हीरवाल की रूपकथा

बीर सिंघ यूँ तो भरा पूरा नौजवान था मगर दुर्भाग्य से एक आँख बचपन में ही माता ने छीन ली थी. लक्ष्मी की थोड़ी कृपा थी तो स्त्रीगमन के मौके भी यदा कदा आए. पर नारी की कोमल देह को देखने की ललक कभी पूरी नहीं हो पाई. हीरवाल में मान्यता थी अगर किसी एक-नेत्री की नज़र स्त्री की निर्वस्त्र काया पर फिर गयी तो उसका यौवन पेड़ से टूटी डाल की तरह देखते देखते ही सूख जाएगा.
समय ने करवट ली. बीर सिंघ के घर भी एक दिन दिया जलाने वाली का पैर पड़ा.
दिया जला तो बीर सिंघ ने बुझाने से मना कर दिया. हीरामन ने लाख मिन्नत की पर बीर सिंघ नहीं माना. हीरामन गठरी होकर बैठ गयी. बीर सिंग ज़िद पर आकर उसकी ओढनी खींचने लगा. वह अपनी ललक पूरी करने पर आमादा था. बहुत देर की खींचतान के बाद हीरामन के हाथ से ओढनी छूट गयी. जैसे ही ओढनी हटी तो बीर सिंघ की इकलौती आँख तीन बार झपझपाई और उसका कलेजा मुँह में आ गया. उसे लगा हीरामन का चेहरा तो स्त्री का है पर शरीर किसी बड़ी सी मछली का है. उसके पेट पर नाभि नहीं थी. हीरामन उसे एक मत्स्यकन्या लग रही थी. वह कई देर तक ओढनी का एक सिरा पकड़े चित्रवत सा हीरामन को देखता रहा. होश आया तो उसने ओढनी का पल्ला छोड़ा, घर छोड़ा, गाँव छोड़ा और सीधा बीहड़ में चला गया. आगे जाकर वह डाकू बीर सिंघ के नाम से कुख्यात हुआ. उसने हीरवाल में बहुत डाके डाले पर कभी किसी औरत की तरफ नज़र उठा कर नहीं देखा.
इधर हीरामन उठी, अपनी ओढनी ठीक की और रात को ही जाकर गाँव के बाहर बड़े तालाब में कूद गयी. गाँव वालों को पता चला तो बड़े बड़े तैराक और गोता खोर तालाब में उतारे. पर ना हीरामन की लाश मिली ना उसके कपड़े. चौथे दिन किसी की भी तालाब में उतरने की हिम्मत नही हुई .बात फैलती हुई अँग्रेज़ की सरकार तक गयी तो पूरे तालाब को छंतवाया गया. पर हीरामन का नामोनिशान नही मिला.
हीरवाल के लोगों का कहना है कि आज भी कोई अकेला मर्द तालाब के पास जाए तो हीरामन जलपरी बन कर पानी पर नाचती है.
बाबा बिहरिदास का कहना है- नाभि का शरीर में कोई काम नहीं होता है. पर नाभि के बिना मनुष्यदेह असंभव है. ब्रह्मा भी नाभि बनाए बिना मनुष्य की रचना नही कर सकता.
मेरा सोचना है, हीरामन जगतपिता की पहली और आखरी भूल से पैदा हुई थी.

हीरवाल की दंत-कथा

बीर सिंघ यूँ तो भरा पूरा नौजवान था मगर दुर्भाग्य से एक आँख बचपन में ही माता ने छीन ली थी. लक्ष्मी की थोड़ी कृपा थी तो स्त्रीगमन के मौके भी यदा कदा आए. पर नारी की कोमल देह को देखने की ललक कभी पूरी नहीं हो पाई. हीरवाल में मान्यता थी अगर किसी एक-नेत्री की नज़र स्त्री की निर्वस्त्र काया पर फिर गयी तो उसका यौवन पेड़ से टूटी डाल की तरह देखते देखते ही सूख जाएगा.
समय ने करवट ली. बीर सिंघ के घर भी एक दिन दिया जलाने वाली का पैर पड़ा.
दिया जला तो बीर सिंघ ने बुझाने से मना कर दिया. हीरामन ने लाख मिन्नत की पर बीर सिंघ नहीं माना. हीरामन गठरी होकर बैठ गयी. बीर सिंग ज़िद पर आकर उसकी ओढनी खींचने लगा. वह अपनी ललक पूरी करने पर आमादा था. बहुत देर की खींचतान के बाद हीरामन के हाथ से ओढनी छूट गयी. जैसे ही ओढनी हटी तो बीर सिंघ की इकलौती आँख तीन बार झपझपाई और उसका कलेजा मुँह में आ गया. उसे लगा हीरामन का चेहरा तो स्त्री का है पर शरीर किसी बड़ी सी मछली का है. उसके पेट पर नाभि नहीं थी. हीरामन उसे एक मत्स्यकन्या लग रही थी. वह कई देर तक ओढनी का एक सिरा पकड़े चित्रवत सा हीरामन को देखता रहा. होश आया तो उसने ओढनी का पल्ला छोड़ा, घर छोड़ा, गाँव छोड़ा और सीधा बीहड़ में चला गया. आगे जाकर वह डाकू बीर सिंघ के नाम से कुख्यात हुआ. उसने हीरवाल में बहुत डाके डाले पर कभी किसी औरत की तरफ नज़र उठा कर नहीं देखा.
इधर हीरामन उठी, अपनी ओढनी ठीक की और रात को ही जाकर गाँव के बाहर बड़े तालाब में कूद गयी. गाँव वालों को पता चला तो बड़े बड़े तैराक और गोता खोर तालाब में उतारे. पर ना हीरामन की लाश मिली ना उसके कपड़े. चौथे दिन किसी की भी तालाब में उतरने की हिम्मत नही हुई .बात फैलती हुई अँग्रेज़ की सरकार तक गयी तो पूरे तालाब को छंतवाया गया. पर हीरामन का नामोनिशान नही मिला.
हीरवाल के लोगों का कहना है कि आज भी कोई अकेला मर्द तालाब के पास जाए तो हीरामन जलपरी बन कर पानी पर नाचती है.
बाबा बिहरिदास का कहना है- नाभि का शरीर में कोई काम नहीं होता है. पर नाभि के बिना मनुष्यदेह असंभव है. ब्रह्मा भी नाभि बनाए बिना मनुष्य की रचना नही कर सकता.
मेरा सोचना है, हीरामन जगतपिता की पहली और आखरी भूल से पैदा हुई थी.