१९७७ की बात

रत्ना भाभी भी वैसे तो जाटूसाना से बोरी भर कर किस्से लाई थी. पर अपने पीहर के बतोले तो सब के पास थे. जुआले के औरत और बच्चे कान तब देते थे जब वे कलकत्ते वाली थैली खोलती थी. एक ही बार गयी थी बिशन भैया के साथ और एक छोटा सा टुकड़ा तोड़ लाई थी, कलकते के बऊ बाज़ार का. जब कभी भी किसी ने नई बतरस से बाज़ी मारी, रत्ना भाभी बऊ बाज़ार का इक्का निकाल लेती.
बिशन भैया के आने में अभी छह महीने तो और थे. पर आज जैसे ही रत्ना ने बऊ बाज़ार का खाका खींचा उसे बब्बन के भैया खड़े दिखे; बनियान में, खिड़की से झाँकते, मिसरा जी की बालकनी की ओर, जहाँ मिसरानी खड़ी थी, इनकी आँखों में आँख मिलाए, मुस्कुराती हुई. रत्ना तो बात क्या साँस भी भूल गयी. उसे लगा जब तिजोरी किसी ने खोल ही ली है तो क्या बचा होगा?
हुआ यह था कि बब्बन लल्ला से चुहल करके बिरह के दिन काटते हुए रत्ना थोड़ी आगे चली गयी थी. बब्बन की बार बार मनुहार सुन कर एक, बस एक, चुम्मे के लिए राज़ी हो गयी थी. १९७७ का चुम्मा, हाथ से तोड़कर. यानी बब्बन अपनी अँगुलिया बाँध कर रत्ना भाभी के गाल से चुम्मा उठाएगा, जैसे कोई चूरमा लेता है और अपने मुँह में डाल लेगा.
आगे पीछे फिरता बब्बन पास आकर बोला, ” तो कब भाभी?”
” अपना काम करो लल्ला जा के. पढ़ना लिखना तो है नहीं, पैर से पैर मारना सारे दिन .” ऐसा झिड़का कि लल्ला के तो होश उड़ गये.
रत्ना को लगा बब्बन के भैया उसकी विरह अग्नि में तब ही जलेगे ना, जब वह यहाँ जल जल कर कोयला भएगी. वरना वो तो ठहरे आदमी.
उसे क्या पता भावनाएँ न्यूटन के नियम से नहीं चलती हैं. मिसरानी ने सूरज ढले इशारा किया और बिशन बाबू इत्र लगा के चढ़ गये सीढी. मित्रो, आप सबका ही नहीं मेरा भी दिल धड़क रहा है, यह दृश्य देख कर.
दरवाज़ा खड़का. खुला. किवाड़ ज़रा सा खोलकर मिसरानी ने देखा और धीरे से कहा, ” आप कल आना, अभी मिसरा जी घर पर नहीं है.’
यह १९७७ की बात है दोस्तो. कहानी को यहीं ख़त्म होना था.
१९७७ में पुरुष अपनी नैतिकता से अपदस्थ होने के लिए निकल पड़ा था, मगर औरत का मन नहीं माना था. बाद में क्या हुआ आप जानते हैं.

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गंदगी का समुद्र

अम्मा सुंदर थी. ऐसा सौंदर्य पाने के लिए नहीं, पूजने के लिए होता है. अम्मा के सीट पर बैठते ही पास बैठे सलोने से युवक की देह में विकार आ गया. कंधा झुक गया, कोहनी बाहर निकल गयी और टाँग लटक गयी. लड़का अम्मा के बेटे की उम्र का था. उसका मन गिजगिजाहत से भर गया.
सोचने लगी- क्या यह पुरुष की जात ही ऐसी होती है?
उसे अचानक कुत्तों का ख्याल आ गया. अम्मा ने अपना सिर झटका, इस कुत्सित ख्याल को बाहर फेंकने के लिए.
दूसरा ख्याल आया- क्या मेरा लड़का भी ऐसे ही करता होगा? हो सकता है?
उसे लगा कि लड़के को हाथ लगा कर कहे,” बेटे ठीक से बैठ जाओ. ”
“बेटा?…. नहीं. ”
जब करोड़ों औरतों ने इस गंदगी को जहाँ है वहीं छोड़ दिया है तो शायद उन्होंने सही ही किया होगा. मुझे भी नहीं उकेरना चाहिए.
उसे रास्ते में पड़ी बिष्ठा का ख्याल आ गया. अम्मा ने मुँह सिकोडा.
तब तक कंडेक्टर आ गया जिसकी सूरत में गैंडे का चेहरा छुपा था.. अपनी फटी आवाज़ में उसने कहा,” अम्मा आप इधर बैठ जाओ.” उसने कंडेक्टर की अकेली सीट की तरफ इशारा किया. और उस सीट पर बैठे आदमी को इशारे से अम्मा की सीट पर आने को कहा.
अम्मा को थोड़ा अचंभा हुआ- तो कंडेक्टर को इस लड़के की हरकत के बारे में पता है?
मतलब सबको सब कुछ पता है ? सब जानते हैं सभ्यता का टापू गंदगी के समुद्र के बीच में है.
अम्मा उठी, बोली, ” नहीं बेटे, मेरा स्टॉप आ गया है.”