ज़िंदगी जब मैं छटपटाता हूँ !
देख ले कस के काट खाता हूँ !!
क्या रखा है ग़ज़ल में जाने दे
ले सुन बाराखड़ी सुनाता हूँ !!
रोज़ बुनता हूँ एक ख्वाब नया
गम नया उसमे जो छुपाता हूँ !!
पैर उठते हैं दर्द में ठक ठक
चैन आए तो लड़खड़ाता हूँ !!
‘जय हे’ कहते गला रुँधे चाहे
गीत मैं फिर भी पूरा गाता हूँ !!

Advertisements

एक ग़ज़ल

दिन का चेहरा देखिए जैसे दहकती रात है !
है खुशी बेचैन गोया गम कहीं पर पास है !!
तन्हा लड़ता एक दिन उस घर सा तू हो जाएगा
जिसमें कोई है नहीं चूल्‍हे में लेकिन आग है !!
कुछ तो अब्बा की भी सुनते खुद कहेगा देखना
दिल की जो सुनते हैं उनके काम की यह बात है !!
क्या कहूँ बच्चों को अब मैं किसलिए बेज़ार हूँ
आज भी सपने में माँ दिखती है पर नाराज़ है !!