एक था बगुला, एक था कौआ

दिन में दस बार कौवे को देख कर बगुले का मन किरकिरा हो जाता था. पर क्या करता, पड़ोसी जो ठहरा.
हार कर एक दिन बोल ही दिया,” तेरी भी क्या किस्मत है यार, रात से भी ज़्यादा काला है.”
कौवे ने संयम से कहा, ” रंग से क्या होता है भई, गोरा हो या काला.”
सुनकर बगुले को तो आग सी लग गयी, बोला,” क्यों नहीं होता है? काले रंग को देखते ही मन उदास हो जाता है. अपशकुनी और मनहूसियत का रंग है काला रंग. सफेद रंग को देख कर मन को सुकून मिलता है. शांति और संयम का रंग है सफेद रंग.”
कौवा हँस कर बोला, ” अगर आप की बात सही है भगत जी, तो यह भी मान लो कि रंग चाहे मेरा बुरा है पर किस्मत तो आपकी ही खराब है.”
बेवकूफ़ बगुले को कुछ पल्ले नही पड़ा, चिड़चिड़ा कर बोला,” तुम से तो बात करना ही बेकार है, हमेशा लड़ाई के मूड में रहते हो.”

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वरना गोरैया वापस नहीं आएगी.

डूबते सूरज की स्वर्णिम छटा बिखरी थी. हवा के हल्के झोंके उसके बाल सहला रहे थे. पास की छत पर एक गोरैया फुदक रही थी.
पर ना जाने क्यों उसने टीवी का रिमोट दबा दिया.
२०० लोगों की जान जा चुकी है. प्रलाप मचा है. कहाँ? कैसे?
उसने व्यथित होकर फिर रिमोट दबा दिया, टीवी बंद हो गया.
सूरज डूब चुका था. हवा के हल्के झोंके भी थम गये थे. गोरैया उड़ गयी थी.
उसके भीतर रोने चीखने की आवाज़ें तेज़ हो रही थी.
कोई चारा नहीं था. उसने फिर रिमोट दबाया.
सुखी भविष्य के बारे में एक सरकारी एड चल रहा था. उसने चॅनेल बदलना चाहा, पर ठहर गया.
बुरी खबर को पूरा सुनना पड़ता है, कुछ भी करो.
पार करना है, आगे जाना है तो. वरना गोरैया वापस नहीं आएगी.