एक था बगुला, एक था कौआ

दिन में दस बार कौवे को देख कर बगुले का मन किरकिरा हो जाता था. पर क्या करता, पड़ोसी जो ठहरा.
हार कर एक दिन बोल ही दिया,” तेरी भी क्या किस्मत है यार, रात से भी ज़्यादा काला है.”
कौवे ने संयम से कहा, ” रंग से क्या होता है भई, गोरा हो या काला.”
सुनकर बगुले को तो आग सी लग गयी, बोला,” क्यों नहीं होता है? काले रंग को देखते ही मन उदास हो जाता है. अपशकुनी और मनहूसियत का रंग है काला रंग. सफेद रंग को देख कर मन को सुकून मिलता है. शांति और संयम का रंग है सफेद रंग.”
कौवा हँस कर बोला, ” अगर आप की बात सही है भगत जी, तो यह भी मान लो कि रंग चाहे मेरा बुरा है पर किस्मत तो आपकी ही खराब है.”
बेवकूफ़ बगुले को कुछ पल्ले नही पड़ा, चिड़चिड़ा कर बोला,” तुम से तो बात करना ही बेकार है, हमेशा लड़ाई के मूड में रहते हो.”

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