हवा बंद है

उसके स्वर की मृदुलता मिठाई पर लगे वरक की तरह अलग दिखती थी.
” खाना खा लिया आपने?”
इस सवाल में चाहे सुनने वाले को अपनापन दिखे, पर विभा को रोज़ इसका नुकीला सिरा चुभता था. उसने कभी प्रियम से पहले खाना नहीं खाया, प्रियम जानता था. इस सवाल का सीधा मतलब था ‘ मेरा खाना परोस दो, तुम्हारी तुम जानो.’
“मेरी ब्लू शर्ट में बटन लगा दिया?”
विभा जानती थी इस सवाल में कील कहाँ है. प्रियम को पक्का पता है दो बार याद दिलाने के बाद भी रमा ने अभी तक बटन नहीं लगाया है. ब्लू शर्ट शायद उसे पहनना भी नहीं हो, पर रमा को अहसास दिलाना है- ‘ तुम्हें मेरा बिल्कुल ख़याल नहीं है.’
“मनोज ( रमा का भाई) को बोल क्यों नहीं देती कि जब भी आए कुछ ना कुछ लाना ज़रूरी नहीं है.”
इस सीधी सी बात में कितने दांते है, वह जानती थी. प्रियम का मतलब था मैं जानता हूँ मनोज यहाँ कुछ देने के लिए नहीं , लेने के लिए आता है, तो ये बेमतलब की चीज़े लाने का दिखावा किसलिए करता है.
“मैं जो हॉंगकोंग से टी-शर्ट लाया था, वो दे दी उसको?”
यह सवाल कम और प्रहार ज़्यादा था. ‘जब उसके लिए लाए थे दे ही दी होगी. कहो ना यह जानना है कि और क्या क्या दे दिया टी-शर्ट के साथ. या तो मुझे सब बताओ, या फिर भाई के हेज़ के गुनाह को महसूस करो.’
कांताबाई पोंचा लगाते हुए बोली, ” कितने अच्छे हैं साब. हर बात कितने प्यार से पूछते हैं. और कितना ध्यान रखते हैं आपका, है ना? मेरा मर्द तो हर बात पे ऐसे चिल्लाता है कि दिल करता है कुछ उठा के उसके सर पे मार दूं.”
विभा बोली, ” कांता उधर हवा आ रही है?”
“नहीं तो मेडम, बिल्कुल भी नहीं.”
“ज़रा इधर आओ तो.” विभा का स्वर भारी था.
“….. मैं यहाँ खिड़की के पास बैठी हूँ, यहाँ भी बिल्कुल हवा नहीं है. है ना?”
कांता मुँह बिचका कर वापस पोंचा लगाने चली गयी. सोच रही थी, ‘मर्द डाँटता पीटता रहे ना तो ही औरत का दिमाग़ ठीक रहता है रे बाबा. नहीं तो खिसक जाता है थोडा. खिड़की के पास हवा नही आ रही तो मैं क्या करूँ. उन्ह!’

अलग भाव अलग दिशा

उत्तर से आती युवा सैनिकों से भरी बस लाल बत्ती पर रुकी. उसी समय पूर्व से एक राजनीतिक कार्यकर्ताओं का दल आया. उन्हें लालबत्ती पर रुकने की दरकार नहीं थी. पर युवा सैनिकों को देख कर उनका देशप्रेम छलक आया था. सैनिकों के चेहरों पर एक तटस्थ सी मुस्कान थी. कार्यकर्ताओं के हाथ में झंडे थे.

भावातिरेक में कार्यकर्ता ज़ोर ज़ोर से देश- प्रेम के नारे लगाने लगे. भाव विहीन सैनिक बस के शीशों से उन्हें देख रहे थे. कार्यकर्ता चाह रहे थे सैनिक नारों में उनके साथ हाथ उठाएँ तो मज़ा आए. मगर सैनिक स्थिर मुद्रा में बैठे रहे.
बस दक्षिण की ओर चली गयी, कार्यकर्ताओं का जुलूस पश्चिम की ओर.

एक मील गये होंगे कि सैनिकों ने देखा उनकी दाहिनी ओर एक तीन मंज़िला इमारत में ज़ोर की आग लगी है. इधर कुछ बीस कदम गये होंगे कि कार्यकर्ताओं को सामने से दूसरी पार्टी के कार्यकताओं का जुलूस आता दिखा. सैनिक बस से कूदे. चेहरे पर कपड़े का मास्क बाँधा और इमारत की ओर दौड़े. कार्यकर्ता फ़िर ज़ोर ज़ोर से वही नारे लगाने लगे. नारे वही थे पर उनकी आवाज़ में अब आक्रोश था, और तेवर में हिंसा. दूसरी और से भी वैसे ही नारे लगने लगे और देखते ही देखते दोनों ओर के झंडे लाठियों में बदल गये.

इधर सैनिक इमारत में फँसे, रोते चिल्लाते, बच्चों और औरतों को एक एक कर हिफ़ाज़त से बाहर निकाल रहे थे. उधर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता झंडे , माफ़ कीजिए, लाठी बरसा कर एक दूसरे को लहूलुहान कर रहे थे. भीड़ इधर भी जमा हो गई थी और उधर भी.

सैनिकों ने जलती हुई इमारत से सभी को बचा लिया है. वे अपना काम पूरा कर, बिना किसी से बात किए बस में बैठ कर दक्षिण की ओर चले गये हैं.

कार्यकर्ताओं की मुठभेड़ में तीन लोग मारे गये हैं और लगभग बीस घायल हुए हैं. पुलिस का दल बल पहुँच गया है. दोनों पार्टियों के बड़े नेता मीडीया को अपना अपना बयान दे रहे हैं.

पश्चिम में सूरज छिप रहा है और उसकी हल्की लाली दक्षिण के आकाश पर फैल रही है.

मेरी मूर्खता अभेद्य है

निर्वस्त्र औरत चेहरा और बीच का बदन ब्लर करने के बाद भी बड़ी खबर होती है. टीवी स्क्रीन पर इधर से उधर भाग रही थी. टीवी पर आज आपको असुरों का राज लगता है तो सोशल मीडिया समझिये पिशाचों का साम्राज्य है. वहाँ ब्लर की ज़रुरत नहीं है.
विपक्ष ने कहा यह इस सरकार की औरत के प्रति घिनौनी मानसिकता का उदाहरण है. सरकार ने कहा सत्ता खोकर विपक्ष बौखला गया है और सरकार को बदनाम करने के लिये ऐसी निन्दनीय हरकतों पर उतर आया है. इतने आरोप प्रत्यारोप पढने को मिले कि लगा जैसे पूरे देश ने मिल कर एक औरत के कपडे़ उतारे हैं.
निर्वस्त्र भागती उस औरत का बदन मेरे जहन से नहीं निकल रहा था. चेहरा बदल जाता. मैं जिस औरत के बारे में सोचता यह नग्न देह उसी की बन जाती. मैं कई दिन बेचैन रहा. मुझे सपने में नंगी औरतों के झुन्ड भागते दिखाई देने लगे.
जेहानाबाद में कहीं यह घटना हुई थी. भगवान की कसम खाता हूँ एक हफ़्ते की छट्टी लेकर – कसम इसलिये खा रहा हूँ कि इस पूरी कहानी में केवल यही झूठ है – मैं जेहानाबाद पहुँचा. बहुत पूछताछ कि पर सब ने यही कहा कि यहाँ कभी ऐसी कोई घटना नहीं हुई.
मगर कोई औरत नग्नावस्था में बेतहाशा सड़क पर भागती फ़िरी है इसमें कोई सन्देह नहीं है. मैं जानता था.
तरंगों को बेधते हुए मैंने वायु में अपने दोनों हाथ ऊपर उठाये और चिल्ला कर बोला:
“तुम मुझे क्या मूर्ख बनाओगे हरामजादो ! मेरी मूर्खता अभेद्य है. सुनो, आज के बाद तुम मुझे कोई गौरव गाथा भी बताओगे तो मैं पहले थूकूंगा फ़िर ताली बजाऊँगा. और अगर तुम मुझे कोई कुकृत्य भी दिखाओगे तो पहले ताली बजाऊँगा और बाद में थूकूंगा. तुम मुझे क्या मूर्ख बनाओगे हरामजादो ! मेरी मूर्खता अभेद्य है.

झूठे वायदे निकले!
घोड़े भी गधे निकले !!
काम आए हथकंडे
रद्दी फ़लसफ़े निकले !!
खर्चे में लिखे पैसे
तकिये के तले निकले !!
हर किताबे-पाक में
कुछ उल्टे सफ़े निकले!!
खुशियाँ सब पुरानी हैं
गम अबके नये निकले !!
रास्ते सीधे थे पर
मंज़िल से परे निकले!!
मंदिर की तलाशी में
कपड़े कुछ फटे निकले !!

पैसा वसूल

जैसे बिल्ली को लगता है चूहा मेरा भोजन है, कमीने गज्जु को लगता था औरत केवल मेरी वासना के लिए बनी है. ऐसा लंपट की कोई बहिन- बेटी वाला अपने घर नहीं बुला सकता. मंदिर भी इसलिए जाता था कि धक्का-मुक्की में लड़कियों को ग़लत जगह हाथ लगा सके. हरामी मेरा रूम-मेट था हॉस्टिल में.
शाम हुई नहीं कि बाल बना के लड़कियों की तलाश में निकल जाता था. एक अभद्र सी हँसी लेकर लौटता और अक्सर एक ही सवाल पूछता, ” यार, ये साधु-महात्माओं का कैसे चलता है. इनके चेहरे से तो लगता है मज़े करते हैं साले.”
” साधु भी बन कर देखले कमीने .” मैं अक्सर एक ही जवाब देता था.
” अरे नहीं यार, पता नहीं साला अकाल हुआ तो मेरे को तो दो ही दिन में भागना पड़ेगा.”
कॉलेज छूटा तो फिर हम कभी नहीं मिले. ऐसे गलीज़ दोस्तों को कौन ढूंढता है और ना ही वे लंपट कभी लौट कर देखते हैं.
अभी पिछले दिनों एक धार्मिक चॅनेल पर हरामी को देखा तो मैं हक्का-बक्का रह गया.
परम पूज्य श्री गजेंद्र जी महाराज. फूलों के मंच पर आसीन हैं. दो शिष्या अगल बगल में और भक्तों की भीड़ सामने बैठ उसकी घिसी पिटी धार्मिक बकवास सुन रही है. यह तो पहुँच गया हरामी! मैंने फटाफट स्क्रीन पर भागते नंबर नोट किए.
पता चला रेजिस्ट्रेशन के ५०० रुपये, सत्संग के २५०० और विशिष्ट भेंट के १०००० रुपये. मुझे लगा यह तो साला १०००० का चूरा करना ही पड़ेगा. महीने भर के बाद भेंट का समय मिला.
स्थान था माला बार हिल का एक आलीशान बंगला जिसको खूब सारा धार्मिक मेकअप किया हुआ था.
दो घंटे और तीन द्वार पार करके मैं गज्जु , माफ़ करना, गजेंद्र महाराज के समक्ष था. उसने मुझे गौर से देखा जैसे कोई एक्स-रे की प्लेट देखता है.
एक शिष्या ने कहा, ” आपको जो भी पूछना है, बस ५ मिनिट का समय है.”
” इस कमीने को दो मिनिट झेलना भी मुश्किल है.” मैंने मन ही मन कहा.
मैने धीरे से कहा, ” अब तो पता चल गया होगा?’
वह ज़ोर से बोला, ” शरमाना क्या है वत्स ज़ोर से कहो….यह भक्त जानना चाहता है कि साधु संत अपनी कामपिपासा कैसे शांत करते हैं.”
फिर रुक कर बोला, ” देखो बच्चा, जब आप संत बन जाते हैं ..सच्चे संत.. तो आपकी वासना मर जाती है. समाप्त हो जाती है.”
मैने पूरे ज़ोर से अपनी हँसी रोकने की कोशिश की और हुआ यह कि मेरे थूक का एक बड़ा सा लुगदा सीधे गजेंद्र महाराज के अधोवस्त्र के बीच जा के गिरा और एक गीला नक्शा बन गया.
ओह, यह क्या हुआ!
एक शिष्या बोली,” यह क्या अशिष्टता है, अब पूजनीय को वस्त्र बदलने पड़ेंगे… आइए प्रभु अंदर चलिए.” गजेंद्र मुझे खा जाने वाली नज़र से घूर रहा था और शिष्या उसे ऐसे पकड़ कर ले जा रही थी जैसे बच्चे का डाइपर बदलना हो.
मैं वहाँ से खिसक लिया. सोच रहा था बचपन में हमने थूक से बहुत काम किए- सुई में धागा डाला, स्लेट साफ की. पर आज तो कमाल ही कर दिया: पैसा वसूल.

सुनयना भाभी

मेरे किशोर मन को लगा था जगन भैय्या को ही नहीं सुनयना भाभी ने मुझे भी धोखा दिया है. मन में उनके लिए नफरत भर आयी, और मैं फिर कभी भी उनके घर की तरफ़ नहीं गया.
एक समय था कि कॉलेज से लौटता तो उनको देखने के लिए आँखें तरसा करती. पुराने सिनेमा की नायिका सी, भरी भरी काया, चंचल आँखें और मतवाली चाल. रेडियो लगा कर काम में मग्न रहती, रोमांटिक गाना आया तो साथ साथ गुनगुनाती. महीना होने से पहले याद दिला देती, ” सत्तन बाबू, हमारी नूरी काजल याद करके ले आना.”
उनकी आंखों में अपनी लायी काजल देख कर अन्तरंगता का एहसास होता.
लंबे बालों का फैशन था, अकेली होती तो बाँह पकड़ के बिठा लेती, ” क्या यह सूखी लंबी ज़ुल्फों में हीरो बने फिरते हो, शादी से पहले ही गंजे हो जाओगे. लाओ थोड़ा तेल लगा दूँ.”
कभी प्रेमिका सी मनुहार तो कभी माँ सा दुलार. मैं बौराया रहता था.
जगन भैय्या महीने में बीस दिन टूर पर रहते थे. सीधे इंसान थे. सुनयना भाभी का दरवाज़ा सबके लिए खुला था.
एक दिन ओमी चाचा ने निकलते ही मुझे झप लिया, ‘ अबे हीरो, अभी तेरी मसें भी नहीं फूटी हैं. कई पाल रखे हैं इसने तेरे जैसे.”
मैं नीची गर्दन करके खिसक लिया. कान दिया तो ओमी चाचा की बात सही लगी . सुनयना भाभी , कहना नहीं बनता, मुझे वेश्या लगने लगी.
अब के बुआ आयी तो बेगाहे सुनयना भाभी का नाम निकल आया. बोली, ” क्या बताऊँ, पूरे जहान में भी ऐसी औरत नहीं मिलेगी. पति अपंग पड़ा है, कोढ़ सा निकला है कुछ. गन्दी बीमारी ले आया कोई. पर जो उसकी सेवा करती है, पूछो मत. और फिर पूरे गाँव की बूढी औरतों के, एक तेल आता है सांडू का, उससे जोड़ों पर मालिश करती है. सारा गाँव बड़ाई करते नहीं थकता. ”
35 बरस बाद सुनयना भाभी से मिलने की ललक मेरे मन में अचानक जाग आयी.
दो मिनट तो घूर कर देखती रही, फिर जो फफक कर रोयी, ” अरे सत्तन बाबू, किधर रास्ता भूले रे आज. अरे ऐसा क्या कर दिया था हमने. तुम तो उमर भर के लिए ही बिसरा दिए. देखो तो रे बबुआ, इन अंखियन ने फिर कभी काजल नही देखा रे. ”
उमड़ते ज्वार को रोकने के लिए मैं अपनी छाती मसलने लगा. फिर मेरे सर पर हाथ फेरती हुई बोली, ” मैं बोलती थी ना गंजे हो जाओगे.” और मुस्कुरा दी, जैसे बारिश होते धूप निकल आती है कभी कभी,
चाय पकौड़े के बाद सहज हुआ तो बोला, ” अब आता रहूंगा भाभी. कहो तो नूरी काजल लेता आऊ.”
संजीदा होकर बोली, ” नहीं रे सत्तन बाबू ,गए वो दिन. हाँ .. हो सके तो सांडू के तेल की एक दो शीशी ले आना. बहुत लगता है. ”
मुझे लगा मैं बहुत अदना हूँ.