी गुनहगार रंगे हाथों अर्थात विथ पेंट्स डाउन नहीं पकड़ा जाता है. लाज़िम है, जब कबूतर जैसा आलसी परिंदा और कुत्ते जैसा निर्लज्ज जानवर ही यदा कदा यह ‘जुर्म’ करते पकड़े जाते हैं तो स्त्री-पुरुष तो बंद सुरक्षित कमरों में रहने वाले जीव हैं. और फिर इस ज्ञान के लिए कि कभी ग़लत समय घंटी बज जाए तो सबसे पहले कपड़े पहन कर बाल ठीक करने होते हैं, कॉलर सीधी करनी होती है या बिंदी, लिपस्टिक जांचनी होती है, कोई काम-शास्त्र पढ़ने की ज़रूरत नहीं है. और इतना बस हो जाए तो शातिरमन लागों को कई दरवाज़े मिल जाते हैं.
राकेश को मरवाया उसके मोबाइल ने. ऐसे मेसेज थे कि संदेह के लिए कुछ नहीं था जो कुछ था कल्पना के लिए, एक से एक बढ़ कर, कि जब आमना सामना हुआ तो पूनम को इतना ही बोलना था, ” अब कुछ नहीं बचा है.”
राकेश की सौम्यता ने अपराध-भाव पहना, और हाथ सीधा पूनम के घुटने पर रखा जो इस स्थिति में झटका जाना ही था.
” मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ पूनम मुझे माफ़ कर दो.”
पूनम को लगा किसी ने उसकी गर्दन पकड़ कर पानी में दबोच दी है.
आधे मिनिट के बाद उसे साँस आया जब राकेश ने कहा, “तुम मेरी बात का विश्वास नहीं करोगी पर इस औरत से मेरा कोई शारीरिक संबंध नहीं है. मैं बहक गया था, और यह देखना चाह रहा था कि यह औरत किस हद तक जा सकती है. फिर भी मुझसे वही गुनाह हुआ है जो मैने दरअसल नहीं किया है.”
क्या बात है? ताली बजाने का जी करता है. झूठ वह तिनका है जो डूबते को सचमुच बचा सकता है.
इधर अपनी पूनम भी कितनी ही सीधी हो पर उसे एक एहसास था कि राकेश के रिश्ते में वफ़ाई छोड़ कर उसे बहुत कुछ मिला है. और शादी के कुछ महीने बाद ही अपना पूरा अस्तित्व जो उसने राकेश को सौंप दिया था, थोड़ा थोड़ा रीक्लेम करना शुरू कर दिया था. कोई था जिससे वह अपने अंतर्मन के भाव बाँटने लगी थी.
इस घटना के बाद उसने इस को, जो कोई भी था, हल्का सा छूने दिया. हल्के से स्पर्श से थोड़ा और रीक्लेम किया अपना खोया हुआ हिस्सा.
पर विश्वास कीजिए, वह समुद्र से ऊपर रहेगी. उसे जीना है. ना प्यार करना है, ना समर्पण. वह जानती है.

एक आँसू

दीदी के दो बार पूछने पर कि बेबी आज तू फिर बहुत अनमनी है, क्या हुआ दीदी को नहीं बताएगी, बेबी से नहीं रहा गया; फफ़क पड़ी.
दीदी उसका सिर अपनी गोद में रख कर सहलाने लगी.
” दीदी आपको देखो जीजाजी कैसे हाथों पर रखते हैं. जान जान करते मुँह सूखता है उनका. और इनको देखो, बात बात पर झगड़ा, जली कटी. एक दिन राज़ी खुशी नहीं जाता.”
दीदी ने कहा,” नहीं रे पगली, ऐसा नहीं सोचते. तू बहुत सुखी है.”
और एक गर्म आँसू बेबी के सिर पर टपका. वह चौंक कर खड़ी हो गयी.
” दीदी आप रो रही हैं?”
” नहीं तो रे. मैंने तो बीस साल पहले ही इस मन को मांज धोकर सूखा कर रख दिया था. पता नहीं यह एक आँसू निगोडा कहाँ अटका रह गया था.”
” क्या कह रही हो दीदी?” बेबी बौखला गई.
दीदी ने संयत होकर कहा,” मैंने ५ साल तक उनको टूट कर प्यार किया. बेल की तरह उनसे लिपटी रही. पर जैसे ही पता चला शादी के पहले दिन से ही कोई ओर भी उनसे लिपटी हुई है, मैं एकदम सूख गई. सब ख़त्म हो गया. आज बीस साल हो गये.
बेबी ने सहमे हुए कहा, ” आप और जीजाजी इतने खुश दिखते हैं. और बीस साल से…? .. ‘बोलते’ भी हैं या नहीं?”
दीदी ने शून्य में देखते हुए कहा,” ‘बोलने’ की कोशिश करते हैं वे. पर मुझे लगता है कोई कठफोड़वा पेड़ के तने से चोंच रगड़ रहा है. मैं काठ हो चुकी हूँ.”
इतने में बेबी का मोबाइल बजा. वह उठा कर थोड़ी दूर चली गई.
” पहुँच गई दीदी के पास. तुम कितनी ओछी औरत हो. ज़रा सा झगड़ा हुआ नहीं की रोने को घुटना चाहिए तुम्हें.”
” राजेश प्लीज़ उल्टा सीधा मत बोलो. मैं आ रही हूँ, थोड़ी देर में.” उसने फोन काट दिया.
दीदी मुस्कुरा कर बोली,” जाओ, अपने घर जाओ. जाकर फिर झगडो. खूब बुरा भला कहो एक दूसरे को. रात को मुँह फेर कर सो जाओ. और फिर देर रात एक दूसरे की छाती में मुँह डाल कर खूब रोओ….. जाओ, तुम बहुत सुखी हो रे पगली.”