ताई रामप्यारी, हेमिंगवे, और फ्रायड

ताई रामप्यारी मटके पर सेवइयाँ बना रही थी. मुझे देखते ही बोली, ‘बैठ बाबू!’
मुझे पता चल गया था कुछ नया किस्सा है ताई के पास.
“यह मास्टर जी के घर की भी अलग ही कहानी है रे बाबू, और मैं बिना बात बीच में आ गयी.”
ताई जब कोई नयी बात बताती तो मुझे अपने सवाल या जवाब चेहरे से ही पूछने या बताने पड़ते थे, बीच में बोलने से मज़ा बिगड़ता था.
” मास्टर जी ने कर दिया है बड़े वाले को अलग. बोल दिया, तेरी और तेरे बच्चों की इस घर में नहीं निभेगी. बात असली क्या है कि यह बड़े वाला मास्टर जी की हाँ में हाँ नहीं मिलाता. अपनी माँ की तरह बड़े बड़े दीदे निकाल कर अड़ के खड़ा हो जावे है. है भी एक दम अपनी माँ के जैसा. मास्टर जी को फिर बर्दाश्त नहीं होती. छोटे वाले की बात अलग है , सूमड़ा सा, दूसरा मास्टर जी है देखने में. और बस करता है सारे दिन ‘ हाँ पिताजी, जी पिता जी.’ ”
ताई ने नज़र घुमा कर मेरी रूचि का जायज़ा लिया. संतुष्ट हुई.
“चलो भई उनके घर की बात. अपने को क्या? पर मेरे को बीच में फँसा लिया बिना बात. माँ का तो लाड़ला है ना बड़े वाला. मास्टर जी स्कूल गये नहीं कि कभी खीर तो कभी लड्डू, छुपा कर दे के आएगी. अब बर्तन वापस कैसे ले? बहू को बोल रखा है, रामप्यारी के यहाँ छोड़ दिया कर. अब मैं भी क्या करूँ तू ही बता? मुँह बोली बहन बना रखा है. खाली बर्तन बहन दे कर आए.”
मुझे पता लग जाता था मेरे बोलने का समय आ गया है. कहानी में कुछ जोड़ने के लिए.
‘”ताई, क्या है ना, किसी पर माँ का मन ज़्यादा तो किसी पर बाप का. यह तो होता ही है हर घर में.”
मेरा इतने कहने से काम नहीं चल रहा था, तो मैं आगे बढ़ गया थोडा. कॉलिज जो जाने लग गया था.
” जो बेटा अपने ऊपर जाता है ना उस पर ज़्यादा मन होता है ताई, क्यों?”
ताई ने मेरी तरफ देखा जैसे कह रही हो- ‘ये सब बातें कहने की नहीं समझने की होती हैं. ये कुदरत के खेल हैं. तू क्या समझता है ताई में इतनी अकल नहीं है.’
हेमिँगवे भी शायद ऐसा ही कहता- ‘कहानी को पूरा खोल कर उसका मज़ा किरकिरा मत करो. सुनने पढ़ने वाले की कल्पना के लिए भी काफ़ी कुछ छोड़ो.’
मैं रुक गया, ताई का रुख़ देख कर. वरना मुझे तो फ्रायड याद आ रहा था.
‘ मास्टर जी के अवचेतन में संदेह छुपा है. छोटे वाला लड़का तो ज़रूर मेरा ही खून है. बड़े वाला का पता नहीं?’
मुझे पता था ताई एकदम भड़क जाएगी. ‘ बाबू तू तो कॉलिज क्या गया तेरी तो बुद्धि ही कुबुद्धि हो गयी. देख भई, ऐसी बात करनी है तो ताई के पास नहीं कहीं और जा के किया कर.’
ताई बिल्कुल सही है. उसे कहानी बताना आता है. पेड़ के बारे में सब कुछ बताने के लिए उसकी जड़ निकालने की ज़रूरत नहीं होती है. पेड़ मर जाएगा. ऐसे ही होती है कहानी. ‘बड़े वाले के माँ के जैसे बड़े बड़े दीदे और छोटे वाला मास्टर जी के जैसा सूमड़ा सा’- कहानी तो इतने में ही हो गई.

Advertisements

एक डरावनी कहानी

नानी कहानी सुनाने लगी.
राजा अपने राजकुमार बेटे से तो बहुत प्यार करता था. पर रानी पर दिन रात जुल्म करता था. राजकुमार को यह देख कर बहुत गुस्सा आता था, पर बेचारा क्या करता. बहुत छोटा था.
एक दिन आया कि राजकुमार जवान हो गया.
अचानक चिंटू घबरा कर बोला, “नहीं नानी नहीं. यह वाली कहानी नहीं. मुझे डर लगता है.”
“डर लगता है बेटा ?” नानी असमंजस में पड़ गई. “तो फिर कौनसी कहानी सुनाऊँ ?”
चिंटू उछल कर बोला, ” शेर वाली कहानी. जिसमें शेर दहाड़ता है, ज़ोर से. और जंगल के सब जानवर डर के मारे थरथर कांपने लगते हैं.”
शेर की कहानी शुरू की नानी ने, पर मन कहीं और उलझा था.

मंगल

दूध सूखते ही हरदेई ने अपने दूसरे बच्चे को भी दहलीज़ के बाहर छोड़ दिया. वह फिर पेट से थी. आख़िर सात में से चार ही बच पाए. दूसरा मंगल को हुआ था सो मंगल नाम पड़ा.
चार में से एक लड़की थी, जो प्लास्टिक चुगते चुगते जवान हो गयी और एक दिन वापस नहीं लौटी. बड़े वाला दया बस्ती स्टेशन पर पड़ा, ब्रेड पर बूट पोलिश लगा कर जीवन को मज़ेदार बनाने की कोशिश में मर रहा था. सबसे छोटा अपाहिज़ था सो रोटी की बाट में दिन गुज़ारता था. बाप जवानी में बूढ़ा होकर मर गया.
मंगल निकल गया. इस तरह निकलने वाले दिशा और मंज़िल की नहीं सोचते.
२० साल बाद टीवी पत्रकार कैमरा उठाकर हरदेई की झुग्गी में पहुँच गये.
” देखिए, आपका बेटा बलात्कार और हत्या के जुर्म में पकड़ा गया है. आप ने टीवी पर देखा होगा?”
एक ने पूछा ,” आप को कैसा लग रहा है? आप एक माँ हैं?”
दूसरे ने कहा, ” उसे फाँसी भी हो सकती है.”
हरदेई सब के जवाब में दाएँ से बाएँ सिर हिलाती रही.
किसी ने अपने दर्शकों को बताया कि मंगल की माँ का कहना है कि उसका बेटा ऐसा कर ही नहीं सकता तो किसी ने अर्थ निकाला कि हरदेई कह रही है मंगल उसका बेटा नहीं है.