शिक्षा ज़रूरी है

नीलिमा का टिफिन बनाते हुए मम्मी कह रही थी, ‘ अच्छे से खा लेना. आज पहला दिन है कॉलेज का…. और ठीक से रहना.’
आवाज़ में एक हल्की सी कंपकंपी थी. जो मन में था नहीं कह पा रही थी- ‘ कोई लड़का अगर छेड़खानी करे तो घबराना मत, घर पर आकर बता देना.’ फिर सोचा- ‘ यह भी कोई कहने की बात है. शी!’ मम्मी ने अपना सर झटका.

स्कूटी पर बैठी तो पापा बाहर निकले, ‘ स्कूटी संभाल कर चलाना, पहला दिन है…. और हाँ अच्छे से..’ पापा की आवाज़ में एक अजीब सी परेशानी थी, लगता है कुछ था अनकहा मन में- ‘कोई लड़का बदमाशी करे, तो डरना मत, बस आकर एक बार मुझे बता देना.’ मन में ही रख गये… क्यों ग़लत बात मुँह से निकाली सुबह सुबह.

शाम को नीलिमा लौटी तो घबराई हुई भी थी, और डरी हुई भी. मम्मी से नहीं रहा गया, आशंका कलेजा कुतर रही थी.

‘ठीक तो है ना बेटी. कॉलेज में कुछ हुआ तो नहीं ना!’

‘कॉलेज में क्या होगा मम्मी, बस थक गयी हूँ.’ नीलिमा ने चिढ़ कर कहा.

पापा पूछें तब तक वह अपने चेहरे से घबराहट और डर धो लेगी.

हुआ था कॉलेज में. जब भीड़ में तंग सीढ़ियों पर चढ़ रही थी तो एक हाथ सीधा उसकी छाती पर लगा. उसकी डर के मारे हल्की सी चीख निकल गयी थी .
गर्दन घुमाई तो एक लड़का जिसके गालों पर हँसी थी, और आँखें भेड़िए की तरह चमक रही थी, बोला, ‘ देख क्या रही है, माफ़ कर दे, ग़लती होगी.’

नीलिमा पूरे समय सिहरी रही, और लड़कियों के बीच दुबकी रही. टिफिन भी नहीं खाया. भरा टिफिन घर ले गयी तो प्रमाण बन जाएगा. रास्ते में कुत्तों को डाल दिया.
मम्मी के मन की घबराहट, पापा के दिमाग़ की परेशानी, और नीलिमा का डर अपनी अपनी जगह दुबक कर बैठे हैं.

वैसे सब ठीक ही है, जब तक कुछ बहुत अशुभ नहीं होता है.
शिक्षा ज़रूरी है. सबके लिए.

मगर अब क्या?

आज वह फिर वहीं खड़ा था, खंबे से पीठ लगाकर. तीसरा दिन है. मन में कुतूहल की जगह भय पनप आया. उसे रोज़ इसी रास्ते से कॉलेज जाना है.
मम्मी का जवाब उसे पता था- ‘ तू देखती ही क्यों है उसकी तरफ? कितने दिन खड़ा रहेगा मरा.’
पापा से कहा तो तैश में आकर सुबह से ही चक्कर लगाने लगेंगे और देखते ही उस पर टूट पड़ेंगे. साँस उठ जाएगा. तमाशा बन जाएगा गली में.
पता नहीं क्यों प्रज्ञा सिंह का चेहरा बार बार सामने आ रहा था. प्रज्ञा सिंह की चाल देख कर लगता था, वह कॉलेज में नहीं अपने बाप के बाग में घूम रही है. अवधेश सिंह हैं ज़िला पार्षद और बड़ा लड़का रघुविंद्र उर्फ रघु भैया युवाओं के स्वघोषित संरक्षक.
‘आ बे १९६५ की नायिका!’ प्रज्ञा ने धौल जमाया जो पता नहीं दोस्ती का था या दादागिरी का.
‘कल से तुझे वह कहीं दिखाई नहीं देगा. एक बार शक्ल दिखा दे उसकी.’
सचमुच नहीं दिखा. चुटकी में हल. उसे लगा आज की लड़की विवश नहीं है.
प्रज्ञा मिली तो बड़ी बहन की तरह पूचकारा या चुटकी ली वह तय नहीं कर पाई.
तीन दिन बीते थे कि एक मोटर-साइकल तेज़ी से आई और झटके से उसके सामने आकर रुकी. काला चश्मा उतरा तो उसे तुरंत समझ आ गया- ‘रघु भैया!’
‘ नहीं, रघु, बस रघु!… फिर तो नहीं दिखा ना वह मजनूं? डरने की ज़रूरत नहीं. जब दिल करे सीधी मेरे पास आओ.’
मोटरसाइकल धड़धड़ाती निकल गयी. उसकी साँस उस खरगोश की तरह फूली हुई थी जो अभी अभी चीते की झपट से बचा है. उसके पैर काँप रहे थे.
वह लॉन तक गयी और निढाल होकर बैठ गयी.
उस लड़के से बातचीत कर के समझाया जा सकता था शायद. ऐसे ही बेवकूफी कर रहा हो, शायद शरीफ ही हो.
मगर अब क्या?
कॉलेज तो आना ही है.

सूरज नहीं पोंछता है अब
बस दिखाता है
करोड़ों चेहरों पर
पुता हुआ अंधेरा.
अंधेरे में अपनी ओर आता हुआ
हर आदमी
हत्यारा लगता है.
अंधेरे में हर आहट
एक दुर्घटना की खबर होती है.
सूरज से अब नहीं होगा अंधेरा दूर
बस दिखा पाएगा
दुगनी आँखों को
करोड़ों चेहरे
जिन पर अंधेरा पुता है.