काली छाया नहीं, सफेद धूप

शराब पीकर गाड़ी चला रहा था मरने वाला और अभागिन का छापा लग गया अनसूया को. लाल चुनरी ओढ़ कर गयी थी २० दिन में ही सफेद दुशाला सर पर डाल कर लौट आई. जिस पीहर में उड़ती फिरती थी, वहीं भीगी चिड़िया सी दुबक कर रहने लगी. कभी हुआ तो, सुषमा के इधर घंटे आधे घंटे जाती होगी, काम काज में हाथ बंटाने के बहाने. वह भी जब उसका ऊँचे मुँह वाला पति बाहर गया होता, और बच्चा स्कूल में, बस तभी.
एक दिन जनार्दन बाबू खराब पेट के दबाव में जल्दी घर लौट आए तो इस विधवा को अपनी बीवी से बतियाते देख माथा भी खराब हो गया. अनसूया तो नीची गर्दन करके निकल गयी, पर सुषमा को कई तरह से, और कई बार, शुभ-अशुभ का ज्ञान लेना पड़ा.
” देखो चेहरा देख कर ही अपशकुन सा लगता है. वीरान पगडंडी सी माँग, फूले हुए पपोटे, अपशकुनी का लिबास, ज़रा देखो तो, देख कर ही मन खराब हो जाता है. हम बाल बच्चे वाले हैं, ईश्वर की कृपा है हम पर. तुम्हीं बताओ हम क्यों किसी के वैधव्य की काली छाया हमारी गृहस्थी पर पड़ने दें, ”
सुषमा का दिल हुआ कि कहे- ‘ इसमें इसका बिचारी का क्या कसूर है.’ पर जानती थी कि जिरह के बाद भी हार उसी की होनी है तो क्यों ना पहले ही मान ले. अनसूया को कह तो नहीं पाई पर रूखे व्यवहार की बाड़ लगा कर जैसे तैसे उसका आना बंद करा दिया.
समय बीतते अनसूया के वैधव्य का विषाद कम हुआ और सफेद लिबास यौवन की आभा में दमकने लगा.
एक दिन सरदर्द की वजह से सुषमा बाज़ार से जल्दी लौट आई और जो देखा तो लगा अभी गिर पड़ेगी. उसके तेवर देख कर अनसूया उठ कर जाने लगी. पर उसने कहा ज़रा ठहरो, ” मैने उस समय तो इनके कहने पर तुझे अपने घर आने से मना नहीं किया था. मैं विधवा होने में किसी औरत का दोष नहीं मानती. पर आज इनके सामने ही तुम्हें कह रही हूँ कि तुम अब कभी यहाँ मत आना. मैं नहीं चाहती तुम्हारे वैधव्य की सफेद धूप मेरी गृहस्थी पर पड़े.”
अनसूया का तो पता नहीं क्या सोच रही थी पर जनार्दन बाबू को तो जैसे किसी ने ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया था.

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भगवान है रे, पक्का है!

तुम बताओ यह ६ साल का बांद्रा स्टेशन पर फिरता लोटिया कौन है?
नहीं मालूम !

मैं बताता. इस अनाथ छोकरे को कालिया गनी किधर से उठा के लाया. उस का इरादा था इसके दोनों हाथ काटकर भीख माँगने को बिठाएगा. हाथ काटने को अंधेरे में रेलवे की पटरी पर लेकर गया तो कालिए को एक आइडिया आया. बोला, ‘ लोटिया देख, मेरे को तेरे दोनों हाथ काटना था, पर नहीं. आजकल साली पब्लिक ना बड़ी बेरहम हो गयी है. हाथ कटा बच्चा देख के मुँह फेर लेती रे. सुन ! तू यह हाथ रख. पर मेरे को रोज़ सौ रुपये ला के दे. भीख माँग… चोरी कर.. बर्तन धो. सब छूट. पर सौ रुपये ला के दे रोज़. जिस दिन नहीं तो फिर हाथ नहीं. ”
अब रोज़ लोटिया सौ रुपये ला के देता है. हाथ नचा के. खुश है. कालिया भी खुश है अपने आइडिया पर. बोलो, भगवान है के नहीं!
चलो छोड़ो. मुंगरी को ले लो. उत्तन की है. सड़क पर ताड़ गोला बेचती थी. १४ साल की हुई, कपड़े हुए के प्यार हो गया. ग़रीबी में प्यार तो फट से होता है,इसकी मा की.. बाजू के राजू लवनडे के साथ बंबई भाग आई. ये राजू कूतरी के ने खूब ‘प्यार’ किया उसको. जगह जगह ले जाके ‘प्यार’ किया. दिन भर भटकते. रात को ‘ प्यार’ करते. फिर एक दिन बोला, ” तू बैठ. मैं तेरे लिए पाव भाजी ले के आता.” भाग गया हरामी. पर भगवान तो है ना. एक गाड़ी वाला आया. सफेद पैंट, गॅंजी खोपड़ी. बोला, ‘ ए लड़की, बैठ गाड़ी में’. एक अच्छी सी जगह ले के गया. उसने भी वही किया जो राजू कुतरिया करता था. बस प्यार व्यार कुछ नहीं बोला. ५०० का नोट दिया. अब बोलो, भगवान है क्या नहीं!
और सुनो ! इधर ढाकन गाँव में २ बीघा ज़मीन है रामली की. अगर प्रधान बोलता कि कर काग़ज़ पर साइन तो क्या कर लेती. माँगता तो मरवा भी देता. पर नहीं. अच्छे से बोला, ‘ रामली तू कागज साइन कर दे और जब तक जीती है रोटी खाती रह.’
अब बोलो. है ना भगवान. पक्का है रे !

एक्सट्रा काम

राजीव ने दरवाज़ा खोला तो जानाबाई ढलता सूरज देखती फर्श पर बैठी थी.
” अरे जाना तुम घर नहीं गयी अभी तक.”
” आप ही की बाट देख रही थी साब. आपने कल एस्ट्रा काम के लिए सौ रुपये अलग से दिए थे ना.” राजीव सुनकर सोच में पड़ गया
.” पर थोड़ा जल्दी करो साब. घर पर लड़की अकेली है.”
राजीव को समझ में नहीं आया क्या जवाब दे. उसने हड़बड़ी में कहा,” तुम अब जाओ. लड़की को भी साथ ले आया करो, तुम्हारे पीछे से पूरा दिन अकेली रहती होगी.”
जाना पूरी रात राजीव की बात के अच्छे बुरे मतलब सोचती रही.