पीड़क प्यार

जैसे ही रामसरूप की अगिनाइ नज़र सीतडी की कनखियों से टूरती आँखों से मिली, उसे लग गया दिन आ गया है. भय की एक लहर उसके तन को कंपकंपा गयी. उसने जिया है इस भय को, डरते डरते पल्ले से बाँधकर. कभी कभी तो इंतज़ार भी किया है, जब नहीं आया यह कई दिन तक. वह भागेगी नही इस भय से. बस बचेगी थोड़ा सा. बचेगी, इसलिए कि इस तन से ज़्यादा कुछ भी तो नहीं इस दुनिया में अपना.
कहीं हिंसा ने ही तो नहीं जन्मा है इस प्यार को. भूख… भूख से हिंसा… हिंसा से प्यार.
ना जाने कब कुछ भी आकर लगे उस के सिर में और एक टटोला बन जाए. फूट कर खून भी आ जाए. या फिर एक ज़ोरदार हाथ पड़े और काली पड़ जाए उसकी आँख और कनपटी, जो कई दिन उसको पल्ले से छुपानी पड़े. कुछ तो होगा. डरती सी रामसरूप के पास से होकर दूर जाती सीतडी – दो चौपाए; एक हिंस्र, एक आहत होने को तत्पर भी, भयभीत भी. शब्द नहीं आए हैं अभी तक, कोई पूछेगा?
आज टटोले का दिन था. ननद, काकस, आई थी भाग कर, हमेशा की तरह थोड़ी देर से. तब तक कुत्ते भगाने की लकड़ी सीतडी के सिर पर टिक चुकी थी. फूट नहीं निकली. टटोले का दिन था आज.
चिंपान्ज़ी बन कर बैठ गया रामसरूप, घर के बाहर.
“देख लेना, बुढ़ापे में कोई पानी का गिलास नहीं देगा तुझे! पराई जाई पर इतना ज़ुल्म ठीक नहीं है “- काकस जबड़ा भींच कर बोली. रामसरूप तो चिंपान्ज़ी बन गया था. तो चिंपान्ज़ी की तरह देखता रहा कहीं भी.
शिव जी के भूत प्रेत फेरा लगा कर चले गये हैं. चाँद अचानक भाग चला है, बादलों की ओट ओट. रात की चादर मैली से काली हो गयी है. आज रहने दो रोटी और साग को छींके पर ही. आज कुछ और दिन है.
सिर पर पट्टी बाँधे मड़ई के एक कोने में दरी पर सिकुड़ी पड़ी है सीतडी. अंधेरे में एक आहट की बाट है. रात को और गहराने दो. ठहरो.
एक हाथ आकर धीरे से टिकता है, वहीं टटोले पर. एक हल्की सी चीख. आँखों से चूने लगते हैं आँसू.
हाथ से टोकने पर भी हाथ ने ढूँढ ली है राह. वह पोंछ रहा हैं आँसू , जो अब बहेंगे और तेज़, जैसे टूटा है मन में कोई बाँध.
हाथ अब रेंगने लगा है साँप सा. पर नहीं खोलेगी सीतडी अपने वस्त्र, और नहीं खोलेगी अपना मन.
वह स्तनधारी है. स्तनधारियों में भी श्रेष्ठ , वह नारी है. पर होने दो, ऐसे ही होने दो इस विषपायी प्यार को. इतना भी बहुत है इस पीड़क प्यार को.

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बर्फ

“बताओ, सुबह ६ बजे आ के खड़ी हो गयी. – ‘ बहनजी बर्फ है क्या थोड़ी’. मुँह पूरा ढक रखा था. बड़े घर की बहू बनी फिरती है.’
दूसरी औरत बोली, ” अरे बर्फ जमानी आती नहीं होगी. पीछे तो फ़्रिज़ देखा नहीं होगा. हमारे साथ की थी एक- गिन्दो नाम था. शादी हो के चंडीगढ़ चली गयी. घरवाला आया तो रात को अंधेरे में बैठी थी. बोला रे, लाइट तो जला लेती. कहने लगी, मैने तो पूरी माचिस ख़तम करदी, यह मरा बल्ब जलता ही नहीं.” कह के दोनों ज़ोर से हँसने लगी.
पास ही तुरपाई करती बुढ़िया से नहीं रहा गया, ” अरे बेशरमो, क्यों जान कर अंजान बन रही हो. औरत का नसीब ही ऐसा है, मार भी खाए और शर्म के मारे सूजा हुआ मुँह भी छिपाए.”
सुन कर दोनो चुप हो गयी.
फिर एक बोली, ” हाँ रे, उनकी नौकरानी कह तो रही थी-‘ इस बात में तो जैसी हमारी जिनगी वैसी ही इन पैसेवालियों की. कल से पेट दर्द का बहाना करके कमरे में पड़ी है बेचारी.”
सारी बर्फ रात को छोटा ठाकुर के गिलास में चली गयी थी.