सूखी नदी के पार ( एक अद्भुत प्रेमकथा)

नांगल से कुछ ५ मील है सूखी नदी, और पार करते ही है निज़ामपुर. ऐसी नदी जिसके बीचों बीच पक्की सड़क है. अब तो शायद कोई भी यह कहने वाला नहीं होगा कि उसने इस नदी में पानी देखा था. इसलिए नाम ही सूखी नदी हो गया है.
निज़ामपुर में बिमला का घर ढूँढते आधे गाँव से जान पहचान हो गयी. बाहर एक ६ साल की लड़की कुछ भी नहीं खेलते हुए खेल रही थी. जैसे लड़कियाँ खेला करती हैं.
” बिमला है बेटे?” मैने पूछा ही था कि, ‘ कौन दादी?’ कह कर वह अंदर भाग ली.
मैने रोका, ” अच्छा सुनो तो, क्या कहोगी? कौन आया है? कहना एक आदमी है, राघव नाम है.”
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे एहसास दिला रही हो- ‘आदमी का नाम तो होता ही है, राघव हो या कुछ और.’
उसे अंदर गये ५ मिनिट से ज़्यादा हो गये. मुझे लगा या तो ‘राघव कौन?’ प्रश्न ने चुप्पी फैला दी है या फिर बिमला ने ५० साल की निर्जन राह पर मूड़ कर देखने से मना कर दिया है. कल मन में जागा पावन भाव मुझे आज एक बेवकूफ़ाना हरकत लग रहा था.
इतने में एक किशोर नई चद्दर और तकिया लेकर तीबारी में आया. पीछे पीछे लड़की नया मेज़पोश लिए, मुझे आँखों से कह रही थी, ‘ सही आदमी लगते हो, राघव.’
“आराम से बैठो. मैं तौलिया लाती हूँ, इधर बाथरूम में मुँह हाथ धो लो, दादी ने कहा है” , मुझे लगा अभी कहेगी,’ ज़्यादा शरीफ बच्चा बनने की ज़रूरत नहीं है.’ लड़के को अचानक याद आया उसे मेरे पैर छूने के लिए बोला गया था.
शिकंजी आयी. नमकपारे आए. और अंदर से बर्तनों की आवाज़, छोंक लगने की छूं, और हलवे की महक, और घुसर फुसर. संकोच सा हो रहा था. बिमला दिखे तो कहूँ कि यह सब नहीं करे, मैं तो बस यूँ ही आ गया था.
‘ यूँ ही? ५० साल बाद? क्या बात कर रहे हो राघव? मन के किसी भाव को ५० साल हरा रखने के लिए ५० साल सींचना पड़ता है.’
मुझे लगा बिमला आ गयी. पर नहीं, बहू थी. थाली और पानी का गिलास रख, पैर छुए और झट से चली गयी. मैं कह भी नहीं पाया कि यह सब करने की ज़रूरत नहीं हैं.
मैं खाना खा रहा था तो लगा बिमला पीछे खड़ी मुझे खाना खाते देख रही है.
अबके छुटकी सी बर्तन लेने आई तो मुझे लगा कहीं बिमला ही तो छोटी बच्ची नहीं बन गयी है, अपने ख्याल पर मैं मुस्कुरा दिया. छुटकी कनखियों से देख रही थी. ‘अब तो बता दो’ की चुहल के अंदाज़ में मैने पूछ ही लिया, “दादी कहाँ है?”
इतने में अंदर से किसी के नाक खींचने की आवाज़ आई. लगता है आँसू नाक में उतर आए थे.
छुटकी मुस्कुराइ जैसे कह रही थी- ‘मिल गया जवाब?’
मैं हिम्मत कर के बोला, “देखोगी भी नहीं, सामने आओगी ही नहीं क्या?”
आँसुओं पर मुस्कुराहट चढ़े लहजे में आवाज़ आई, “नहीं, एक ही छबि होनी चाहिए मन में. बस एक ही. कभी बूढ़े राधा किशन की तस्वीर देखी है तुमने.”
मेरे शब्द खो गये थे.
“५० साल हो गये. जब भी गाँव गयी., कोई ना कोई ज़रूर कहता- ‘राघव आया था पूछ रहा था, बिमला कैसी है ?….और अबके तुमने हद ही कर दी. लगता है सारे गाँव के एक एक आदमी औरत से मेरे बारे में पूछ कर आए थे. औरतें हंस रही थी- अरी भई दो क्लास साथ पढ़े थे. ऐसी क्या पढ़ाई की, भगवान जाने” , बिमला की आवाज़ में एक खनखनाहट आ गयी थी.
अचानक चुप हो गयी.
अपनापे की गंभीरता से बोली, “अब तुम जाओ… और हाँ सुनो कभी पता चले बिमला मर गयी तो रोना मत. बहुत रोंदू हो. याद है मैने कह दिया था- अभी से बूढ़े लगते हो. तो गुस्सा होकर रोने लगे थे. मास्टर जी ने पूछा तो बोले- पेट में दर्द है.”
मेरी नकल करते करते फिर से हंस पड़ी
मुझ से भी नहीं रहा गया, “और तुम, याद है, बहुत सोच कर बोली थी राधा और कृशन भाई बहन थे. सारी क्लास हंस पड़ी थी.”
उसकी आवाज़ में फिर भारी पन था, “जाओ तुम अब जाओ. नंदू बेटे दादा जी को बस अड्डे तक छोड़ आ. ”
एक वक्फे के बाद भरभरे स्वर में बोली, ” गाँव जाओ तो सुध लेते रहना.”
लौटते हुए मुझे ख्याल आया मरने की बात क्यों कर रही थी बिमला? सामने भी नहीं आई? कहीं कॅन्सर सा कुछ तो नहीं. बाल उड़ गये हों.
६ महीने हो गये गाँव जाने की हिम्मत नहीं हो रही. लगता है कोई कहेगा- ‘ एक बिमला थी, स्कूल में अपनी क्लास में. सूखी नदी के पार निज़ामपुर ब्याही थी. पता है वह…’

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एक ग़ज़ल

दिन का चेहरा देखिए जैसे दहकती रात है !
है खुशी बेचैन गोया गम कहीं पर पास है !!
तन्हा लड़ता एक दिन उस घर सा तू हो जाएगा
जिसमें कोई है नहीं चूल्‍हे में लेकिन आग है !!
कुछ तो अब्बा की भी सुनते खुद कहेगा देखना
दिल की जो सुनते हैं उनके काम की यह बात है !!
क्या कहूँ बच्चों को अब मैं किसलिए बेज़ार हूँ
आज भी सपने में माँ दिखती है पर नाराज़ है !!

मन की बात

“मोहित देव…? फिज़िक्स के प्रोफेसर..? याद नहीं आ रहा.” रश्मि के पैर काँपने लगे तो उसने चौखट को पकड़ लिया.
” अरे मम्मी, आपके साथ पढ़ते थे, भिवानी में. खूब अच्छे से जानते हैं आपको. मुझे लाइब्ररी में बुलाकर पेरेंट्स के बारे मे पूछा. जैसे ही मैने आपके बारे में बताया, उछल कर बोले, ‘ अरे रश्मि! कितनी शालीन लड़की थी. बहुत तारीफ कर रहे थे आपकी. बोले, जब भी कुछ काम हो, मैं यहीं कॅंपस में रहता हूँ, अकेले. … लंबे हैं.. पतले से.. गौरे..” अक्षय को याद दिलाने का चाव चढ़ा था और रश्मि को लग रहा था कोई उस के दिमाग़ को एक भूंठे चाकू से बंदार रहा है.
जैसे तैसे बेडरूम तक गयी और बिस्तर पर ढह गयी. दिमाग़ में एक बिजली सी कौंधी.
” मैं तुम्हारे पीछे नहीं आऊंगा, देखना, एक दिन तुम मुझे ढूँढती हुई आओगी.” कोमल और संयत स्वर.
अति सज्जन और घोर अपराधी पुरुष में भेद करना कठिन है.
जब बड़े भाई को पता चला कि कॉलेज में एक लड़का उसके पीछे पड़ा है तो तूफान खड़ा कर दिया. लड़की का बड़ा भाई बड़ा बेवकूफ़ हुआ करता है. पिता प्रिन्सिपल से मिलने पहुँच गये. इस दीवाने पर तो भूत सवार था, ” माफी? प्यार करने के लिए माफी. प्यार तो श्रेष्ठ और सुंदर मनोभाव है.” पिता कुछ बोलते इस से पहले भाई और उस के दोस्तों ने उसे प्रिन्सिपल के दफ़्तर से बाहर खींचा और बुरी तरह पीटा.
लड़कों ने कहा,” मारो साले को, और मारो!” और लड़कियों ने हल्का सा मुँह खोल कर पीड़ा और विस्मय की नज़रों से पूरा दृश्य देखा.
बस एक बार फिर सामने आया था. ” मैं तुम्हारे पीछे नहीं आऊंगा अब…देखना .. ” वही कोमलता वही सहजता जिसे याद करके मन काँप उठता है.
शादी के ५ साल बाद जयपुर में दिखा एक दिन. दिल किया उन्हें बता दूं. फिर सोचा, बबूल को पानी देना ठीक नहीं. और कुछ दिन बाद ही अक्षय के पापा को एक जीप टक्कर मार कर भाग गयी. किसने किया, पोलीस को कुछ पता नहीं चला.
जयपुर छोड़ कर इलाहाबाद आ गयी. वह यहाँ भी पहुँच गया!
‘ तुम मुझे ढूँढती हुई… मैं तुम्हारे पीछे …. ‘ रश्मि ने आँखें मूंद ली.
दो दिन की छुट्टी के बाद अक्षय कॉलेज गया तो प्रोफेसर देव कहीं दिखाई नहीं दिए. उनके ब्लॉक पर गया तो ताला लगा था.
सीता बाई ने बताया वे तो इस्तीफ़ा देकर चले गये.
” एक औरत आई थी. गौरी सी, अच्छी थी देखने में… पता नहीं रो रो कर मिन्नत कर रही थी. प्रोफेसर बोल रहे थे,, रश्मि मैं तुम्हारा बुरा सोच भी नहीं सकता. पर एक ही रट – मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ मेरी ज़िंदगी से दूर चले जाओ.. राम जाने क्या कहानी है. बिस्तर बाँधा और निकल गये प्रोफेसर साब.”
अक्षय रात देर से घर आया. उसकी आँखें लाल थी.
” मम्मी मैं सोच भी नहीं सकता आप इतनी गिरी हुई हैं. आप तो जानती ही नहीं थी प्रोफेसर मोहित देव को? फिर मिलने गयी?”
रश्मि की आँखें नीची थी. ‘ एक औरत के मन की बात उसका बाप, उसका भाई उसका पति और उसका बेटा कोई भी नहीं समझ सकता.’
‘ तो इसलिए आप अपने मन की बात कहने के लिए प्रोफेसर मोहित देव के पास चली गयी.’
रश्मि ने देर तक अक्षय के चेहरे को घूरा और फिर बोली, ‘ हाँ मैं इसलिए उसके पास गयी.’
अक्षय की आँखों में नफ़रत बरस रही थी

जमना मौसी की हँसी

वैसे तो जमना मौसी हमारी कुछ भी नहीं लगती थी, पर इतनी हमारी थी कि राशनकार्ड में भी उनका नाम था. कोई बाहर से आए तो लगे घर की मालकिन वही है.जमना मौसी को ही पता होता था सुपारी कहाँ रखी होगी और छुआरे कहाँ. घर का पूरा काम काज देखती थी, पर दो पैसे भी अपने हाथ में नहीं रखती थी . उनकी जायदाद थी दो जोड़ी मोटे कपड़े जो बहुत दिनों तक नहीं फटते थे, और फटने से पहले चाचीज़ी दो और लाकर तैयार रख देती थी. सारे दिन हँसती रहती थी जमना मौसी. कोई उनका मज़ाक उड़ाए तो उनकी हँसी और खिल जाती थी.
सब लोग बैठ गप्पे मारते जून की दोपहरी बीता रहे थे. सब जमना मौसी की खिंचाई कर रहे थे और जमना मौसी हंस कर लोट पलोट हो रही थी. मैं हमेशा की तरह चकित उन्हें देख रहा था. आख़िर पूछ बैठा, ” मौसी आप कभी दुखी या परेशान भी हुई हैं ज़िंदगी में?”
सब मेरा मुँह देखने लगे. मौसी इस पर भी हँस पड़ी और हंसते हंसते बोली, ” बहुत बेटा, बहुत रोई हूँ मैं तो. यह तब की बात है जब मेरी ज़िंदगी में बहुत खुशियाँ थी……. मेरी शादी एक बहुत नेक आदमी से हुई . बहुत प्यार करता था वो मुझे. हमारे तीन बच्चे हुए . दो लड़की और एक लड़का. बड़े प्यारे थे तीनो.” यह बताते हुए जमना मौसी अतीत में चली गयी थी पर चेहरे की मुस्कान बरकरार थी.
” फिर एक दिन मेरा आदमी मर गया.उस दिन बहुत रोई थी मैं.” मौसी की आँखें नम हो गयी थी पर चेहरे की मुस्कान ज्यों की त्यों थी.
” फिर मेरी बीच की लड़की एक दिन मर गयी. बहुत प्यारी थी. कई दिन तक उसको याद करके रोती रही मैं.” आँसू टपकने को था पर मौसी के चेहरे की मुस्कान बनी हुई थी.
” फिर एक दिन बड़े वाली लड़की भी मर गयी. मैं रोई, पर ज़्यादा नहीं.” मौसी की चेहरे पर हँसी खिलने सी लगी. मैं एकटक देख रहा था.
” और फिर एक दिन आया कि लड़का भी मर गया. मैं रोई नहीं ,इस बार हँस पड़ी. खूब हँसी.”
हम सब एक दूसरे का चेहरा देखने लगे.
मम्मी ने कहा, ” जाओ मौसी चाय का वक़्त हो गया आप चाय बना लो.”
मौसी हँसती हुई उठी, ” मेरे को पता है, तुम लोग बातें करोगे . मौसी सदमा लगने से हँसी होगी और फिर हँसने की आदत पड़ गयी. ऐसा कुछ भी नहीं है. जब आपका आख़िरी अपना बचे और वो भी चला जाए तो हँसी आती है. सोच कर डर लगता है पर मेरी मानो बहुत हँसी आती है.”
जमना मौसी हँसती हुई किचन में चली गयी.

पहला पन्ना राम का

अपनी दर्शनिकता की झील में अर्धमग्न प्रोफेसर वशिष्ठ को समझ नहीं आ रहा कि उनकी चिंता कितनी अर्थपूर्ण है. पत्नी से भी नहीं बता सकते. उन्हें याद आ रहा है अपना पहला प्यार, जो एक ताबीज़ की तरह जीवन भर उनके साथ रहा है. ना कभी लड़की से दिल की बात कह पाए, बस दो साल तक बावले हुए फिरते रहे थे .

पहला प्यार किसी नीची डाली के फल की तरह पाने या हथियाने के लिए नहीं होता है, बल्कि वह तो एक झंझावात होता है जिसमें से गुजरना होता है. भूख बंद हो जाती है, किसी काम में मन नहीं लगता- या तो वही या कुछ भी नहीं- यह सारी कायनात उस एक इंसान के बिना बेमानी लगती है. सच है, बिल्कुल सच है. मगर वह तो एक इम्तिहान होता है, इंसान को ज़िंदगी के लिए तैयार करने का. यह नहीं की जी बस प्यार हो गया, पापा-मम्मी ने हाँ कर दी जी, कर लो शादी.

” यह क्या हो गया है इस नयी पीढ़ी को. सब कुछ इतना सरल, इतना सहज. औंधे मुँह गिरेगे यह देख लेना.” मन ही मन बुदबुदाते हैं.

फिर मन में प्रार्थना सी करते हैं- “जैसे भी हो बच्चे का दांपत्य जीवन सुखी और सफल रहे.”

अपनी हर बहस में उन्होनें दावे के साथ कहा है- “पहला प्यार कभी सफल बंधन हो ही नहीं सकता है. प्रेम को समझने की एक प्रक्रिया होती है, वह तो. एक विकट प्रक्रिया. उस से अगर आप गुज़रे नहीं तो ना आप प्रेम करने के काबिल हो पाएँगे, और ना ही एक अच्छे पिता या पति हो पाएँगे. यहाँ तक कि अच्छे इंसान भी नहीं बन पाएँगे.”

“क्या सोच में डूबे हो जी अब तो सब कुछ अच्छे से तय हो गया.” पत्नी ने चहक कर चुप्पी तोड़ी.

” बस ऐसे ही… तुम्हें लगता है शिखा से मिलने से पहले भी कभी विशाल के दिल में किसी के लिए प्यार रहा होगा.”

” ये लोगों के दिलों में ताकने झाँकने का काम आपका है, मेरा नहीं. ” , पत्नी ने चिढ़ कर कहा. और फिर थोडा सहज हुई , “आप अपनी ही बताओ ना, आप को किसी से प्यार हुआ था शादी से पहले….हुआ होगा तो आपको ही पता है ना. माँ पिताजी से कोई पूछकर देखता- ‘हमारा लड़का तो राम है, दूसरा राम!’ ”

थोडा विराम लिया, फिर मन की गहराई में डूब कर बोली, ” समझ लो, पहला पन्ना राम का जी . दुनिया के लिए जो लिखना है आगे लिखो. ”

– ‘ओह, इसका मतलब इन्होनें भी एक पन्ना तो छोड़ा हुआ है.’ वशिष्ठ जी मंद मंद मुस्काये.